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ओडिसी... नोलन के अहंकार की महागाथा!

क्रिस्टोफर नोलन की ‘ओडिसी’ को देखने ताऊ वैसे ही बैंकॉक तक गए, जैसे नोलन चाहते हैं कि लोग इसे देखें. लौटने पर थिएटर से निराशा थी और फिल्म से भी. यह फिल्म समीक्षा नहीं, एक मायूसी का बयान है.

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क्रिस्टोफर नोलन कि फिल्म 'द ओडिसी' चर्चा में है
क्रिस्टोफर नोलन कि फिल्म 'द ओडिसी' चर्चा में है

‘महान होना वरदान है, लेकिन यह जान जाना कि आप महान हैं, अभिशाप है.’

-यह मेरे ‘क्रुंग थेप महा नाखोन ओडिसी’ से निकला एक विचार

है. (क्रुंग थेप महा नाखोन थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक का थाई भाषा में आधिकारिक और संक्षिप्त नाम है. इसका अर्थ है ‘देवदूतों का महानगर’.)

मैं स्तुति वाला हिस्सा छोड़ रहा हूं. आप उसे पहले ही पढ़ चुके हैं- हर उस पब्लिकेशन में जिसका डॉट कॉम वाला पता है. वही पैराग्राफ, जिसमें बताया गया है कि क्रिस्टोफर नोलन ने फैन फॉलोइंग में जेम्स कैमरन और स्टीवन स्पीलबर्ग को पीछे छोड़ दिया है. कि वह सिर्फ आपकी आंखों में आंसू नहीं लाते, दिमाग से भी खेलते हैं. और यह कि आखिरकार पश्चिमी सभ्यता की सबसे पुरानी महागाथाओं में से एक को वह बड़ा सिनेमाई ट्रीटमेंट मिल गया, जिसकी वह हकदार थी.

मैं उन तगड़े रोस्ट और मजाक उड़ाने वाले हमलों को भी छोड़ रहा हूं, जो एलन मस्क वाले धड़े की तरफ से आए- खासकर इस बात पर कि हेलेन गोरी क्यों नहीं है. और वे मीम भी छोड़ देता हूं जिनमें लोग फिल्म को वैसे नहीं देख रहे, जैसे नोलन चाहते थे. ये सब बहुत हो चुका. मेरी दिलचस्पी अब उस चीज में है जो बची है- एक ऐसे जीनियस में, जिसे पता है कि वह जीनियस है और जो सबके सामने लड़खड़ा रहा है, लेकिन अपने लड़खड़ाने को भी विजन बताने पर अड़ा हुआ है. बस, मेरी असहमति के असली मुद्दे ये हैं.

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पहले फिल्म की बात करते हैं. आखिर कंटेंट ही राजा है और नोलन हॉलीवुड के मौजूदा राजघराने के सबसे बड़े नामों में हैं. होमर की ‘ओडिसी’ पर बनी यह फिल्म नोलन की अपनी सिनेमाई भाषा में सुनाई गई कहानी है. और सीधी बात यह है कि फिल्म उम्मीद से कमतर है. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह हाइप और उम्मीदों के बोझ तले दब गई है. अपने दम पर भी यह फिल्म कमजोर है. जब विराट कोहली कम रन बनाते हैं तो निराशा होती है. संदीप सिंह वही करें तो उतनी नहीं होती. नोलन ने कई साल पहले अपनी ही कसौटी इतनी ऊंची कर दी थी कि अब उन्हें उसी के पार जाना है.

‘ओडिसी’ को फिल्म में ढालना आसान काम नहीं है. यह ऐसी महागाथा है जो इंसान के चरित्र को खोलती है. उसकी जड़ें ग्रीक हैं, लेकिन उसमें जो बातें हैं, वे किसी एक देश की नहीं. वे दुनिया के हर समाज में समझी जा सकती हैं. इसीलिए सिर्फ दुस्साहसी फिल्ममेकर ही इसे फिर से बनाने की कोशिश करता है. मुझे तथाकथित ‘वोक’ बदलावों से कोई शिकायत नहीं है. हेलेन की भूमिका बदलना हो, एथेना की कास्टिंग बदलना हो, यूरिलोकस का किरदार किसी भारतीय अभिनेता को देना हो या किसी जापानी आदमी को सायरन के जाल में फंसते दिखाना हो- एक निर्देशक कहानी की आत्मा को बरकरार रखते हुए उसका खोल बदल सकता है. इसलिए मेरी समस्या वोकिज्म नहीं है.

