कुष्मांडा चालीसा मां दुर्गा के चौथे स्वरूप देवी कुष्मांडा को समर्पित स्तुति है. इसमें चालीस छंदों के माध्यम से मां की महिमा और कृपा का वर्णन किया गया है. मान्यता है कि श्रद्धा से इसका पाठ करने से दुख और परेशानियां दूर होती हैं तथा जीवन में सुख, शांति और आत्मिक बल मिलता है. नवरात्रि के चौथे दिन इसका पाठ विशेष माना जाता है.
॥ दोहा ॥
माता कुष्मांडा की जय, करुणा की सागर।
सुख-सम्पत्ति देने वाली, जय माँ, जय अंबर॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति जगत की माता।
कुष्मांडा देवी सुखदायी भ्राता॥
शुम्भ-निशुम्भ हरणी माता।
भक्तों की विपदा हरणी भ्राता॥
कुश (कुमार) मंद हर्ष से भरी।
चारों ओर कृपा की झरी॥
हंस पर सवार हे माता।
कृपा का अविरल बहाता॥
कुम्भ करों में जल से भरे।
धन-धान्य से भरे सारे घर॥
आभा से दीप्त हे माता।
भक्तों के संकट मिटाता॥
चतुर्थी तिथि शुभ कहलाती।
व्रत रखने से सब सफल होती॥
मंत्र का जप करों हे प्यारे।
जीवन सुखी हो जाए सारे॥
अंत में सुन लो अरज हमारी।
जीवन सवारे भवसागर से॥
जय माता कुष्मांडा भवानी।
कृपा करो हे जगत की रानी॥
-----समाप्त-----