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क्लाइमेट चेंज और इंसान जिम्मेदार! पहाड़ों में बढ़ती क्लाउड बर्स्ट, फ्लैश फ्लड, लैंडस्लाइड की घटनाओं पर सरकार का अलर्ट

देश के पहाड़ी राज्यों खासकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार ने लोकसभा में अहम जानकारी दी है. सरकार के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के साथ मानव गतिविधियां भी आपदा के जोखिम को बढ़ा रही हैं.

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हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में लगातार मॉनसून की बारिश के कारण उफनती ब्यास नदी. (Photo: PTI)
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में लगातार मॉनसून की बारिश के कारण उफनती ब्यास नदी. (Photo: PTI)

हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक बारिश की घटनाएं तेजी के साथ और बड़ी मात्रा में बढ़ रही हैं. केंद्र सरकार ने लोकसभा में इसकी जानकारी दी. सरकार के मुताबिक, मानव गतिविधियों से जुड़े कारक भी इस क्षेत्र में आपदा के जोखिम को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं.

सरकार का यह बयान उस सवाल के जवाब में आया, जिसमें पूछा गया था कि क्या जलवायु परिवर्तन और बिना साइंटिफिक कंसल्टेशन के अंधाधुंध निर्माण गतिविधियां हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने, अचानक बाढ़ आने, भूस्खलन और अन्य आपदाओं की बढ़ती घटनाओं की वजह बन रही हैं. गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि मौसम विशेषज्ञों, वैज्ञानिक संस्थानों और राज्य प्राधिकरणों के आकलन से पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्र में चरम बारिश की घटनाएं पहले के मुकाबले ज्यादा तीव्र और अधिक बार हो रही हैं.

मानव गतिविधियां भी बढ़ा रहीं आपदा का खतरा

नित्यानंद राय ने बताया कि मल्टी सेक्टोरल सेंट्रल टीम (MSCT) के अध्ययन में मानव गतिविधियों से जुड़े कारकों को भी क्षेत्र में बढ़ते आपदा जोखिम के लिए जिम्मेदार पाया गया है. हिमाचल प्रदेश में बादल फटने, अचानक बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश की घटनाओं की बढ़ती तीव्रता और आवृत्ति को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस टीम का गठन किया था. इस टीम में नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA), सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट रुड़की (CBRI Roorkee), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी पुणे (IITM Pune), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इंदौर (IIT Indore) समेत कई संस्थानों के एक्सपर्ट शामिल हैं. इन्होंने अपनी स्टडी में मौसम विभाग (IMD), केंद्रीय जल आयोग (CWC) और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) से मिले आंकड़ों और इनपुट को भी शामिल किया गया है.

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A car lies damaged after falling rocks and debris from a hillside hit it in the Anni area of Kullu district
कुल्लू जिले के अणी इलाके में पहाड़ी से गिरे पत्थरों और मलबे की चपेट में आने से क्षतिग्रस्त कार. (Photo: PTI)

मौसमी घटनाओं की वजहों का वैज्ञानिक अध्ययन

सरकार के मुताबिक, मल्टी सेक्टोरल सेंट्रल टीम को हिमाचल प्रदेश में बढ़ रही मौसम संबंधी घटनाओं के कारणों का वैज्ञानिक आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई है. टीम सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों की भौगोलिक और जमीनी परिस्थितियों का अध्ययन करेगी. साथ ही अलग-अलग सरकारी एजेंसियों से मिले आंकड़ों की जांच कर आपदा के पीछे काम कर रहे कारकों को समझने की कोशिश की जाएगी. टीम को इन घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए दीर्घकालिक उपाय सुझाने का काम भी सौंपा गया है. सरकार का कहना है कि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर भविष्य में आपदा जोखिम कम करने और संवेदनशील इलाकों की बेहतर सुरक्षा के लिए रणनीति तैयार की जा सकेगी.

तेजी से पिघलती बर्फ, मोरेन अस्थिरता भी चिंता

सरकार ने ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में तेजी से पिघलती बर्फ को भी नदियों और अन्य जल स्रोतों में ज्यादा और तेज बहाव की एक वजह बताया है. बर्फ तेजी से पिघलने पर पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है. इससे पहले से संवेदनशील ढलानों और निचले इलाकों में अचानक पानी का दबाव बढ़ने का खतरा रहता है. जवाब में मोरेन अस्थिरता का भी उल्लेख किया गया है. मोरेन ग्लेशियरों के आसपास जमा चट्टानों, मिट्टी और अन्य मलबे का ढीला जमाव होता है.

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A Bailey bridge was washed away in a flash flood following a cloudburst in Chamoli, Uttarakhand
उत्तराखंड के चमोली में बादल फटने के बाद आए फ्लैश फ्लड में एक बेली ब्रिज बह गया. (Photo: PTI)

मोरेन के अस्थिर होने पर ढलान खिसकने के साथ बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बढ़ सकता है. केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ रही चरम बारिश और हिमाचल प्रदेश में आपदा की घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मानव गतिविधियों से जुड़े कारक भी भूमिका निभा रहे हैं. इन कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन करने और भविष्य में नुकसान कम करने के लिए मल्टी सेक्टोरल सेंट्रल टीम अपनी रिपोर्ट में सुझाव देगी.

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