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मेरी समस्या यह है कि नोलन ने इतने शानदार कलाकारों के बावजूद अपने मुख्य किरदारों को भीतर से खोखला कर दिया. और जिस नतीजे के लिए इन कलाकारों से इतना कुछ करवाया गया, उसका भी हांसिल कुछ खास नहीं. मैट डेमन का वजन करीब 86 किलो से घटाकर 76 किलो किया गया. उन्होंने ग्लूटेन छोड़ दिया. वाइकिंग वाले शिप चलाना सीखा. खुले भूमध्यसागर में सचमुच बीमार हुए और उन्होंने जहाज के किनारों पर झुककर वाकई में उल्टी की. सिसिली में रोज पहाड़ी पर बने किले तक पैदल गए. फिर आइसलैंड की उजली रातों में हेड्स वाला सीक्वेंस शूट करते हुए सच में पूरी तरह भीगे रहे. और इन सबके बाद पर्दे पर जो ओडेसियस मिलता है, वह बस उदास और बोझिल आदमी है. उस चालाक, धूर्त और हर रास्ते का हल निकाल लेने वाले ओडेसियस से बहुत दूर, जिसे हम महागाथा में जानते हैं.

जरा उस उदासी को ध्यान से देखिए. यहीं असली धोखा छिपा है. डेमन का ओडेसियस अपराधबोध में डूबा हुआ आदमी है. ट्रॉय में हुए कत्लेआम का बोझ वह ऐसे ढो रहा है जैसे कोई ईसाई अपने कंधे पर क्रॉस ढोता है और उसे उतार नहीं सकता. यह गलत विचार को निभाने वाला शानदार अभिनय है. होमर का ओडेसियस ऐसा आदमी नहीं था. वह पोलिट्रोपोस था- कई रास्ते जानने वाला, चालाक, हर मोड़ पर नया रास्ता निकालने वाला आदमी. उसके लिए तरीका उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जब तक अंत में वह अपने घर लौट सके.

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ट्रॉय एक काम था. लकड़ी का घोड़ा एक चाल थी. काम खत्म हुआ और वह घर के लिए निकल पड़ा. रातों की नींद उड़ाने वाला अपराधबोध उसके हिस्से में नहीं था. यही उसकी असली खूबी थी- उसकी नैतिक चालाकी, उसकी धूर्तता. नोलन ने उस आत्मा को निकालकर उसकी जगह पछतावा रख दिया है. क्योंकि पछतावा देखने में गहराई जैसा लगता है. लेकिन वह गहराई नहीं है. वह बस ऐसा आदमी दिखता है जो कहीं और होना चाहता है. और फिल्म की लंबाई देखते-देखते दर्शक भी यही महसूस करने लगता है.

आर्गोस को ही लीजिए. वह बूढ़ा कुत्ता, जो युद्ध और सालों भटकने के बाद भी सिर्फ इसलिए इंतजार करता है कि एक दिन अपने मालिक को पहचान सके, सिर उठाए और फिर मर जाए. होमर को उस कुत्ते के लिए सिर्फ चार लाइनें चाहिए थीं. लेकिन उन चार लाइनों से वह आपका दिल तोड़ देता है. नोलन आर्गोस को फिल्म में लाते हैं. उस पल के लिए माहौल बनाते हैं. आपको उस भावुक क्षण का इंतजार करवाते हैं और फिर... कुछ नहीं. वह पल आता ही नहीं.

