अगर ईरान के साथ जंग दोबारा शुरू होता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती एयर डिफेंस सिस्टम के गोला-बारूद की कमी होगी. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के पहले चरण में अमेरिकी सेना ने बड़ी संख्या में एयर डिफेंस मिसाइलें दागीं. युद्धविराम के बाद भी कुछ ऑपरेशन जारी रहे जिससे स्टॉक और कम हो गया. हालांकि ईरान की मिसाइल लॉन्चिंग की रफ्तार पहले जितनी तेज नहीं रही लेकिन फिर भी इंटरसेप्टर की खपत लगातार हो रही है.
अमेरिकी एयर डिफेंस मिशन ज्यादातर सफल रहा है. इंटरसेप्शन रेट अधिक रहा है हालांकि 100 फीसदी नहीं था. कुछ ईरानी हमले डिफेंस सिस्टम को पार कर गए जिससे लोग मारे गए. ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा. लेकिन इन हमलों से अमेरिकी और गठबंधन की सैन्य गतिविधियों पर असर नहीं पड़ा.
यह भी पढ़ें: PAK ने भारत सीमा पर तैनात की चीन से मंगाई 250 हॉवित्जर तोप, 72 KM तक दागेंगी गोला
इस सफलता के पीछे पैट्रियट और THAAD जैसी प्रणालियों का भारी इस्तेमाल रहा. अब पैट्रियट की संख्या एक हजार से कम रह गई है जबकि THAAD के करीब ढाई सौ ही बचे हैं. स्टॉक कम होने का सीधा मतलब है कि अमेरिका और सहयोगी देशों को इंटरसेप्शन में ज्यादा जोखिम उठाना पड़ सकता है.
कब-कब खत्म हुए अमेरिका के मिसाइल

चार्ट से साफ है कि फरवरी 27 को युद्ध शुरू होने से पहले पैट्रियट इंटरसेप्टर की संख्या 2330 थी. अप्रैल 8 के युद्धविराम तक यह घटकर 1030 रह गई. जुलाई 27 तक यह और कम होकर 759 से 827 के बीच अनुमानित है. THAAD की बात करें तो युद्ध से पहले 452 थे. युद्धविराम के समय 232 से 262 रह गए. जुलाई 27 को यह 234 से 278 के बीच है. THAAD में युद्धविराम के दौरान नई डिलीवरी खपत से ज्यादा रही इसलिए संख्या थोड़ी बढ़ी दिख रही है.
बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस के लिए पैट्रियट और THAAD के अलावा कोई अच्छा विकल्प नहीं है. नौसेना के जहाजों पर स्टैंडर्ड मिसाइलें हैं जो ऐसे खतरों को रोक सकती हैं लेकिन ये जहाज आमतौर पर काफी दूर होते हैं इसलिए उनका इस्तेमाल आसान नहीं.
यह भी पढ़ें: 1900 ड्रोन, "1900 ड्रोन, 1600 बम, 144 मिसाइलें... पुतिन ने यूक्रेन में बरसाई मौत
अगर युद्ध दोबारा जोर पकड़ता है तो कम स्टॉक के कारण कुछ हमलों को रोकने में कठिनाई हो सकती है. इससे ठिकानों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है. अमेरिकी सेना को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है. ईरान की तरफ से लॉन्चिंग की रफ्तार अभी कम है लेकिन अगर यह बढ़ती है तो स्थिति और गंभीर हो जाएगी. एयर डिफेंस की सफलता ने अब तक ऑपरेशन को बचाए रखा है लेकिन लंबे समय तक यही रफ्तार बनाए रखना मुश्किल होगा.

