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UPI पर MDR लगाने की जरूरत नहीं, GTRI की रिपोर्ट में अमेरिका का क्यों जिक्र?

GTRI का कहना है कि भारतीय डिजिटल भुगतान बाजार में अमेरिकी कंपनियों की हिस्सेदारी पहले से काफी बड़ी है. गूगल पे और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फोनपे मिलकर देश के 80 फीसदी से ज्यादा UPI लेनदेन को प्रोसेस करती हैं.

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UPI से 2000 रुपये की पेमेंट पर लगेगा MDR. (Photo: File)
UPI से 2000 रुपये की पेमेंट पर लगेगा MDR. (Photo: File)

आर्थिक थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने कहा है कि भारत को अपनी डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को लेकर किसी बाहरी दबाव में आने की जरूरत नहीं है. GTRI के मुताबिक UPI और RuPay जैसे भारतीय पेमेंट सिस्टम ने देश में डिजिटल लेनदेन को नई ऊंचाई दी है. ऐसे में विदेशी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर इनकी मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करना सही नहीं होगा.

लोकसभा में बिल पास, सरकार को मिला नया अधिकार

ये बयान ऐसे समय आया है जब लोकसभा ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में संशोधन से जुड़ा विधेयक पारित किया है. इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो तय कर सकेगी कि कौन-से इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड पर शुल्क लगेगा और कौन-से मुफ्त रहेंगे. फिलहाल UPI और RuPay डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले लेनदेन पर ग्राहकों या कारोबारियों से कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नहीं लिया जाता. इसी जीरो-MDR व्यवस्था ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और आम ग्राहकों के बीच डिजिटल भुगतान को तेजी से बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

UPI पर शुल्क लगाने के खिलाफ GTRI

GTRI का कहना है कि UPI नेटवर्क को चलाने के लिए साइबर सुरक्षा, सर्वर क्षमता, फ्रॉड प्रिवेंशन और विवाद निपटान जैसी व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है. इसके लिए एक टिकाऊ फंडिंग मॉडल की जरूरत हो सकती है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि सभी कारोबारियों पर MDR लागू कर दिया जाए. थिंक टैंक ने सुझाव दिया है कि सरकार बजटीय सहायता, बड़े व्यावसायिक लेनदेन पर सीमित शुल्क या फिर केवल बड़े कारोबारियों पर शुल्क लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है.

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अमेरिकी रिपोर्ट में UPI और RuPay पर सवाल

GTRI ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की 2026 नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट का जिक्र किया है. इस रिपोर्ट में भारत के UPI और RuPay फ्रेमवर्क के साथ ब्राजील के डिजिटल पेमेंट सिस्टम Pix की भी आलोचना की गई है. अमेरिका का तर्क है कि ऐसे घरेलू डिजिटल भुगतान सिस्टम विदेशी भुगतान कंपनियों को बराबरी का अवसर नहीं देते. हालांकि GTRI का कहना है कि भारत को अपनी नीतियां अमेरिकी व्यापार शिकायतों के आधार पर तय नहीं करनी चाहिए.

अमेरिकी कंपनियों की बड़ी मौजूदगी

GTRI ने ये भी कहा है कि भारतीय डिजिटल भुगतान बाजार में अमेरिकी कंपनियों की हिस्सेदारी पहले से काफी बड़ी है. गूगल पे और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फोनपे मिलकर देश के 80 फीसदी से ज्यादा UPI लेनदेन को प्रोसेस करती हैं. थिंक टैंक का मानना है कि इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि विदेशी कंपनियों को भारतीय भुगतान बाजार तक पहुंच नहीं है. 

डेटा लोकलाइजेशन बनाए रखने की सलाह

GTRI ने भारत के डेटा लोकलाइजेशन नियमों का समर्थन भी किया है. उसके मुताबिक भुगतान से जुड़ा डेटा बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण होता है. ऐसे डेटा को भारत में ही स्टोर करने से नियामकों को धोखाधड़ी की जांच, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में मदद मिलती है.

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क्या है GTRI की सलाह?

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि UPI पर किसी भी तरह का शुल्क लगाने का फैसला विदेशी कंपनियों की शिकायतों या दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि सिस्टम की वास्तविक लागत और दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए. उनका मानना है कि भारत को अपनी डिजिटल पेमेंट व्यवस्था की प्रतिस्पर्धा, नीतिगत स्वतंत्रता और दीर्घकालिक स्थिरता की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि UPI आज देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण बुनियादों में से एक बन चुका है.

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