आप बैठे इंतजार करते हैं कि अब कुछ होगा. लेकिन कुछ नहीं होता. और आप सोचते हैं- ऐसा क्यों? क्या तीन घंटे की फिल्म में एडिटिंग के दौरान वह हिस्सा कट गया? ह्यूब्रिस? यानी अपनी महानता का अहंकार? या फिर वह एक जवाब जो इस पूरी फिल्म को चुपचाप समझा देता है- मैं नोलन हूं. मुझे कुछ समझाने की जरूरत नहीं. यह वाक्य फिल्म के हर फ्रेम के नीचे ऐसे बजता रहता है जैसे कोई तानपुरा, जिसे एक बार सुन लेने के बाद आप अनसुना नहीं कर सकते. मैं नोलन हूं. कुत्ते के उस पल को छोड़ सकता हूं. मैं नोलन हूं. चालाक ओडेसियस को उदास बना सकता हूं. मैं नोलन हूं. बाकी खाली जगहें आप खुद भरिए, क्योंकि मैंने तय कर लिया है कि खाली जगह ही आर्ट है.

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याद रखने वाली बात यहां है. नोलन के सिनेमा में इंसानियत, उसकी असली गर्माहट, तब आई जब वे उसे उन जगहों में छिपाकर लाते हैं जहां उसकी कोई जरूरत नहीं लगती. एक सपने में डाली गई डकैती में. ब्लैक होल के भीतर. रिलेटिविटी की दरारों में. उन्होंने विज्ञान को महसूस करवाया था. वही उनकी महानता थी. अब जब महानता पर मुहर लग चुकी है और वह खुद एक ट्रेंड बन चुकी है, तो उन्होंने उसे चुपचाप फिल्म में घुसाना बंद कर दिया है. अब वह उसका ऐलान करते हैं. किसी कलाकार को बार-बार यह बताया जाए कि वह महान है तो एक समय के बाद वह वही चीज छोड़ देता है जिसने उसे महान बनाया था. क्योंकि वह चीज थी- दर्शक के साथ उदार होना. और जब आपको लगने लगे कि दर्शक आपकी महानता देखकर विस्मित होने के लिए बाध्य है, तो उदार रहना मुश्किल हो जाता है.

याद रखिए, होमर का ओडेसियस हो या नोलन का, दोनों इंसान हैं. फर्क असलियत का है. नोलन का इसके साथ एक इतिहास भी है. उन्होंने ‘द मशीनिस्ट’ में 54 किलो के कंकाल नुमा दिख रहे क्रिश्चियन बेल को सिर्फ पांच महीने में 100 किलो के बैटमैन में बदल दिया. रोज करीब 6,000 कैलोरी खिलाईं. फिर कहा कि 14 किलो वजन घटाओ क्योंकि बैटमैन का सूट फिट नहीं आ रहा. माफ कीजिए, अहंकार नहीं- फ्रेम फिट नहीं आ रहा था.

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उन्होंने टॉम हार्डी को बैन का इतना तंग मास्क पहना दिया कि हार्डी ने खुद उसे क्लॉस्ट्रोफोबिक बताया. पहले ट्रेलर में उसकी आवाज इतनी दब गई कि डायलॉग समझ में ही नहीं आए. फिल्म रिलीज होने के बाद इसका पता चला और फिर बाद में आवाज ठीक करनी पड़ी. उन्होंने ‘ओपेनहाइमर’ के लिए सिलियन मर्फी को महीनों तक रोज एक बादाम ही खाने के लिए दी ताकि उनकी आंखों में वह पीछा किए जाने वाला भाव आ सके. नोलन शायद सचमुच मानते हैं कि पर्दे पर सच्चाई पैदा करने के लिए कलाकार को तकलीफ से गुजरना जरूरी है. ‘ओडिसी’ की दिक्कत यह है कि इस बार इस सारी तकलीफ से एक परेशान आदमी नहीं, एक बुझा हुआ आदमी पैदा हुआ है.

टॉम हॉलैंड का टेलीमेकस भी अपनी पूरी क्षमता के बावजूद बर्बाद हो जाता है. जेंडाया एथेना बनी हैं. मुझे ग्रीक देवी के रूप-रंग को बदलने से कोई परेशानी नहीं है. लेकिन एथेना की संगमरमर की मूर्तियों को देखते आए हम जिस आकृति की कल्पना करते हैं, वह यहां नहीं मिलती. हिमेश पटेल का यूरिलोकस शायद इकलौता किरदार है जिसे कुछ हद तक मांस-मज्जा मिली है. कुछ हद तक. बाकी लगभग सभी किरदार सतही हैं. इसमें वे वर भी शामिल हैं जो पेनिलोपी के आसपास मंडराते हैं. वे इतने खतरनाक नहीं बन पाते कि अंत में उनका कत्लेआम कोई जस्टिस जैसा लगे. इसलिए क्लाइमेक्स में जो होना चाहिए था, वह क्लाइमेक्स जैसा लगता ही नहीं.