चीन युद्ध की तैयारी पर असर
खर्च हो चुके गोला-बारूद का असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा. पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ संभावित युद्ध की अमेरिकी तैयारी पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. निकट और मध्यम अवधि में अमेरिकी सैन्य तैयारियों को जोखिम का सामना करना पड़ सकता है.
चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ युद्ध में इंटरसेप्टर और अन्य मिसाइलों की भारी जरूरत होती है. मध्य पूर्व में इनकी खपत से प्रशांत क्षेत्र के लिए स्टॉक प्रभावित होगा. ट्रंप प्रशासन ने वित्तीय वर्ष 2027 के रक्षा बजट में गोला-बारूद के लिए 95 अरब डॉलर और युद्ध संबंधी अतिरिक्त फंड में 21 अरब डॉलर की मांग की है.
यह भी पढ़ें: यूक्रेन की 'सप्लाई लाइन' पर रूस का वार, ब्लैक सी के बंदरगाहों को बना रहा निशाना
यह मांग इसी जरूरत को दर्शाती है कि अमेरिका अपनी मिसाइल इन्वेंटरी को जल्दी से जल्दी भरना चाहता है. उत्पादन बढ़ाने में समय लगता है इसलिए फिलहाल उपलब्ध स्टॉक पर निर्भर रहना पड़ेगा. अब तक का एयर डिफेंस अभियान काफी हद तक सफल रहा है. ऊंची इंटरसेप्शन दर ने ईरानी हमलों को सीमित रखा.
कुछ हमले जरूर पार हो गए और उन्होंने नुकसान पहुंचाया लेकिन अमेरिकी और गठबंधन की सैन्य क्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। यह सफलता पैट्रियट और THAAD जैसी एडवांस डिफेंस सिस्टम के कारण संभव हुई. ये सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइलों को ऊंचाई पर रोकने में सक्षम हैं.

लेकिन हर सफल इंटरसेप्शन के साथ स्टॉक कम होता जा रहा है. युद्धविराम के दौरान भी कुछ लॉन्चिंग हुई जिससे खपत जारी रही. अगर युद्ध फिर से शुरू होता है तो अमेरिका को प्राथमिकता तय करनी पड़ेगी कि किन ठिकानों की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है. कुछ कम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जोखिम स्वीकार करना पड़ सकता है. नौसेना की स्टैंडर्ड मिसाइलें विकल्प हो सकती हैं लेकिन दूरी की वजह से वे हमेशा उपलब्ध नहीं रहतीं.
आगे चलकर पड़ेगा ज्यादा असर
यह स्थिति अमेरिका की वैश्विक सैन्य रणनीति के लिए महत्वपूर्ण सबक है. मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में लंबे संघर्ष गोला-बारूद की भारी खपत करते हैं. इससे अन्य थिएटर जैसे इंडो-पैसिफिक की तैयारियां प्रभावित होती हैं. चीन के साथ संभावित टकराव में अमेरिका को बड़ी संख्या में इंटरसेप्टर की जरूरत होगी. वर्तमान कमी से उस तैयारी में देरी हो सकती है.
यह भी पढ़ें: "न शांति मंजूर, न बड़ी जंग... अमेरिका के खिलाफ ईरान आखिर चाहता क्या है?
उत्पादन बढ़ाने के प्रयास चल रहे हैं लेकिन नए मिसाइल बनाने में कई महीने या साल लग सकते हैं. इसलिए निकट भविष्य में उपलब्ध स्टॉक का समझदारी से इस्तेमाल जरूरी है. सहयोगी देशों के साथ मिलकर स्टॉक साझा करने या संयुक्त उत्पादन बढ़ाने जैसे विकल्प भी तलाशे जा सकते हैं.
ईरान के साथ युद्ध दोबारा छिड़ने पर अमेरिकी एयर डिफेंस की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्टॉक कितना बचा है. उत्पादन कितनी तेजी से बढ़ता है. अब तक अभियान सफल रहा है लेकिन घटते इन्वेंटरी ने जोखिम बढ़ा दिया है.
यह न सिर्फ मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक अमेरिकी सैन्य क्षमता के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है. नीति निर्माताओं को जल्द से जल्द स्टॉक भरने और वैकल्पिक रणनीतियां विकसित करने पर ध्यान देना होगा ताकि किसी भी बड़े संघर्ष में तैयारियां कमजोर न पड़ें.