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अब इतिहास बन जाएगा जंतर-मंतर! छात्र आंदोलन से शुरू और छात्र आंदोलन पर ही खत्म

दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की व्यवस्था बदलने की तैयारी है. गृह मंत्रालय की कमेटी ने इसे धरना-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर तीन नई जगहों पर प्रदर्शन कराने की सिफारिश की है.

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दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर इलाका. (Photo: ITG)
दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर इलाका. (Photo: ITG)

दिल्ली में जब किसी को अपनी बात सरकार तक पहुंचानी होती थी, तो जंतर-मंतर उसका ठिकाना बन जाता था. किसान हों, छात्र हों या किसी फैसले से नाराज आम लोग, संसद से कुछ ही दूरी पर जुटकर वे अपनी आवाज उठाते थे. लेकिन अब इस ऐतिहासिक जगह पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला थम सकता है. गृह मंत्रालय की एक कमेटी ने जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने की सिफारिश की है. इसके बदले तीन नई जगहों- रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड को विकल्प के तौर पर सुझाया गया है.

जंतर-मंतर की कहानी में छात्रों की भूमिका भी अहम रही है. साल 1993 में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के प्रदर्शन ने इस जगह को छात्र आंदोलनों से खास पहचान दिलाई. करीब 33 साल बाद अब यहां आखिरी बार हुए प्रदर्शन की चर्चा भी छात्र आंदोलन को लेकर है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले छात्रों ने यहां प्रदर्शन किया था. लेकिन 10 अक्टूबर को जब CJP ने दोबारा धरना देने की तैयारी की, तो उसे अनुमति नहीं मिली.

छात्र आंदोलन से जुड़ी पहचान के साथ शुरू हुई जंतर-मंतर की कहानी अब नए मोड़ पर है. एक तरफ CJP को धरने की अनुमति नहीं मिली, दूसरी तरफ इसे प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने की सिफारिश की गई है. ऐसे में सवाल है कि क्या जंतर-मंतर धीरे-धीरे आंदोलनों के इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएगा?

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संसद भवन से डेढ़ किलोमीटर से भी कम दूरी पर मौजूद जंतर-मंतर की सबसे बड़ी पहचान यही रही कि यहां से उठने वाली आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचने की उम्मीद रहती थी. पिछले करीब 33 सालों में इस जगह ने कई बड़े आंदोलन देखे. अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन हो या निर्भया मामले के बाद न्याय की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन, जंतर-मंतर विरोध की आवाज का अहम केंद्र बना रहा. अब सवाल है कि जब प्रदर्शन के लिए दूसरी जगहें तय होंगी, तो क्या वहां से भी लोगों की आवाज सरकार तक उतनी ही आसानी से पहुंच पाएगी?

दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के पत्र में नए धरना स्थलों का जिक्र किया गया है. हालांकि, जंतर-मंतर को सूची से हटाने की सिफारिश के पीछे की वजह अभी साफ नहीं है. ऐसे में इस जगह का इतिहास, यहां हुए आंदोलन और प्रस्तावित नए ठिकानों की संसद से दूरी इस बदलाव को समझने के लिए अहम हो जाती है.
पहले बोट क्लब था विरोध की आवाज का ठिकाना

आज जिस जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए जाना जाता है, उससे पहले दिल्ली में बोट क्लब आंदोलनकारियों का प्रमुख ठिकाना था. यह जगह संसद भवन और इंडिया गेट के बीच थी. देशभर से लोग अपनी मांगें लेकर यहां जुटते थे. लेकिन 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ. भारतीय किसान यूनियन के इस आंदोलन में करीब पांच लाख किसानों के पहुंचने का जिक्र मिलता है. किसान बैलगाड़ियों और पशुओं के साथ बोट क्लब पहुंचे थे. करीब एक हफ्ते तक चले इस आंदोलन ने दिल्ली की व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया.

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इसके बाद बोट क्लब पर बड़े जमावड़ों को रोकने का फैसला हुआ. आंदोलनकारियों के लिए नई जगह तय करने में करीब पांच साल लगे. साल 1993 के आसपास जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन स्थल के तौर पर स्वीकार किया गया. इसी के साथ राजधानी में विरोध की आवाज का नया ठिकाना सामने आया.

अन्ना आंदोलन से निर्भया तक, जंतर-मंतर ने देखे बड़े प्रदर्शन

जंतर-मंतर पर साल 2011 में अन्ना हजारे ने जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर आंदोलन किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए इस आंदोलन को देशभर में समर्थन मिला. बड़ी संख्या में लोग अन्ना के साथ खड़े हुए. यह आंदोलन इतना बड़ा हुआ कि केंद्र सरकार पर भी दबाव बना. इसके अगले साल निर्भया मामले के बाद दिल्ली में महिला सुरक्षा और न्याय की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतरे. जंतर-मंतर भी इस विरोध का अहम केंद्र बना. यहां आने वाले बहुत से लोग निर्भया को निजी तौर पर नहीं जानते थे, लेकिन वे उसके लिए न्याय की मांग करने पहुंचे थे.

