सऊदी अरब पिछले दो-तीन सालों से दोहरे मोर्चे पर संघर्ष झेल रहा है. एक तरफ ईरान से तनाव और हमले हुए तो दूसरी तरफ यमन के हूती विद्रोहियों से लंबा संघर्ष चल रहा है. तेल रिफाइनरियों और अन्य अहम जगहों पर हमलों ने देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित किया है.
सवाल उठता है कि इतने ऊंचे डिफेंस बजट, आधुनिक हथियारों और फाइटर जेट्स के बावजूद सऊदी अरब हूतियों से प्रभावी तरीके से क्यों नहीं लड़ पा रहा. सऊदी अरब का डिफेंस बजट दुनिया में आठवें स्थान पर है. 2025 में इसने करीब 83 अरब डॉलर खर्च किए जो उसके जीडीपी का करीब 6.5 प्रतिशत है.
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देश के पास एफ-15 फाइटर जेट्स, यूरोफाइटर टाइफून, पैट्रियट और थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे आधुनिक उपकरण हैं. फिर भी हाल के हमलों में कुछ निशाने बच गए. अक्टूबर 2026 में रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर हमलों में कई लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए. एयरपोर्ट बंद करना पड़ा और उड़ानें प्रभावित हुईं. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े बजट के बावजूद एसिमेट्रिक वॉर की चुनौतियां बनी रहती हैं.

हूतियों से संघर्ष
हूती समूह यमन में सक्रिय है. ईरान से समर्थन प्राप्त करता है. वे पारंपरिक सेना से अलग तरीके से लड़ते हैं. पहाड़ी इलाकों और कठिन भूभाग का फायदा उठाते हुए वे लंबे समय तक टिके रहते हैं. सऊदी अरब ज्यादातर हवाई हमलों और स्थानीय सहयोगी ताकतों पर निर्भर रहा है.
जमीनी स्तर पर समन्वय की कमी और सहयोगी ताकतों की कमजोरी के कारण सफलता सीमित रही. हाल में हूतियों ने लाल सागर तट पर कुछ इलाके कब्जा किए जिससे रणनीतिक दबाव बढ़ा. सऊदी गठबंधन जवाबी कार्रवाई कर रहा है लेकिन पूर्ण नियंत्रण हासिल करना मुश्किल साबित हो रहा है.
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ईरान से जुड़े तनाव और तेल सुविधाओं पर असर
ईरान से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हमलों ने सऊदी की तेल रिफाइनरियों और पाइपलाइनों को प्रभावित किया. इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ा और कीमतें बढ़ीं. सऊदी अरब को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़े. ये हमले देश की अर्थव्यवस्था के लिए संवेदनशील हैं क्योंकि तेल राजस्व मुख्य स्रोत है.

डिफेंस सिस्टम पर दबाव बढ़ने से इंटरसेप्टर मिसाइलों के स्टॉक कम होने की खबरें आईं जिससे सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई. सऊदी अरब का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है. पूरे देश को एयर डिफेंस से पूरी तरह ढकना संभव नहीं. हूती हमले कम लागत वाले और तेज होते हैं जबकि बचाव महंगा पड़ता है.
सहयोगी यमनी ताकतें बिखरी हुई हैं और उनमें समन्वय की कमी है. सऊदी खुद जमीनी सैनिक भेजने से बचता रहा क्योंकि इससे नुकसान बढ़ सकता है. राजनीतिक और कूटनीतिक विकल्प भी सीमित रहे. विशेषज्ञों के अनुसार असमान युद्ध में आधुनिक हथियार अकेले पर्याप्त नहीं होते.
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वर्तमान स्थिति
हाल के एयरपोर्ट हमलों ने सऊदी की कमजोरियों को उजागर किया. देश अब सहयोगियों से मदद ले रहा है और डिफेंस खर्च बढ़ाने की तैयारी में है. ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश भी की है. सऊदी अरब सरेंडर मोड में नहीं है बल्कि सतर्क रणनीति अपना रहा है. पूर्ण सैन्य समाधान की बजाय कूटनीति और मजबूत बचाव पर जोर दिया जा रहा है. क्षेत्रीय शांति के लिए बातचीत जरूरी है क्योंकि लंबे संघर्ष से दोनों पक्षों को नुकसान हो रहा है.
यह स्थिति दिखाती है कि आधुनिक सैन्य शक्ति के बावजूद भू-राजनीतिक और असमान संघर्ष जटिल होते हैं. सऊदी अरब अपनी सुरक्षा मजबूत करने के प्रयास जारी रखेगा लेकिन स्थायी समाधान संवाद से ही संभव है.