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एक धमाका और जंगल साफ! अमेरिका के 6800 किलो के 'डेजी कटर' बम से क्यों डरते थे दुश्मन?

वियतनाम के घने जंगलों में हेलिकॉप्टर उतारने की जगह बनाने के लिए बना 6800 किलो का यह अमेरिकी बम बाद में इराक और अफगानिस्तान तक पहुंचा. इसके धमाके का खौफ इतना था कि ब्रिटिश सैनिकों को परमाणु हमले का भ्रम हो गया.

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ये था अमेरिका का डेजी कटर बम. जिसका इस्तेमाल जंगल साफ करने के लिए होता था. (File Photo: Getty)
ये था अमेरिका का डेजी कटर बम. जिसका इस्तेमाल जंगल साफ करने के लिए होता था. (File Photo: Getty)

अमेरिका का BLU-82/B 'डेजी कटर' 6800 किलो वजन का बम था. यह परमाणु बम नहीं था, लेकिन उससे कम नहीं था. इसे पहली बार 23 मार्च 1970 को वियतनाम युद्ध में इस्तेमाल किया गया था. इसे बनाने का मुख्य मकसद जंगल में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए जल्दी से खाली जगह बनाना था. बाद में इसका इस्तेमाल कंबोडिया, लाओस, 1991 के खाड़ी युद्ध और 2001 के अफगानिस्तान युद्ध में भी किया गया.

इस बम में करीब 5715 किलो विस्फोटक भरा होता था. इसे सामान्य लड़ाकू विमान से नहीं गिराया जाता था. बड़े C-130 और बाद में MC-130 जैसे सैन्य विमानों से इसे पैराशूट की मदद से नीचे गिराया जाता था. धमाके के बाद आसपास के पेड़-पौधे और दूसरी रुकावटें हट जाती थीं. इससे करीब 260 फीट यानी 79 मीटर चौड़ी जगह साफ हो सकती थी, जहां हेलिकॉप्टर उतारा जा सकता था.

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वियतनाम में क्यों जरूरत पड़ी?

BLU-82 को बनाने की जरूरत वियतनाम युद्ध के दौरान महसूस हुई. उस समय अमेरिका के सामने घने जंगल बड़ी समस्या थे. हेलिकॉप्टर सैनिकों और सामान को तेजी से पहुंचाने के लिए जरूरी थे, लेकिन जंगल के बीच उन्हें उतारने के लिए खुली जगह नहीं मिलती थी.

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अमेरिका पहले इसके लिए दूसरे बड़े बम इस्तेमाल करता था. इनमें करीब 10 हजार पाउंड का M121 बम भी था. लेकिन इसका स्टॉक कम होने लगा. इसके बाद अमेरिकी वायुसेना ने इससे भी बड़ा बम बनाना शुरू किया.

1960 के दशक के आखिर में इस नए बम को तैयार किया गया. 1969 में इसका परीक्षण हुआ और 1970 में इसे पहली बार युद्ध में इस्तेमाल किया गया. शुरुआत में इसका मकसद किसी इमारत या शहर को निशाना बनाना नहीं था. इसे खास तौर पर जंगल साफ करने और हेलिकॉप्टर के लिए जगह बनाने के लिए तैयार किया गया था.

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इतना बड़ा था बम

BLU-82/B का वजन करीब 6800 किलो था. इसकी लंबाई करीब 3.6 मीटर और चौड़ाई करीब 1.37 मीटर थी. इसे विमान से गिराने का तरीका भी अलग था. बम को C-130 जैसे बड़े विमान के अंदर रखा जाता था. सही जगह पहुंचने पर इसे पैराशूट की मदद से बाहर निकाला जाता था.

जमीन के पास पहुंचने के बाद इसका धमाका होता था. धमाके से आसपास के पेड़-पौधे और दूसरी रुकावटें हट जाती थीं. इसी वजह से जंगल के बीच हेलिकॉप्टर के उतरने की जगह बनाई जा सकती थी.

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Daisy Cutter Bomb

कंबोडिया और लाओस में भी इस्तेमाल

वियतनाम के बाद इस बम का इस्तेमाल कंबोडिया और लाओस में भी किया गया. 1970 में कंबोडिया में 16 BLU-82/B बम गिराए गए. इनका इस्तेमाल अमेरिकी सैनिकों के अभियान के दौरान किया गया था. लाओस में भी बड़े 'डेजी कटर' बमों का इस्तेमाल हेलिकॉप्टरों के लिए जगह बनाने में किया गया.

