पृथ्वी एक अनोखे मौसम पैटर्न के लिए जानी जाती है जो एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आसानी से प्रवाहित होता है. हालांकि, कभी-कभी सिस्टम के भीतर व्यवधान होते हैं जिनका वैश्विक प्रभाव होता है. ऐसी ही एक घटना है 'एल नीनो' (El-Nino) जो भूमध्य रेखा के आसपास प्रशांत महासागर में होती है.
एल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर पर हवाओं और समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव से बनती है. उन बदलावों का एक अनियमित पैटर्न होता है.एल नीनो की घटना का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. यह उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिक्स) और उपोष्णकटिबंधीय (सबट्रॉपिक्स) क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करता है और इसका संबंध दुनिया के हायर लैटिट्यूड क्षेत्रों से है. समुद्र की सतह के तापमान के गर्म होने के चरण को 'एल नीनो' और ठंडे होने के चरण को 'ला नीना' के रूप में जाना जाता है.
एक नदी सूखी तो पूरे देश पर बिजली संकट का खतरा मंडराने लगा. हंगरी में डानुबे नदी का जलस्तर गिरने से न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रभावित हुआ और सरकार को लोगों से बिजली बचाने की अपील करनी पड़ी.
गर्मी का ऐसा वार कि शेरनियां भी नहीं बच पाईं. टोक्यो जू में 39 डिग्री तापमान और उमस के बीच 3 शेरनियों की मौत हो गई, जिसकी जांच अब भी जारी है.
प्रशांत महासागर में बन रहे साइक्लोन मॉनसूनी बादल को खींच रहे हैं. जिससे पश्चिमी भारत में बारिश कम हो रही है. ECMWF के अनुसार 2026 के पूर्वोत्तर मॉनसून में दक्षिणी तमिलनाडु, केरल और श्रीलंका में सामान्य से अधिक बारिश की संभावना है.
आसमान से बरसती गर्मी अभी थमने वाली नहीं है. मजबूत होता अल-नीनो आने वाले महीनों में तापमान को और ऊपर ले जा सकता है, जिसका असर दुनिया के कई हिस्सों में महसूस होगा.
अल-नीनो के बावजूद भारत का मॉनसून 'मेड इन इंडिया' मौसमी सिस्टम से टिका हुआ है. जुलाई अंत की भारी बारिश ने जून की कमी को कुछ हद तक संभाला, लेकिन अगस्त 11.8% घाटे से शुरू हो रहा है.
दुनिया रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के एक नए दौर में जा रही है. वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार सुपर अल-नीनो पिछले 150 सालों का सबसे ताकतवर बनेगा, जिसका असर दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है.
42.5 डिग्री सेल्सियस... सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि साउथ कोरिया के इतिहास की सबसे बड़ी गर्मी का रिकॉर्ड है. हालात ऐसे हैं कि सरकार को लोगों से कहना पड़ा- धूप में जाना बंद करें और सुरक्षित जगह पर पहुंचें.
गुजरात में बारिश सिर्फ बढ़ नहीं रही, बल्कि खतरा भी बढ़ा रही है. रेड अलर्ट के बीच जानिए आखिर कौन सा मौसम सिस्टम इसकी वजह बना और अगले 48 घंटे क्यों माने जा रहे हैं सबसे अहम.
जुलाई में मॉनसून ने बाजी पलटी, अब अगस्त में क्या होगा? IMD ने सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है. अल-नीनो का असर जारी रहेगा, जबकि IOD मॉनसून के लिए राहत ला सकती है.
एक तरफ रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, दूसरी तरफ बेकाबू जंगल की आग. फ्रांस और स्पेन में फैली लपटों ने 2.20 लाख लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया. वैज्ञानिक इसे बदलते मौसम का गंभीर संकेत मान रहे हैं.
लगातार बरसते बादल, पानी में डूबती सड़कें और राहत-बचाव में जुटी टीमें. गुजरात में आखिर ऐसा क्या हुआ कि कुछ घंटों की बारिश ने पूरे इलाके की रफ्तार थाम दी?
मॉनसून ने गुजरात में कहर बरपाया, 14 घंटे में 400-450 मिमी बारिश से बाढ़ आई. वैज्ञानिकों ने अल-नीनो का हौवा खड़ा किया लेकिन नेगेटिव पीडीओ को अंडरएस्टीमेट किया, जिसने मॉनसून को मजबूत बनाया.
सिर्फ 16 दिनों में 20 हजार से ज्यादा मौतें. फ्रांस से आए नए आंकड़ों ने दिखा दिया कि हीटवेव अब सिर्फ बढ़ता तापमान नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जान लेने वाला बड़ा क्लाइमेट क्राइसिस बन चुकी है.
पूरे देश में मॉनसूनी बादल दिख रहे हैं. बारिश भी हो रही है. लेकिन दिल्ली सूखी है. मध्य भारत में मॉनसून की स्थिति और पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली-NCR और पश्चिमी यूपी में बारिश नहीं हो रही.
इसरो की सैटेलाइट तस्वीरों में बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक फैला पूरा मॉनसूनी सिस्टम दिखा है, जिसने कई राज्यों में फिर से बारिश की रफ्तार बढ़ा दी.
अब अल-नीनो का सबसे खतरनाक रूप दिखेगा. मॉनसून उत्तर भारत के मैदानों की ओर शिफ्ट हो गया है. अगले कुछ दिन उत्तर भारत में मध्यम बारिश, मध्य भारत में भारी बारिश और दक्षिण में कम बारिश का अनुमान है.
न्यूयॉर्क में न आग लगी, न जंगल जले... फिर भी लोग धुएं से परेशान हैं. वजह है कनाडा के जंगलों में लगी भीषण आग, जिसका असर अब हजारों किलोमीटर दूर दिख रहा है.
अगले तीन महीनों (अगस्त-सितंबर-अक्टूबर) में अल-नीनो का असर भारत के मॉनसून पर भारी पड़ सकता है. ECMWF की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के बड़े इलाकों में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है.
गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा रही, मौतों का आंकड़ा भी बढ़ा रही है. यूरोप में जून के आखिरी सप्ताह में 10 हजार से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज होने के बाद वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है.
यूरोप में आई हीटवेव को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है. क्लाइमेट चेंज ने गर्मी इतनी बढ़ा दी कि करीब 1500 लोगों की मौत इससे जुड़ी पाई गई.
कुछ दिन पहले तक देशभर में हो रही थी झमाझम बारिश, लेकिन अब सैटेलाइट तस्वीरों में भारत का बड़ा हिस्सा बिना बारिश वाले बादलों के दिख रहा है. आखिर मौसम ने इतनी जल्दी करवट क्यों बदली?