इसके अलावा साल 2013 में मेधा पाटकर की अगुवाई में नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन हुआ. वहीं, साल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने जंतर-मंतर पर जोरदार प्रदर्शन किया था. किसानों ने केंद्र सरकार से सूखे से राहत के लिए 40 हजार करोड़ रुपये का पैकेज देने की मांग की थी. इस प्रदर्शन के दौरान किसानों ने अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान खींचने के लिए अनोखे तरीके भी अपनाए. इन आंदोलनों ने जंतर-मंतर को देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लोगों के विरोध का साझा मंच बना दिया.

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अब कहां होंगे प्रदर्शन, कितनी दूर हैं नए ठिकाने?

गृह मंत्रालय की कमेटी ने तीन जगहों की सिफारिश की है. इनमें रामलीला मैदान पुरानी और नई दिल्ली की सीमा के पास है. इसका अपना लंबा इतिहास रहा है. यहां महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई थी. साल 1975 में जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था. आज भी यहां बड़े आयोजन होते हैं.

दूसरा ठिकाना बुराड़ी ग्राउंड है. यह बाहरी दिल्ली में स्थित है और संसद भवन से करीब 21 किलोमीटर दूर है. लगभग 59 एकड़ में फैले इस मैदान में एक लाख से ज्यादा लोगों के जुटने की क्षमता बताई गई है. जगह बड़ी है, लेकिन संसद से दूरी के चलते यहां होने वाले प्रदर्शनों की पहुंच पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

तीसरा ठिकाना पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड है. CBD का पूरा नाम सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट है. यह संसद भवन से करीब 13 से 14 किलोमीटर दूर है. अब तक यहां मेले और शादी जैसे आयोजन होते रहे हैं. अब इसे धरना-प्रदर्शन स्थल के तौर पर इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है.

जंतर-मंतर से प्रदर्शन हटाने की वजह क्या है?

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नए ठिकानों की दूरी पर नजर डालें तो रामलीला मैदान को छोड़कर बाकी दोनों जगहें संसद से काफी दूर हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला इसी समय क्यों लिया गया. क्या इसका संबंध हाल के किसी आंदोलन से है? क्या 10 अक्टूबर को दिल्ली में किए गए सुरक्षा इंतजामों की भी इसमें कोई भूमिका है? या फिर राजधानी में विरोध प्रदर्शनों के लिए जगह तय करने की नीति बदली जा रही है? उपलब्ध जानकारी इन सवालों का साफ जवाब नहीं देती.

दिलचस्प बात यह है कि जंतर-मंतर की पहचान हमेशा से ऐसी नहीं थी. इसका निर्माण 1724 में महाराजा जयसिंह द्वितीय ने खगोलीय अध्ययन के लिए कराया था. यहां लगे यंत्रों से समय और ग्रहों की स्थिति का अध्ययन किया जाता था. बाद में यही जगह विरोध प्रदर्शनों का अहम केंद्र बन गई. अब जंतर-मंतर की जगह तीन नए ठिकानों की सिफारिश के बाद बहस सिर्फ जगह बदलने की नहीं है. सवाल यह भी है कि क्या नए ठिकाने आंदोलनकारियों को वही पहुंच और पहचान दे पाएंगे, जो संसद के करीब मौजूद जंतर-मंतर से मिलती रही है. इसका जवाब आने वाले समय में ही मिलेगा.

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने की सिफारिश के बाद अब सवाल इसके भविष्य को लेकर है. अगर यहां धरना-प्रदर्शन बंद होते हैं, तो आंदोलनकारियों को अपनी मांगें उठाने के लिए दूसरे ठिकानों पर जाना होगा. लेकिन संसद से दूर इन जगहों पर जुटकर क्या वे अपनी आवाज उतनी ही मजबूती से सरकार तक पहुंचा पाएंगे? साल 1993 में छात्र आंदोलन से जुड़ी पहचान बनाने वाले जंतर-मंतर पर आखिरी बार CJP का छात्र आंदोलन हुआ था. अब उसी जगह पर दोबारा धरना देने की अनुमति नहीं मिली है. छात्र आंदोलन से शुरू हुई जंतर-मंतर की यह कहानी क्या अब यहीं खत्म हो जाएगी, इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा.
 

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