मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हवाई युद्ध की तस्वीर अब और साफ हो रही है. हाल ही में पाकिस्तान एयर फोर्स के रिटायर्ड एयर कमोडोर खालिद चिश्ती ने एक अहम बात स्वीकार की है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अपने पूरे F-16 फ्लीट को उस दौरान जमीन पर ही रखा. यह सावधानी नहीं बल्कि डर की वजह से था. कारण था भारत के राफेल जेट्स पर लगे मेटियोर मिसाइल्स की लंबी रेंज और बेहतर क्षमता.
F-16 पर लगे AMRAAM मिसाइल की रेंज करीब 70 से 100 किलोमीटर तक बताई जाती है जबकि राफेल के मेटियोर की रेंज 120 से 200 किलोमीटर तक पहुंच सकती है. यह अंतर इतना बड़ा था कि पाकिस्तानी पायलटों को लगता था कि वे लड़ाई शुरू होने से पहले ही निशाना बन सकते हैं.
इससे साफ होता है कि आधुनिक हवाई युद्ध अब सिर्फ पायलट की कुशलता या विमान की चपलता पर निर्भर नहीं रह गया है. अब रेंज, फर्स्ट-शॉट एडवांटेज और मिसाइल की नो एस्केप जोन जैसी तकनीकी बातें फैसला करती हैं. खालिद चिश्ती जैसे अनुभवी अधिकारी का यह बयान पाकिस्तान का डर बताता है.
यह भी पढ़ें: ईरान की वो दो मिसाइलें, जिनसे डरकर ट्रंप का सीक्रेट रेस्क्यू हुआ
मेटियोर बनाम AMRAAM: रेंज का अंतर क्यों था?
मेटियोर मिसाइल यूरोपीय कंपनी एमबीडीए ने बनाई है. इसकी सबसे बड़ी खासियत रैमजेट इंजन है. सामान्य मिसाइलें ठोस ईंधन वाले रॉकेट मोटर से चलती हैं जो लॉन्च के कुछ सेकंड बाद जलकर खत्म हो जाता है. उसके बाद मिसाइल अपनी रफ्तार पर निर्भर रहती है. धीरे-धीरे ऊर्जा खोती जाती है. मेटियोर में रैमजेट इंजन पूरे उड़ान भर थ्रस्ट बनाए रखता है. इससे यह लंबी दूरी तक ऊंची स्पीड और ऊर्जा बनाए रखती है.

इसका नतीजा नो एस्केप जोन में दिखता है. नो एस्केप जोन वह इलाका है जहां लक्ष्य विमान मिसाइल से बच नहीं सकता चाहे वह कितना भी मुड़कर या भागने की कोशिश करे. मेटियोर का यह जोन 60 किलोमीटर से ज्यादा बताया जाता है जो AMRAAM के मुकाबले करीब तीन गुना बड़ा है.
राफेल पायलट दुश्मन को लॉक करके फायर कर सकता था. खुद AMRAAM की रेंज से बाहर सुरक्षित रह सकता था. पाकिस्तान के F-16 पायलट अगर आगे बढ़ते तो वे पहले ही निशाने पर आ जाते बिना जवाब देने का मौका पाए.
भारत ने इस तकनीकी बढ़त को और मजबूत बनाया. एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की कवरेज और लंबी दूरी वाले स्टैंड-ऑफ हथियारों ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र को लगभग बंद कर दिया. एस-400 ने लंबी दूरी से पाकिस्तानी एयरक्राफ्ट और यहां तक कि कुछ हाई वैल्यू टारगेट को भी निशाना बनाया. पाकिस्तानी विमानों को अपने ठिकानों के पास या पश्चिमी इलाकों की तरफ पीछे हटना पड़ा. इस माहौल में F-16 को उड़ान भरने का जोखिम बहुत ज्यादा था.
यह भी पढ़ें: तेजस फाइटर जेट के लिए अमेरिकी इंजन आने में हुई देरी तो DRDO ने पलट दी बाजी
ऑपरेशन सिंदूर और जमीनी नुकसान
ऑपरेशन सिंदूर अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ था. भारत ने आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए. इसके बाद हवाई और मिसाइल हमलों का सिलसिला चला. भारतीय वायुसेना ने राफेल, सु-30 एमकेआई और अन्य प्लेटफॉर्म से स्टैंड-ऑफ वेपन्स का इस्तेमाल किया.
