BIT मेसरा के कुलपति (Vice-Chancellor) और आईआईटी कानपुर (2012-2017) के पूर्व निदेशक प्रोफेसर इंद्रनील मन्ना ने देश के जॉब मार्केट की बदलती जरूरतों के मुताबिक वर्कफोर्स को तैयार करने के तौर-तरीकों की नए सिरे से समीक्षा करने की वकालत की है.
भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी के पूर्व अध्यक्ष रहे प्रो. मन्ना ने 'इंडिया टुडे' के साथ एक एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि हालांकि छोटे कोर्स और समय-समय पर होने वाली रीस्किलिंग कर्मचारियों को खास नौकरियों के लिए कौशल हासिल करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि शिक्षा की नींव हमेशा बुनियादी सिद्धांतों पर ही टिकी रहे.
चूंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब हर क्षेत्र के पेशों को प्रभावित कर रहा है, ऐसे में प्रो. मन्ना का कहना है कि मुख्य सवाल यह नहीं है कि डिग्री प्रोग्राम्स का दौर खत्म हो गया है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम देश के युवाओं और प्रोफेशनल्स को इतना सक्षम बना रहे हैं कि जब उनके मौजूदा कौशल अपर्याप्त साबित हों, तो वे खुद को उसके मुताबिक ढाल सकें.
उनका मानना है कि यदि व्यक्तियों को बुनियादी बातों की मजबूत समझ दी जाए, तो उन्हें कम अवधि के लिए प्रशिक्षित करके ऐसे कौशल सिखाए जा सकते हैं जो तकनीकी बदलावों को देखते हुए उस समय प्रासंगिक हों. इसलिए बड़ा सवाल यह है कि क्या रीस्किलिंग के लिए केवल अनगिनत कोर्स करने की जरूरत है, या फिर शिक्षण संस्थान ऐसे स्पष्ट रास्ते तैयार कर सकते हैं जिनके जरिए लोग सीख सकें, अपने ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग कर सकें और काम के विशिष्ट क्षेत्रों की ओर बढ़ सकें.
भारत की शिक्षा प्रणाली इसे कैसे अपनाए?
प्रोफेसर मन्ना ने किसी खास काम के लिए दी जाने वाली ट्रेनिंग और उस शिक्षा के बीच स्पष्ट अंतर बताया जो किसी व्यक्ति को नया काम शुरू करने के योग्य बनाती है. उनका कहना है कि कोई व्यक्ति यदि किसी खास मशीन को चलाना या उसका रखरखाव करना सीखना चाहता है, तो उसके लिए कोई डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स पर्याप्त हो सकता है.
उन्होंने कहा, 'यदि आप किसी भी बड़े मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को देखें, खासकर हार्डवेयर सेक्टर में, तो वहां आमतौर पर वर्कफोर्स का ढांचा ऐसा होता है कि हर एक इंजीनियर पर लगभग 5 से 6 डिप्लोमाधारक और 10 से 12 सर्टिफिकेट स्तर के श्रमिक होते हैं.'
लेकिन जो व्यक्ति किसी सिस्टम को गहराई से समझना चाहता है, उसे विकसित करना चाहता है या उसके डिजाइन में आने वाले बदलावों के मुताबिक खुद को ढालना चाहता है, उसे एक मजबूत वैचारिक नींव की आवश्यकता होती है. विशिष्ट कौशल की जरूरत को पूरा करने की चाह रखने वालों के लिए उन्होंने कहा, 'एक निश्चित अवधि का शॉर्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम उनके लिए होता है.' हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि इस तरह की ट्रेनिंग को कभी भी डिग्री का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए.
बदलते वर्कप्लेस के लिए रीस्किलिंग क्यों जरूरी?
प्रोफेसर मन्ना का कहना है कि यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि कोई भी कौशल किसी व्यक्ति के पूरे कामकाजी जीवन के दौरान प्रासंगिक (relevant) बना रहेगा. जैसे-जैसे उद्योग बदलते हैं, कर्मचारियों के पास यह अवसर होना चाहिए कि वे दोबारा शिक्षा की ओर लौट सकें और अपने ज्ञान को अपडेट कर सकें.
उन्होंने कहा, 'इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आज जिसे आप प्रशिक्षित कर रहे हैं, उनका कौशल हमेशा प्रासंगिक बना रहेगा.' उन्होंने आगे जोड़ा, 'इसलिए उन्हें समय-समय पर खुद को फिर से अपडेट (replenish) करने की जरूरत होती है.'
उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की सीख केवल तकनीकी कौशल तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए. चूंकि एक विषय दूसरे विषय से तेजी से सीख रहा है, इसलिए बुनियादी ज्ञान को भी समय-समय पर फिर से टटोलने की जरूरत पड़ सकती है. खुद एक आईआईटीयन रहे प्रोफेसर मन्ना ने फिजिक्स (भौतिकी) और बायोलॉजी (जीव विज्ञान) के बीच बढ़ते गहरे संबंधों का हवाला देते हुए समझाया कि क्यों प्रोफेशनल्स को अपनी पारंपरिक अनुशासन की सीमाओं से बाहर निकलकर सीखने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, 'अब फिजिक्स बायोलॉजी को बेहतर तरीके से समझती है,' और साथ ही यह भी जोड़ा कि 'भौतिकविदों और जीवविज्ञानियों दोनों को इन दोनों को आपस में जोड़ना होगा, या कम से कम इनके संपर्क में रहना होगा.'
