पृथ्वी एक अनोखे मौसम पैटर्न के लिए जानी जाती है जो एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आसानी से प्रवाहित होता है. हालांकि, कभी-कभी सिस्टम के भीतर व्यवधान होते हैं जिनका वैश्विक प्रभाव होता है. ऐसी ही एक घटना है 'एल नीनो' (El-Nino) जो भूमध्य रेखा के आसपास प्रशांत महासागर में होती है.
एल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर पर हवाओं और समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव से बनती है. उन बदलावों का एक अनियमित पैटर्न होता है.एल नीनो की घटना का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. यह उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिक्स) और उपोष्णकटिबंधीय (सबट्रॉपिक्स) क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करता है और इसका संबंध दुनिया के हायर लैटिट्यूड क्षेत्रों से है. समुद्र की सतह के तापमान के गर्म होने के चरण को 'एल नीनो' और ठंडे होने के चरण को 'ला नीना' के रूप में जाना जाता है.
अगले तीन महीनों (अगस्त-सितंबर-अक्टूबर) में अल-नीनो का असर भारत के मॉनसून पर भारी पड़ सकता है. ECMWF की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के बड़े इलाकों में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है.
गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा रही, मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा रही है. यूरोप में जून के आखिरी सप्ताह में 10 हजार से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज होने के बाद वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है.
यूरोप में आई हीटवेव को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है. क्लाइमेट चेंज ने गर्मी इतनी बढ़ा दी कि करीब 1500 लोगों की मौत इससे जुड़ी पाई गई.
कुछ दिन पहले तक देशभर में हो रही थी झमाझम बारिश, लेकिन अब सैटेलाइट तस्वीरों में भारत का बड़ा हिस्सा बिना बारिश वाले बादलों के दिख रहा है. आखिर मौसम ने इतनी जल्दी करवट क्यों बदली?
दुनिया 2035 में नहीं पहुंची है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है उस समय के मौसम की डरावनी झलक अभी दिख रही है. आने वाले महीनों में कई देशों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं.
जुलाई की शुरुआत में मॉनसून ने जोरदार वापसी की है. राहत वाली यह बारिश अब कई राज्यों में बाढ़, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ा रही है.
समुद्र किनारे बसे मुंबई में भारी बारिश के बावजूद पानी क्यों नहीं निकलता? बाढ़ क्यों आ जाती है? क्या BMC, पुराना ड्रेनेज सिस्टम, क्लाइमेट चेंज और अल-नीनो इसके पीछे की वजह हैं.
पूरे देश में सूखा पड़ा है, लेकिन मुंबई में भारी बारिश हो रही है. इससे जनजीवन प्रभावित है. विशेषज्ञों का मानना है कि अल-नीनो और मौसम की अनियमितताएं मॉनसून के संतुलन को बिगाड़ रही हैं.
दिल्ली में आसमान में घने बादल छा रहे हैं लेकिन बारिश नहीं हो रही है. मॉनसून रुका हुआ है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो, हवा का रुख और जलवायु परिवर्तन के कारण देरी हो रही है.
WMO ने चेतावनी दी है कि इस साल जुलाई से सितंबर के बीच अल-नीनो तेजी से मजबूत होगा. इससे सूखा, भारी बारिश, लू और समुद्री हीटवेव बढ़ेंगी. भारत समेत कई देशों में कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा.
पहले रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने झुलसाया, अब वही मौसम जंगलों को धधका रहा है. फ्रांस में आग से निपटने के लिए हेलीकॉप्टर, विमान और हजारों दमकलकर्मी काम कर रहे हैं.
प्रशांत महासागर के अंदर करीब 14,500 किलोमीटर लंबी गर्म पानी की लहर ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. NASA के सैटेलाइट ने इस बदलाव को रिकॉर्ड किया, जिसके बाद अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने अल-नीनो की वापसी की पुष्टि की है. इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ सकता है.
पाकिस्तानी गर्म हवा और बंगाल की खाड़ी के कमजोर लो प्रेशर एरिया ने रुकावट डाली. अब सूखी हवा पीछे धकेली जा चुकी है, नया लो प्रेशर बन रहा है. 10 जुलाई तक पूरे मॉनसून की उम्मीद है.
अल-नीनो से यूरोप और अमेरिका जैसे ठंडे इलाके अचानक भीषण गर्मी की चपेट में आ गए हैं. प्रशांत महासागर के गर्म पानी ने हवाओं को बदला, जिससे हीटवेव बढ़ गईं. जलवायु परिवर्तन ने इसे और खतरनाक बना दिया.
भारतीय मौसम विभाग ने जुलाई के लिए मॉनसून का पूर्वानुमान जारी किया है. IMD ने अल नीनो के असर से देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई गई है. जून में भी रिकॉर्ड सूखे के बाद जुलाई में बारिश की कमी की आशंका है. इसका असर खेती पर पड़ सकता है.
इस साल मॉनसून की रफ्तार धीमी रहने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे जुलाई में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है. मौसम के इस बदलाव का असर खेती और जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका है. विशेषज्ञ मानते हैं कि समुद्री तापमान में बदलाव की वजह से पूरे सीजन की स्थिति प्रभावित हो रही है.
अल-नीनो सिर्फ मौसम नहीं बदलेगा, बल्कि खेती, अर्थव्यवस्था, महंगाई और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी कई साल तक असर डाल सकता है. ये भयानक तबाही लाएगा.
अल-नीनो के कारण दिल्ली में तापमान 42 डिग्री पहुंच गया है, लेकिन नमी बढ़ने से महसूस होने वाला टेम्परेचर 51 डिग्री हो गया है. वेट बल्ब इफेक्ट से गर्मी बेहद खतरनाक हो रही है. लोग परेशान हैं.
यूरोप में इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज और अल-नीनो है. अगर यही हाल रहा तो आने वाले सालों में ऐसी गर्मी और देखने को मिलेगी.
2025 में भारत में मौसम पहले से ज्यादा अनिश्चित रहा. 365 दिन में 360 दिन गर्मी रही है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि क्लाइमेट चेंज के साथ अल-नीनो भी इसकी एक बड़ी वजह हो सकता है.
यूरोप में पड़ रही रिकॉर्ड गर्मी अब पशुपालन पर भी असर दिखाने लगी है. फ्रांस में बड़ी संख्या में मुर्गियों की मौत के बाद विशेषज्ञ बढ़ते तापमान और मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर चेतावनी दे रहे हैं.