1971 के ऑपरेशन लैम सोन 719 के दौरान अमेरिकी वायुसेना ने दक्षिण वियतनामी सैनिकों की मदद के लिए ऐसे बड़े बमों का इस्तेमाल किया. यानी शुरुआत में इस बम का सबसे बड़ा काम था जंगल साफ करना और हेलिकॉप्टर उतारने के लिए जगह बनाना.

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1975 में फिर गिराया गया

वियतनाम युद्ध खत्म होने के कुछ साल बाद मई 1975 में BLU-82 का फिर इस्तेमाल हुआ. इस बार कंबोडिया के कोह तांग द्वीप पर अमेरिकी अभियान के दौरान इसे गिराया गया. अमेरिकी सैनिक वहां Mayaguez नाम के जहाज के चालक दल को छुड़ाने पहुंचे थे. 

अमेरिकी नौसेना के रिकॉर्ड के मुताबिक, एक C-130 से करीब 15 हजार पाउंड का BLU-82 गिराया गया था. इसका मकसद जंगल में खाली जगह बनाना था, ताकि अमेरिकी मरीन्स को अभियान में मदद मिल सके.

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खाड़ी युद्ध में बदला इस्तेमाल

1991 के खाड़ी युद्ध में इस बम का काम कुछ बदल गया. यहां वियतनाम जैसे घने जंगल नहीं थे. इसलिए इसका इस्तेमाल इराकी सैनिकों के ठिकानों और उनके बचाव वाले इलाकों पर असर डालने के लिए किया गया. अमेरिकी वायुसेना के रिकॉर्ड के मुताबिक, ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म के दौरान 11 BLU-82/B बम गिराए गए.

इनमें से एक बम इराकी सीमा के पास एक माइनफील्ड पर गिराया गया था. इसका मकसद आगे बढ़ रही अमेरिकी सेना के लिए रास्ता साफ करने में मदद करना था. इस बम का धमाका इतना बड़ा था कि इसका असर सिर्फ जमीन तक नहीं रहा. इसका इस्तेमाल दुश्मन के सैनिकों में डर पैदा करने के लिए भी किया गया.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक ब्रिटिश SAS टीम ने एक बड़े विस्फोट को परमाणु हमले जैसा समझ लिया था. हालांकि इसे एक रिपोर्टेड घटना के तौर पर ही देखा जाता है, इसकी आधिकारिक पुष्टि परमाणु हमले के रूप में नहीं हुई थी.

अफगानिस्तान में भी बरसा

2001 में अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका ने BLU-82 का फिर इस्तेमाल किया. इस बार इसे तालिबान के ठिकानों और पहाड़ी इलाकों में मौजूद लड़ाकों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया.

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नवंबर 2001 में अमेरिकी MC-130 विमान से दो BLU-82 अफगानिस्तान में गिराए गए. यहां भी इसका मकसद सिर्फ हमला करना नहीं था. इसके बड़े धमाके का इस्तेमाल तालिबान पर दबाव बनाने के लिए भी किया गया.

2008 में खत्म हुआ इसका दौर

BLU-82 का आखिरी ऑपरेशनल ड्रॉप 15 जुलाई 2008 को अमेरिका के यूटा टेस्ट एंड ट्रेनिंग रेंज में हुआ. इसके बाद इसका ऑपरेशनल इस्तेमाल बंद हो गया. कुल 225 BLU-82/B बम बनाए गए थे. बाद में अमेरिका ने इससे ज्यादा मॉर्डन और ज्यादा चर्चित GBU-43/B MOAB जैसे बड़े बम बनाए. MOAB को अक्सर ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ कहा जाता है.

लेकिन BLU-82 की कहानी अलग है. यह बम शुरुआत में वियतनाम के जंगलों में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए जगह बनाने के लिए बनाया गया था. बाद में यही बम कंबोडिया, लाओस, इराक और अफगानिस्तान के युद्धों में भी इस्तेमाल हुआ. करीब 15 हजार पाउंड वजन और हजारों किलो विस्फोटक वाला यह बम अमेरिकी सैन्य इतिहास के सबसे बड़े गैर-परमाणु बमों में शामिल रहा. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति

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