पाकिस्तान के कई एयरबेस पर नुकसान हुआ. जैकोबाबाद जैसे ठिकानों पर F-16 हैंगर क्षतिग्रस्त हुए. कुछ विमान जमीन पर ही प्रभावित हुए. रडार और कमांड सिस्टम भी निशाने पर आए. खालिद चिश्ती के अनुसार F-16 की मिसाइल रेंज की कमी के कारण उन्हें फ्रंटलाइन पर नहीं भेजा जा सका.
कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि JF-17 और J-10सी जैसे प्लेटफॉर्म पर चीनी मिसाइलें थीं लेकिन F-16 जो पाकिस्तान की मुख्य शक्ति माना जाता था वह किनारे पर रह गया. यह घटना दिखाती है कि पुरानी पीढ़ी के विमान और मिसाइल नई तकनीक के सामने कैसे पीछे छूट जाते हैं.
यह भी पढ़ें: अब PAK-चीन की खैर नहीं... नेवी के हर युद्धपोत पर होगी ब्रह्मोस मिसाइलों की तैनाती
क्या जे-10सीई और पीएल-15 गैप को तेजी से भर सकते हैं
पाकिस्तान ने चीन से जे-10सीई फाइटर जेट और पीएल-15 मिसाइल हासिल की हैं. पीएल-15 की घरेलू चीनी वर्जन की रेंज 200 किलोमीटर या उससे ज्यादा बताई जाती है जबकि एक्सपोर्ट वर्जन पीएल-15ई की रेंज करीब 145 किलोमीटर मानी जाती है. इसे मेटियोर के करीब या बराबर बताया जाता है. ड्यूल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर से यह लंबी दूरी तय कर सकती है.
लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ अधिकतम रेंज काफी नहीं है. मेटियोर का रैमजेट सिस्टम नो एस्केप जोन में बेहतर प्रदर्शन देता है. पीएल-15 ऊर्जा खो सकती है जबकि मेटियोर अंत तक मजबूत रहती है. इसके अलावा भारत के पास S-400 मिसाइल सिस्टम, बेहतर सेंसर फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सुइट और नेटवर्क सेंट्रिक क्षमता है. राफेल का आरबीई2 एईएसए रडार और स्पेक्ट्रा सिस्टम कंडिशनल अवेयरनेस बढ़ाते हैं.

पाकिस्तान जे-10सीई और पीएल-15 के साथ गैप कम करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन मात्रा, इंटीग्रेशन, ट्रेनिंग और सपोर्ट सिस्टम में भारत अभी आगे है. भारत अस्त्र मार्क-2 जैसी स्वदेशी मिसाइलों पर भी काम कर रहा है. मेटियोर स्टॉक बढ़ा रहा है. भविष्य में अगर पाकिस्तान को बेहतर वर्जन या ज्यादा संख्या मिलती है तो संतुलन बदल सकता है लेकिन रेंज और फर्स्ट-शॉट एडवांटेज भारत के पक्ष में है.
हवाई युद्ध का नया सिद्धांत: रेंज अब राजा है
यह घटना आधुनिक हवाई युद्ध के सिद्धांत को दोहराती है. पहले डॉगफाइट और पायलट स्किल पर जोर था. अब बीवीआर यानी बियॉन्ड विजुअल रेंज मुकाबला मुख्य है. जो पहले फायर करे और सुरक्षित रहे वही जीते. मेटियोर जैसी मिसाइलें इसी सिद्धांत पर बनी हैं. एस-400 जैसी ग्राउंड बेस्ड सिस्टम हवाई क्षेत्र को नियंत्रित करती हैं.
कुल मिलाकर खालिद चिश्ती का बयान सिर्फ एक स्वीकारोक्ति नहीं है. यह बताता है कि तकनीक कैसे रणनीति को आकार देती है. ऑपरेशन सिंदूर में मिसाइल रेंज का अंतर निर्णायक साबित हुआ. भविष्य में जे-10सीई और पीएल-15 इस अंतर को कम कर सकते हैं लेकिन पूरी तरह बंद करने में समय और संसाधन दोनों लगेंगे. फिलहाल भारत की हवाई बढ़त मजबूत बनी हुई है.