हिमा दास और दुती चंद की कहानी सिर्फ दो एथलीटों की नहीं, भारतीय खेल व्यवस्था के अधूरे सपनों की कहानी है.
ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 भारत के लिए यादगार रहे. पदकों की बारिश हुई, नए सितारे चमके और एथलेटिक्स में भी भारत ने दुनिया को अपनी बढ़ती ताकत का अहसास कराया. ट्रैक पर दौड़ते नए चेहरे देखकर लगा कि भारत अब सिर्फ प्रतिभा पैदा नहीं कर रहा, बल्कि विश्व स्तर पर चुनौती देने की स्थिति में पहुंच रहा है.
हिमा दास कहां हैं?
और फिर दूसरा सवाल उभरता है-
दुती चंद कहां हैं?
यह सवाल सिर्फ दो खिलाड़ियों का नहीं है. यह भारतीय खेल व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है.
2018... जब पूरे देश ने पहली बार हिमा दास को जाना
12 जुलाई 2018. फिनलैंड के टैम्पेरे में हुई विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप. 400 मीटर ट्रैक पर एक भारतीय लड़की ने इतिहास रच दिया.
हिमा दास विश्व चैम्पियन बनीं
ट्रैक स्पर्धा में विश्व स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला एथलीट थीं. अगली सुबह अखबारों से लेकर टीवी स्क्रीन और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म तक हर जगह सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा था- 'ढिंग एक्सप्रेस'.
In the video below, you will see what makes Hima Das, Gold medalist at the world under-20 Athletics Championship, in Finland, so special!
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) July 13, 2018
This is India’s first ever Gold in a track event at a world championship.
I salute her achievement & congratulate her on her historic win. pic.twitter.com/N4q62mVecM
उसी साल जकार्ता एशियन गेम्स में हिमा दास ने 400 मीटर में 50.79 सेकेंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर वह भारतीय एथलेटिक्स की सबसे बड़ी उम्मीद बन गईं.
इसके अगले ही साल यानी 2019 में हिमा ने यूरोप में महज 20 दिनों के भीतर लगातार 5 स्वर्ण पदक जीत लिए. ऐसा लगने लगा था कि भारत को 400 मीटर में विश्व मंच का स्थायी दावेदार मिल गया है.
असम के छोटे से गांव से निकलकर दुनिया के मंच पर पहुंची हिमा को भारत अगले दशक का सबसे बड़ा ट्रैक स्टार मानने लगा था. लेकिन खेल की दुनिया में सफलता जितनी तेज आती है, उसे बनाए रखना उतना ही मुश्किल होता है.
दूसरी ओर थीं दुती चंद...
100 और 200 मीटर की सबसे तेज भारतीय धावक. जेंडर नियमों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाली, समाज की रूढ़ियों को चुनौती देने वाली और 2018 एशियन गेम्स में दो रजत पदक जीतने वाली एथलीट.
2019 में इटली के नेपल्स में आयोजित समर यूनिवर्सियाड में दुती चंद ने 100 मीटर दौड़ में 11.32 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता था. इसके साथ ही वह यूनिवर्सियाड में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला स्प्रिंटर बनीं. इस जीत ने एक बार फिर साबित किया था कि वह केवल एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की सबसे बड़ी स्प्रिंट उम्मीदों में शामिल थीं.
Dutee free! The sprint for gold goes to Dutee Chand (IND) in the Women's 100m Sprint. 🏃♀🏃♂ #Napoli2019 #ToBeUnique #Universiade
— FISU (@FISU) July 9, 2019
💻📱🖥 Watch the Universiade on https://t.co/8XfcaBi162 from 3 to 14 July! ☀🌋🍕 pic.twitter.com/zE4kggM79r
हिमा दास असम पुलिस में डीएसपी हैं. दुती चंद को 2020 में ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन (OMC) में आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन मिला था.
आज हिमा दास 26 साल की हैं और दुती चंद 30 साल की. यह ऐसी उम्र नहीं है, जब किसी स्प्रिंटर का करियर खत्म मान लिया जाए.दुनिया के कई धावक इस उम्र में भी बड़े टूर्नामेंटों में पदक जीतते हैं.
जहां हिमा दास ने हाल ही में करीब दो साल बाद ट्रैक पर वापसी की है, वहीं दुती चंद लंबे समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स की मुख्य तस्वीर से दूर हैं.
दरअसल, दिसंबर 2022 में लिए गए दो डोप सैंपलों में प्रतिबंधित पदार्थ (SARMs) मिलने के बाद अगस्त 2023 में नाडा के एंटी-डोपिंग अनुशासनात्मक पैनल (ADDP) ने दुती चंद पर चार साल का प्रतिबंध लगाया था. दुती ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन अब तक सार्वजनिक तौर पर उन्हें कोई राहत नहीं मिली है.
