भारत सरकार को आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में बड़ा झटका लगा है. इस साल मॉनसून की बारिश पिछले एक दशक में सबसे कम रही है. अल-नीनो की वजह से बारिश सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम हुई जिससे मक्का और गन्ने की फसलें बुरी तरह प्रभावित हुईं. इन फसलों की कमी के कारण उनकी कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं.
मक्का और चीनी की कीमतें लगभग 40 प्रतिशत बढ़ गईं जबकि चावल की कीमत में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई. खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति सितंबर में 7.74% पहुंच गई जो पिछले महीने 5.97 प्रतिशत थी. इस स्थिति में नई दिल्ली ने चीनी और मक्के के इस्तेमाल पर अंकुश लगा दिया है ताकि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. नतीजतन पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट का अनुपात मौजूदा 20% से घटकर 15 प्रतिशत तक आ सकता है.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा सुरक्षा योजना का अहम हिस्सा ई-20 कार्यक्रम रहा है. इसमें पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जाता है. सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2014 से अब तक इस कार्यक्रम ने लगभग 2 ट्रिलियन रुपये यानी 21.1 अरब डॉलर की तेल आयात लागत बचाई है.
20 प्रतिशत ब्लेंडिंग दर पर सालाना बचत करीब 430 अरब रुपये आंकी गई थी. भारत ने यह लक्ष्य निर्धारित समय से करीब पांच साल पहले हासिल कर लिया था. लेकिन अब फीडस्टॉक की कमी के कारण इस उपलब्धि पर असर पड़ेगा. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि चालू आपूर्ति वर्ष में इथेनॉल ब्लेंडिंग दर 15 से 17 प्रतिशत के आसपास रह सकती है.

यह गिरावट मुख्य रूप से मक्के की कीमतों पर निर्भर करेगी. केएन एग्री रिसोर्सेज के चेयरमैन और खाद्य नीति विशेषज्ञ जीके सूद के अनुसार भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है इसलिए सूखे वाले साल में ईंधन से ज्यादा भोजन को प्राथमिकता देनी होगी.
डिस्टिलरीज पर दबाव और सरकारी कदम
इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कंपनियों ने भारी कर्ज लेकर अपनी क्षमता लगभग 20 अरब लीटर प्रति वर्ष तक बढ़ा ली थी. अब ब्लेंडिंग कम होने से ओवरकैपेसिटी की समस्या खड़ी हो गई है. चार उत्पादकों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि वे 15 से 17 प्रतिशत ब्लेंडिंग की उम्मीद कर रहे हैं.
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सरकार ने पिछले महीने तेल कंपनियों को निर्देश दिया कि नई आपूर्ति सीजन में चीनी आधारित फीडस्टॉक से बने इथेनॉल की खरीद न करें. साथ ही मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 68.86 रुपये कर दी गई. इससे डिस्टिलरीज के मार्जिन पर दबाव बढ़ा है.
उत्पादक अब क्षतिग्रस्त अनाज की ओर रुख कर रहे हैं जिससे पशु चारे की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. मक्के का उत्पादन इस साल के रिकॉर्ड 55 मिलियन मीट्रिक टन से 15 प्रतिशत तक गिर सकता है. सूखे से प्रभावित किसान सर्दियों में मक्का की बुवाई बढ़ाने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि पानी की कमी है.
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राजनीतिक संवेदनशीलता
खाने की महंगाई राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है. 2027 की शुरुआत में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है. उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजनीति का बैरोमीटर माना जाता है. 2024 के आम चुनाव में वहां भाजपा को झटका लगा था. ई-20 कार्यक्रम पर पहले से ही विवाद रहा है.
वाहन चालक और कुछ ऑटोमेकर्स ईंधन दक्षता और इंजन घिसाव को लेकर चिंतित रहे हैं. सार्वजनिक प्रतिक्रिया के बाद सरकार ने साफ किया था कि 20 प्रतिशत से ऊपर ब्लेंडिंग बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. चावल के भंडार वैकल्पिक फीडस्टॉक के रूप में उपलब्ध हैं लेकिन सरकार को इसे इथेनॉल उत्पादकों को लगभग आधे दाम पर बेचना पड़ता है जिससे खर्च बढ़ता है.
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ऊर्जा सुरक्षा बनाम खाद्य सुरक्षा
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता ऊर्जा नीतियों को कितना प्रभावित कर सकती है. भारत ने अच्छे मॉनसून के वर्षों में इथेनॉल ब्लेंडिंग को चौगुना कर लक्ष्य हासिल किया था लेकिन एक खराब मॉनसून ने पूरे कार्यक्रम को पीछे धकेल दिया.
आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता फिर से बढ़ने से भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच ऊर्जा कीमतों का जोखिम भी बढ़ेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में वैकल्पिक फीडस्टॉक विकसित करने, जल प्रबंधन सुधारने और फसल विविधीकरण पर जोर देना होगा.
फिलहाल सरकार का रुख साफ है कि भोजन को ईंधन से ऊपर रखा जाएगा. इससे आम लोगों को राहत मिलेगी लेकिन इथेनॉल उद्योग और तेल आयात बचत के लक्ष्य को नुकसान पहुंचेगा. आने वाले महीनों में मक्का और चीनी की उपलब्धता तथा सरकारी नीतियों पर नजर रखना जरूरी होगा. यह घटनाक्रम आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति की राह में जलवायु अनुकूलन की जरूरत को रेखांकित करता है.