अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 11 अक्टूबर 2026 को ट्रुथ सोशल पर अचानक 'एनर्जी सीजफायर' की घोषणा की. उन्होंने कहा कि रूस और यूक्रेन दोनों ने एक-दूसरे के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने पर सहमति जताई है. लेकिन यह घोषणा कीव के लिए नई खबर थी.
राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने फाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में साफ कहा कि रिफाइनरियों पर हमले का ब्लॉक खत्म. हम कर चुके हैं. उन्होंने बताया कि यूक्रेन ने ट्रंप की घोषणा के बाद दो-तीन दिन तक रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोके रखे लेकिन रूस ने यूक्रेन के बिजलीघरों, गैस सुविधाओं और ऊर्जा ग्रिड पर हमले जारी रखे.
इस दौरान रूस ने 14 अक्टूबर की रात 39 बैलिस्टिक मिसाइलें और 120 से ज्यादा ड्रोन दागे. कीव और खारकीव समेत कई जगहों पर 26 ऊर्जा सुविधाएं और चार तेल-गैस ठिकाने क्षतिग्रस्त हुए. 6 लाख लोग बिना बिजली के हैं.
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हमलों का असर और आंकड़े
यूक्रेन के लंबी दूरी के ड्रोन हमलों ने रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार 2026 में रूसी रिफाइनरियों पर हर तीन दिन में एक सफल हमला हुआ. कुछ अनुमानों में रूस की रिफाइनिंग क्षमता का आधा हिस्सा प्रभावित हुआ और डीजल उत्पादन करीब 30 प्रतिशत घटा.
रूस में ईंधन की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई. रूस के हमलों ने यूक्रेन की बिजली क्षमता को युद्ध-पूर्व स्तर से बहुत नीचे ला दिया है. सर्दियों से पहले यह अभियान और तेज हो रहा है. जेलेंस्की का रुख साफ है. वे कहते हैं कि अगर रूस यूक्रेन के ऊर्जा सिस्टम पर हमले बंद करे तो कीव भी रूसी रिफाइनरियों पर हमले रोक सकता है. लेकिन एकतरफा रियायत वे नहीं देंगे. उन्होंने अमेरिका से ज्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर और सख्त प्रतिबंधों की मांग भी की.
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ट्रंप के प्रभाव पर सवाल
ट्रंप ने रूसी डीजल आयात के लिए प्रतिबंधों में ढील दी थी ताकि अमेरिकी ईंधन कीमतें घटे. उन्होंने यूक्रेन पर रिफाइनरी हमले रोकने का दबाव भी बढ़ाया. लेकिन रूस ने युद्धविराम का पालन नहीं किया और जेलेंस्की ने अपने अभियान को फिर शुरू करने का फैसला लिया.
इससे लगता है कि कीव अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने पर अड़ा है. ऊर्जा ठिकाने आधुनिक युद्ध में महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गए हैं क्योंकि ये युद्ध अर्थव्यवस्था और नागरिक मनोबल दोनों को प्रभावित करते हैं. यह घटना दिखाती है कि युद्धविराम की घोषणाएं तब तक प्रभावी नहीं होतीं जब तक दोनों पक्ष वास्तव में सहमत न हों और उन्हें लागू करने का दबाव न हो.