असली बहस शुरू होती है- क्या भारत में सरकारी नौकरी ही खिलाड़ी की अंतिम मंजिल बन जाती है?
यह सवाल सुनने में कठोर लग सकता है. लेकिन इसका जवाब तलाशना जरूरी है. भारत में अधिकांश खिलाड़ी साधारण परिवारों से आते हैं. आर्थिक असुरक्षा, सीमित संसाधन और अनिश्चित भविष्य के बीच सरकारी नौकरी उनके लिए सम्मान के साथ स्थिर जीवन की गारंटी होती है.
इसलिए नौकरी मिलना गलत नहीं है. गलत है, अगर नौकरी मिलने के बाद खिलाड़ी का अंतरराष्ट्रीय करियर धीरे-धीरे समाप्त होने लगे.
हिमा की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं
2018 में विश्व जूनियर चैम्पियन...
एशियन गेम्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड...
2019 में लगातार पांच अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण...
2019 के बाद चोटों ने उनकी उड़ान पर ब्रेक लगा दिया...
फिर 'वेयरअबाउट्स' नियम से जुड़े मामले में उन्हें नाडा की कार्रवाई का सामना करना पड़ा. यह डोपिंग का मामला नहीं था. बाद में उन्होंने ट्रैक पर वापसी की, लेकिन तब तक वह भारतीय एथलेटिक्स की मुख्य तस्वीर से काफी हद तक बाहर हो चुकी थीं.
यहां सवाल यह नहीं है कि गलती किसकी थी. सवाल यह है कि जिस खिलाड़ी को भारत अगले दस वर्षों का सुपरस्टार मान रहा था, वह आठ साल के भीतर चर्चा से लगभग बाहर कैसे हो गई?
क्या यह सिर्फ हिमा और दुती की कहानी है?
शायद नहीं. भारतीय खेलों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जहां खिलाड़ी शुरुआती सफलता के बाद लंबी रेस में टिक नहीं पाए.
इसके पीछे कई वजहें हैं -
यानी समस्या सिर्फ खिलाड़ी नहीं, पूरा इकोसिस्टम है.
दुनिया क्या करती है?
अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जमैका जैसे देशों में खिलाड़ियों को ऐसा हाई-परफॉर्मेंस इकोसिस्टम मिलता है, जो उन्हें लंबे समय तक शीर्ष स्तर पर बनाए रखने में मदद करता है.
इन देशों में खिलाड़ियों के लिए ऐसा तंत्र तैयार किया गया है, जो उनके करियर को लंबा और बेहतर बनाने में मदद करता है. इसमें विश्वस्तरीय कोचिंग, स्पोर्ट्स साइंस, बायोमैकेनिक्स, फिजियो और रिकवरी, बेहतर न्यूट्रिशन, खेल मनोवैज्ञानिकों का सहयोग और सालभर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के अवसर शामिल हैं. इसलिए वहां सरकारी नौकरी या आर्थिक सुरक्षा खिलाड़ी के करियर की रफ्तार नहीं रोकती, बल्कि उसे और मजबूती देती है.
भारत में अक्सर इसके उलट तस्वीर दिखाई देती है -
भारत प्रतिभा पैदा कर रहा है... लेकिन क्या उसे संभाल भी रहा है?
ग्लास्गो में नए धावक सामने आए हैं. आज पूरा देश उनकी तारीफ कर रहा है. लेकिन क्या हम यह भरोसा दिला सकते हैं कि यही खिलाड़ी आगे भी विश्व स्तर पर पदक जीतते रहेंगे? या फिर आठ-दस साल बाद हम इन्हीं के बारे में भी पूछेंगे-
'आखिर ये कहां गायब हो गए?'
अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ खिलाड़ी की नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी.
2036 ओलंपिक का सपना... और सबसे बड़ा सवाल
भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी हासिल करने की कोशिश में जुटा है. अगर भारत को सचमुच खेल महाशक्ति बनना है, तो सिर्फ नए खिलाड़ी तैयार करना काफी नहीं होगा.
हमें ऐसे सिस्टम की जरूरत होगी, जहां-
आखिरी सवाल...
क्या भारत अपने खिलाड़ियों को चैम्पियन तो बना रहा है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक चैम्पियन बनाए रखने में असफल हो रहा है?
अगर जवाब 'हां' है, तो बदलाव खिलाड़ियों में नहीं, सिस्टम में चाहिए. क्योंकि किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ सरकारी नौकरी हासिल करना नहीं होनी चाहिए. उसकी सबसे बड़ी पहचान यह होनी चाहिए कि एक दशक बाद भी दुनिया उसे पदक जीतने का दावेदार माने.
ग्लास्गो ने भारत को नए सितारे दिए हैं. अब सबसे बड़ी चुनौती यही है...ये सितारे हालात से हारकर टूट न जाए.