पितृपक्ष में 29 सितंबर 2026 को तृतीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा. आम भाषा में इसे तीज का श्राद्ध भी कहते हैं. इस बार तृतीया तिथि के श्राद्ध पर भरणी नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है. इस दिन उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनका निधन हिंदू पंचांग के अनुसार, किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ हो. पितरों की शांति के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
तृतीया तिथि श्राद्ध
हिंदू पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि की शुरुआत 28 सितंबर को शाम 07 बजकर 13 मिनट से प्रारंभ होकर 29 सितंबर की शाम 05 बजकर 09 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि के आधार पर तृतीया तिथि का श्राद्ध 29 सितंबर दिन मंगलवार को किया जाएगा.
श्राद्ध और तर्पण का मुहूर्त
पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने में कुतुप वेला को विशेष महत्व दिया गया है. यह समय दिन के मध्य यानी दोपहर के आस-पास आता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, 29 सितंबर को तीज के श्राद्ध में कुतुप काल सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक रहेगा. हालांकि अलग-अलग शहरों में इसका समय थोड़ा अलग हो सकता है. इसके लिए पहले पंचांग जरूर देख लें.
तृतीया श्राद्ध की विधि क्या है?
पितृपक्ष में तृतीया तिथि के श्राद्ध में पितरों के निमित्त पिंडदान करने की परंपरा है. श्राद्धकर्म के लिए सबसे पहले आटा, चावल या जौ, शहद, घी और काले तिल से पिंड तैयार किए जाते हैं. इन पिंडों को श्रद्धापूर्वक पितरों को अर्पित किया जाता है. पिंडदान के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है. तर्पण के समय कुश का प्रयोग करना भी श्राद्ध कर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. कुश से अंगूठी के आकार का रिंग बनाकर दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में धारण करने की परंपरा है.
श्राद्धकर्म पूरा होने के बाद गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा है. अंत में पूर्वजों की आत्मिक शांति और उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना की जाती है.
पंचबलि का भी विशेष महत्व
श्राद्ध के दौरान भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए अलग निकालने की परंपरा है. इसे पंचबलि कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन जीवों के माध्यम से भोजन हमारे पितरों तक पहुंचता है. मान्यता है कि श्रद्धा के साथ पंचबलि, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से पितरों को संतुष्टि और शांति मिलती है. इसी वजह से पितृ पक्ष में इन परंपराओं का विशेष महत्व माना गया है.