नौ दिन नंगे पैर रहे. जमीन पर बैठे तक नहीं. तेल, नमक और मिर्च-मसालों का त्याग किया. नींद आने पर भी जमीन पर सोए नहीं. सुनकर हैरानी होगी, लेकिन यह अनोखी परंपरा आज भी महाराष्ट्र के सतारा जिले के वाई तालुका स्थित पांडे गांव में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. इस वर्ष महाराष्ट्र में पड़े सूखे का संकट दूर हो जाए और किसानों के जीवन में खुशहाली आए, इसी कामना के साथ व्रतधारियों ने भगवान भैरवनाथ और माता जोगेश्वरी के चरणों में नतमस्तक होकर प्रार्थना की है.
काल भैरवनाथ के ‘खड़े रहकर किए जाने वाले नवरात्र’ में करीब 350 से 400 श्रद्धालु शामिल हुए हैं. खास बात यह है कि इस धार्मिक उत्सव में हिंदू-मुस्लिम एकता की भी खूबसूरत मिसाल देखने को मिल रही है. श्रद्धालु यहां 9 दिन तक खड़े रहकर व्रत कर रहे हैं. यह पैरों में न तो चप्पल पहन सकते हैं और न ही नींद आने पर जमीन पर सो सकते हैं.
श्रद्धालुओं के शरीर पर सफेद वस्त्र, हाथों में सहारे के लिए छड़ी और मन में काल भैरवनाथ के प्रति अटूट आस्था है. यह भक्तिमय माहौल गांव के सारे लोगों को आकर्षित कर रहा है. रात में आराम करने के लिए मंदिर में रस्सी के झूले बांधे जाते हैं. नींद आने पर श्रद्धालु इन झूलों का सहारा लेकर विश्राम करते हैं. लेकिन जमीन पर सोकर अपना संकल्प नहीं टूटने दे रहे.
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल
इस परंपरा की खासियत केवल कठिन व्रत तक सीमित नहीं है. गांव के हिंदू भाइयों के साथ मुस्लिम समुदाय के लोग भी इस उत्सव में शामिल होते हैं. इस तरह यहां धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सद्भाव और आपसी एकता की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है. रात में भजन, कीर्तन, गोंधल और वाघ्या-मुरली के पारंपरिक कार्यक्रमों से पूरा गांव भक्तिरस में डूब जाता है. अष्टमी की रात जागरण होता है. नवमी के दिन भगवान का कौल लिया जाता है और विजयादशमी पर सीमोल्लंघन की परंपरा निभाई जाती है.
करीब 350 साल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पांडे गांव के लोग पूरी श्रद्धा के साथ अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं. श्रद्धालुओं का कहना है कि काल भैरवनाथ के प्रति हमारी गहरी श्रद्धा है. हमें पूरा विश्वास है कि भगवान की कृपा हमारे परिवार पर हमेशा बनी रहती है. इसी आस्था और भक्तिभाव के साथ हम इस परंपरा को आज भी निभा रहे हैं. पांडे गांव के इस उत्सव में धार्मिक आस्था के साथ गांव की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता भी मजबूत होती दिखाई देती है.
‘सोना लूटने’ की परंपरा
विजयादशमी के दिन भगवान का कौल लेकर सीमोल्लंघन की दिशा तय की जाती है. इसके बाद गांव की सीमा पर जाकर ग्रामीण एक-दूसरे को आपटे के पत्ते देते हैं. इन्हें सोने का प्रतीक मानकर ‘सोना लूटने’ की परंपरा निभाई जाती है. इसके बाद व्रतधारी अपना उपवास खोलते हैं और इस अनोखे व्रत का समापन होता है. कहते हैं कि इस गांव में समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन काल भैरवनाथ के प्रति श्रद्धा और 350 साल पुरानी यह परंपरा आज भी कायम है.