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मक्का की खातिर क्या पाकिस्तान 'अबाबिल' बनेगा?

इस्लामी मान्यताओं में 570 ईस्वी में अबाबिल पक्षियों ने मक्का को अबराहा के हाथियों से बचाया था. आज यमन के हूती ड्रोनों के निशाने पर मक्का है. 'मक्का डिफेंस पैक्ट' और आसिम मुनीर के 'फरिश्तों की गैबी मदद' वाले दावों के बावजूद पाकिस्तान सिर्फ जज्बाती ट्वीट कर रहा है. सवाल उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान रियाल की खातिर ही सही, सचमुच 'अबाबिल' बनेगा?

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मक्का पर हूतियों के कथित हमले के बाद से सबकी निगाहें पाकिस्तान पर टिकी है, जो खुद को मक्का-मदीना का मुहाफिज कहता है.
मक्का पर हूतियों के कथित हमले के बाद से सबकी निगाहें पाकिस्तान पर टिकी है, जो खुद को मक्का-मदीना का मुहाफिज कहता है.

इस्लामी तारीख के पन्नों में 570 ईस्वी का वह वाकया दर्ज है, जब यमन के हुक्मरान अबराहा ने भारी-भरकम हाथियों का लश्कर लेकर मक्का पर हमला बोला था. मकसद था काबा को ढहाना. कहा जाता है कि तब कुदरत ने किसी बहुत बड़ी फौज या जनरलों को नहीं भेजा, बल्कि नन्हे-मुन्ने 'अबाबिल' पक्षियों को मैदान में उतारा. अबाबिल अपनी चोंच में छोटे-छोटे गर्म कंकड़ दबाकर लाए और अबराहा की अजीम फौज पर ऐसी बमबारी की कि पूरी की पूरी सेना राख में तब्दील हो गई. भले कुरान में अबाबिल को बहुत डिटेल में नहीं समझाया गया है, और न ही इस बात के कोई सबूत मिलते हैं कि अरब में कभी हाथी थे भी. लेकिन, मक्का को बचाने आए अबाबिल की कहानी सूरह अल-फील का हवाला देते हुए बहुत जज्बात के साथ सुनी और सुनाई जाती है.

जमाने की सुई घूमी है और आज 2026 में इतिहास एक बार फिर यमन से उठे एक खतरे के साथ मोड़ लेता दिख रहा है. फर्क बस इतना है कि इस बार यमन से हाथियों का लश्कर नहीं, बल्कि हूती बागियों के सुसाइड ड्रोन मक्का की सरहद की तरफ उड़े हैं. जैसा कि सऊदी अरब की ओर से बताया गया है.

मुस्लिम जगत के लिए मक्का पर हमला कोई छोटी बात नहीं है. आसमान से डिवाइन परिंदों के आने का इंतजार करने के बजाय पूरी दुनिया की निगाहें एक ऐसे मुल्क पर टिक गई हैं, जो खुद को पूरी उम्माह (मुस्लिम जगत) का इकलौता परमाणु-संपन्न 'अबाबिल' समझता है. हमारा पड़ोसी पाकिस्तान.

शरीफ ने उड़ाए ट्विटर वाले 'अबाबिल'

सऊदी अरब से जैसे ही मक्का के करीब हूती ड्रोन हमले की खबर आई, पाकिस्तान के वजीरे आजम शाहबाज शरीफ ने बिना एक पल गंवाए अपने एक्स हैंडल से एक बहुत ही संजीदा और सख्त बयान दाग दिया. शरीफ ने पूरी शिद्दत से गम जताया, मानो ट्वीट के री-ट्वीट से ही हूती बागियों के ड्रोन हवा में भस्म हो जाएंगे.

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लेकिन बात सिर्फ जज्बाती ट्वीट तक सीमित नहीं है. सवाल यह है कि जब मक्का की हिफाजत की बारी आती है, तो पाकिस्तान अचानक 'कागजी शेर' क्यों बन जाता है? वजह बहुत प्रैक्टिकल है. यमन के हूतियों को ईरान का समर्थन है. यदि पाकिस्तान खुलकर सऊदी के पक्ष में उतरता है तो उसके लिए शिया वर्ल्ड में उठना-बैठना मुश्किल हो जाएगा.

वैसे तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच पिछले दिनों हुए 'मक्का डिफेंस पैक्ट' का ढिंढोरा खूब जोरशोर से पीटा गया था. कहने को तो यह एक ऐसा समझौता है कि 'एक पर हमला, सब पर हमला' माना जाएगा. लेकिन इस पैक्ट में एक बहुत ही खूबसूरत 'डिस्क्लेमर' छिपा है- यह सुरक्षा गारंटी 'पुराने चले आ रहे विवादों' पर लागू नहीं होती. सऊदी और यमन के बीच की कबिलाई ‘महाभारत’ तो वैसे भी सदियों पुरानी है.

नजरें 'हरमैन शरीफैन' के मुहाफिज आसिम मुनीर पर

पाकिस्तान के सेना प्रमुख चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (फील्ड मार्शल) आसिम मुनीर अपनी तकरीरों में अक्सर कहते सुने गए हैं कि अल्लाह ताला ने पूरी दुनिया के 57 मुस्लिम मुल्कों में से सिर्फ पाकिस्तान की फौज को 'हरमैन शरीफैन' (मक्का और मदीना) का मुहाफिज (रक्षक) बनने का शर्फ (सम्मान) बख्शा है.

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अब जब मक्का पर हमले की खबर आ चुकी है, तो मुस्लिम उम्मा पाकिस्तानी सेना की तरफ देख रही है. जिसने खुद को हरमैन शरीफैन का ठेकेदार घोषित कर रखा है, और जिसके पास फरिश्तों की सीधी सप्लाई लाइन मौजूद है.

'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद इस्लामाबाद में उलेमा कॉन्फ्रेंस के एक जलसे के मंच से आसिम मुनीर ने बाकायदा ऐलान किया था कि जंग के दौरान उनकी फौज को 'गैबी इमदाद' (फरिश्तों की मदद) मिली थी. मुनीर साहब का तो दावा था कि उन्होंने अपनी आंखों से फरिश्तों को पाकिस्तान की ढाल बनते देखा है.

आसिम मुनीर और उनकी जज्बाती सेना के पास अपनी बात सच साबित करने का इससे बेहतरीन मौका दूसरा नहीं हो सकता. मक्का की रक्षा के लिए मुनीर के पास मौका है कि वे ‘अबाबिल’ बन जाएं. नाम का नाम होगा, और सऊदी शाह सलमान की तरफ से रियालों की भारी-भरकम बारिश अलग से होगी.

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