अमेरिका की राजनीति में भारतीय अमेरिकियों और भारतवंशियों को यूं तो पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी का वोटर माना जाता रहा है. रो खन्ना, राजा कृष्णमूर्ति, कमला हैरिस जैसे भारतीय मूल के प्रतिनिधियों के नाम हों या कैपिटल हिल पर समोसा कॉकस जैसे समूह के जरिए अपना दबदबा दर्ज कराने की कोशिश, कई बड़े पदों की रेस में उभरे भारतीय नाम अधिकतर डेमोक्रेट पार्टी से खेमे से ही आते रहै हैं.
मगर 2016 में राष्ट्रपति ट्रम्प के पिछले कार्यकाल ने इस वोट बैंक में कुछ सेंध लगाई थी. भारतीय मूल का अमेरिकी मतदाताओं के रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ रुझान और झुकाव में बड़ा बदलाव भी देखने को मिला था. भारत के प्रति उनके दोस्ताना रवैये, नीतियों पर समर्थन औऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मित्रता को इस बदलाव की बड़ी वजह भी माना गया. यहां तक कि इस समर्थन को बढ़ाने के लिए ट्रंप ने भी कई बार कहा कि जब तक वो व्हाइट हाउस में हैं तब तक भारत का सबसे भरोसेमंद दोस्त वहां है.
इस वादे पर भारत के लोगों ने भी और भारतवंशी अमेरिकियों ने भी विश्वास किया. नतीजा रहा कि 2024 की चुनावी रेस में डोनॉल्ड ट्रंप को फंडिंग से लेकर वोटिंग तक भारतीय मूल के अमेरिकियों का साथ मिला. कमला हैरिस जैसी भारतीय मूल की उम्मीदवार के मुकाबले भी कई जगह बड़ी संख्या में अमेरिका में मौजूद भारतवंशी मतदाताओं ने ट्रंप के समर्थन में वोट दिया.
मगर डोनॉल्ड ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस पहुंचने के कुछ ही दिनों में तस्वीर बदल गई. भारत और पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर में सुलह का श्रेय लेने की जिद से लेकर भारत पर टैरिफ की तलवार चलाने जैसे फैसलों ने भरोसे की डोर को कमजोर किया.
विस्कॉन्सन के काग्रेशनल चुनाव में उम्मीदवार से लेकर सोशल मीडिया पर ट्रंप की लंबे वक्त तक वकालत करने वाली पूर्णिमा नाथ जैसे चेहरों ना केवल सुर बदल चुके हैं बल्कि खुलकर यह कहते भी हैं कि बेतरतीब व बेतुके फैसलों ने उनका मोहभंग कर दिया.
इस मोहभंग की तस्वीर चुनावी नतीजों में नजर आती है. यही वजह है कि रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, सुहास सुब्रमण्यम जैसे उम्मीदवार अपनी सीटें फिर से जीत गए तो वहीं पिया डांडिया औऱ अमीष शाह जैसे प्रत्याशियों को भी कामयाबी हासिल हुई. जबकि धनबल और राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थन के बावजूद भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी ओहायो की गवर्नर पद रेस एमी एक्टन से हार गए.
मिड टर्म चुनाव में राष्ट्रपति ट्रंप के लिए जिस टेक्सास के नतीजे को बड़ा झटका माना जा रहा है वहां भी भारतीय अमेरिकी मतदाताओं के मूड की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या 60 लाख से कम है, यानी कुल आबादी का करीब डेढ़ प्रतिशत. मगर जब टेक्सास में एक रिपब्लिकन उम्मीदवार बो फ्रेंच ने यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास की निष्ठाओं पर सवाल उठाया, दक्षिण एशियाई मूल के छात्रों की एक तस्वीर एक तंज़ भरी टिप्पणी के साथ पोस्ट की. इसके बाद यह सवाल तेज हो गया कि आखिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने के बावजूद उनपर सवाल क्यों खड़े किए जाते हैं?
हाल ही में कार्नेगी एडोवमेंट और इंडियन अमेरिकन एटिट्यूड सर्वे में सामाने आया था जिसके मुताबिक डेमोक्रेट्स को वोट देने वालों में 35 प्रतिशत ऐसा मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी के विरोध में कर रहे हैं, अपनी पार्टी के समर्थन में नहीं. रिपब्लिकन मतदाताओं में यह आंकड़ा सिर्फ 17 प्रतिशत है. जानकार इसे 'नेगेटिव पार्टिज़नशिप' कहते हैं, यानी मतदाता अपनी पार्टी से जुड़ाव के बजाय विरोधी पार्टी से नाराज़गी के चलते वोट देते हैं.
भारतीय अमेरिकी मतदाताओं के मूड परिवर्तन में एक बड़ा फैक्टर एच1बी वीजा, बढ़ती महंगाई, वीजा शुल्क में बढ़ोतरी और ग्रीन-कार्ड से लेकर नागरिकता के रास्ते में बढ़ी रुकावटें भी माना जा रहा है. हालांकि इनमें से अधिकतर कारण वो हैं जिनके चलते अमेरिका के लातिनो, हिस्पैनिक और एफ्रो-एशियन मतदाताओं ने भी ट्रंप सरकार के खिलाफ वोट दिया.