उन्होंने मेडिकल प्रैक्टिस को इस मेलजोल का एक अन्य उदाहरण बताया. उन्होंने कहा, 'आज एक डॉक्टर बहुत सारी तकनीक का उपयोग करता है,' और यह भी नोट किया कि चिकित्सा पेशेवरों को उन क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण की आवश्यकता हो सकती है जिनसे वे अपनी औपचारिक शिक्षा के दौरान परिचित नहीं थे. उन्होंने तर्क दिया कि यह आदान-प्रदान दूसरी दिशा में भी काम करना चाहिए: यानी तकनीक में प्रशिक्षित लोगों को भी यह समझना चाहिए कि 'शारीरिक प्रणालियां या कोई भी जैविक प्रणाली कैसे काम करती है.'
प्रोफेसर मन्ना ने तकनीक बदलने के साथ इंजीनियरों के लिए अपने ज्ञान को अपडेट करने की जरूरत को समझाते हुए एक उदाहरण भी दिया, 'जब हम आईसी इंजन से हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक ड्राइव की तरफ बढ़ते हैं, तो वाहन का डिजाइन वही रहता है. केवल पावर जनरेशन और ट्रांसमिशन के डिजाइन बदल जाते हैं,' उन्होंने आगे कहा कि किसी इंजीनियर को केवल एक ही तरह के वाहन के लिए प्रशिक्षित करना उसकी कार्यक्षमता को सीमित कर देगा. 'यदि आप किसी को केवल हाइब्रिड कार के लिए प्रशिक्षित करते हैं, तो वह व्यक्ति केवल हाइब्रिड कार को ही संभाल पाएगा, दूसरों को नहीं'.
AI के दौर में शिक्षा की समीक्षा की जरूरत
प्रोफेसर मन्ना का कहना है कि एआई (AI) का असर केवल इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मेडिसिन, खेल, संगीत, साहित्य और रचनात्मक कलाएं भी इसके बढ़ते उपयोग के दायरे में आएंगी और उन्हें इसके अनुसार प्रतिक्रिया देनी होगी. उन्होंने कहा, 'एआई एक ऐसी चीज बनने जा रहा है जो हर चीज को एक साथ प्रभावित करेगा,' और यह तर्क दिया कि हर अनुशासन को इसके अनुकूल खुद को ढालना होगा. इसके परिणामस्वरूप शिक्षण पद्धतियों, पाठ्यक्रम और शैक्षिक दृष्टिकोण में बदलाव करने की आवश्यकता होगी.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा की बुनियादी नींव की समीक्षा की जानी चाहिए, लेकिन उसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया जाना चाहिए. उनका उद्देश्य यह होना चाहिए कि छात्रों को किसी विषय के सिद्धांतों को समझने और उन्हें ऐसी समस्याओं पर लागू करने के लिए तैयार किया जाए जो शायद अभी तक सामने भी न आई हों. प्रोफेसर मन्ना ने शैक्षणिक संस्थानों में अधिक लचीलेपन की भी वकालत की. उन्होंने कहा, 'छात्रों और कामकाजी पेशेवरों दोनों के लिए अतिरिक्त कौशल हासिल करने और वापस पढ़ाई की ओर लौटने के अवसर पैदा करना ही वह चीज है जिसे हम एक नए ढांचे में जोड़ सकते हैं.'
उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रावधानों से प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करने का महज दिखावा बनने के बजाय इनोवेशन (नवाचार) को बढ़ावा मिलना चाहिए. प्रोफेसर मन्ना ने गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना इंजीनियरिंग शिक्षा के बेहिसाब विस्तार पर भी चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, 'हमने इंजीनियरिंग कॉलेजों को कुकुरमुत्ते की तरह उगने की छूट दे दी, जिसके परिणामस्वरूप इंजीनियरिंग शिक्षा की विश्वसनीयता को करारा झटका लगा है.'
इंजीनियरिंग सीटों में भारी वृद्धि की ओर इशारा करते हुए, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) के उपाध्यक्ष प्रोफेसर मन्ना ने सवाल उठाया कि क्या इस विकास की गति स्नातकों की मांग के अनुरूप थी या नहीं. BIT मेसरा के वीसी के लिए, डिग्री और छोटे पाठ्यक्रमों के बीच चल रही बहस का फैसला इनमें से किसी एक को चुनकर नहीं किया जा सकता. देश को विशिष्ट कार्यों के लिए प्रशिक्षित लोगों की भी उतनी ही जरूरत है जितनी उन लोगों की जो उन मांगों को पूरा करने के लिए बुनियादी सिद्धांतों से लैस हों जो अभी आकार भी नहीं ले पाई हैं. उन्होंने संकेत दिया कि असली चुनौती इन दोनों मोर्चों पर एक साथ योजना बनाने की है.
(चूंकि वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज के जॉब मार्केट के साथ तालमेल बिठाने या भविष्य की जरूरतों के अनुकूल खुद को ढालने में संघर्ष कर रही है, जिसके चलते अक्सर छात्र स्नातक होने से पहले ही इंडस्ट्री की बदलती मांगों के आगे खुद को तैयार नहीं पाते. इसके पीछे मूल समस्या यह है कि भारतीय शैक्षणिक ढांचा तेजी से हो रहे तकनीकी और आर्थिक बदलावों की रफ्तार के साथ कदमताल नहीं कर पा रहा है; इसलिए शिक्षा को ऐसा होना चाहिए जो व्यक्तियों को बाजार के विकसित होने के साथ-साथ प्रासंगिक बने रहने में सक्षम बनाए.)