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और इनके पीछे कलाकारों की ऐसी लंबी सूची है, जैसे किसी अवॉर्ड सीजन की ड्रीम टीम हो, लेकिन ज्यादातर कलाकार ग्रीनरूम के बाहर अपनी बारी का इंतजार करते रह जाते हैं. ऐन हैथवे की पेनिलोपी- वह किरदार जिसे पूरी कविता को अपनी धैर्य की ताकत से संभालकर रखना है- उसे हैंडलूम और एक दूर तकती नजर से ज्यादा कुछ नहीं मिलता. लुपिता न्योंगो हेलेन ऑफ ट्रॉय और क्लाइटेमनेस्ट्रा, दोनों बनी हैं. कागज पर यह डबल कास्टिंग कमाल की लगती है.

एक ही युद्ध से तबाह हुई दो औरतों के चेहरे एक ही होना कितना दिलचस्प आइडिया है. लेकिन फिल्म दोनों को इतना कम समय देती है कि इस विचार की समझदारी साबित ही नहीं हो पाती. चार्लीज थेरॉन कैलिप्सो बनी हैं. सामंथा मॉर्टन सर्सी हैं. रॉबर्ट पैटिनसन वर एंटिनस के रूप में हमेशा की तरह खूबसूरत तरीके से उदास हैं. जॉन लेगुइजामो वफादार सूअर चराने वाले यूमेयस के रूप में थोड़ी देर के लिए आते हैं. इनमें से आधे किरदार किसी शानदार नए अभिनेता से भी कराए जा सकते थे, जिसकी फीस इन सितारों की दस प्रतिशत होती, और शायद किसी को फर्क भी नहीं पड़ता. इतने सारे शानदार कलाकार इसलिए नहीं जुटाए जाते कि उन्हें बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और शानदार बैकग्राउंड स्कोर के बीच एक्स्ट्रा कलाकार जैसा काम दिया जाए.

और यह एक-आयामीपन सिर्फ उन किरदारों तक सीमित नहीं है जिन्हें कम समय मिला है. यह उन किरदारों में भी है जिन्हें स्क्रीन टाइम मिला है. ‘ओडिसी’ का लगभग हर किरदार एक ही भावना लेकर आता है और उसी भावना के साथ चला जाता है. ओडेसियस उदास है. उदास रहता है. और जब कुछ समझ न आए तो थोड़ा और उदास हो जाता है. एथेना सख्त है. टेलीमेकस नाराज है. पेनिलोपी इंतजार करती है. होमर की महानता यह थी कि उन्होंने इन सभी किरदारों को दूसरा गियर दिया था.

एथेना का स्नेह धीरे-धीरे अधीरता में बदलता है. पेनिलोपी का धैर्य धीरे-धीरे अपने पति जितनी ही चालाकी में बदल जाता है. पति पहले मजेदार लगते हैं, फिर घटिया. नोलन में ये सब कभी-कभी झलकते जरूर हैं. कैमरा इधर घूमता है, उधर घूमता है और अचानक कोई मानवीय पल दिख जाता है. लेकिन फिर गायब. नोलन ने हर किरदार को एक विशेषण में समेट दिया है और इस सपाटपन को गंभीरता का नाम दे दिया है. यह गंभीरता नहीं है. यह ह्यूब्रिस है- अपनी महानता पर इतना भरोसा कि सपाटपन भी आपको गहराई लगने लगे.

फिर आता है फिल्म का खुद को समझाने से साफ इनकार. नोलन कहानी के जरूरी जोड़ काट देते हैं और फिर एक ऐसे नरभक्षी दानवों वाले युद्ध पर जरूरत से कहीं ज्यादा समय लगाते हैं जो न किरदारों में कुछ जोड़ता है, न कहानी में. ऐसा सीन जिसे कोई बेरहम एडिटर सिर्फ इसीलिए रखेगा क्योंकि वो बहुत महंगा दिख रहा है.

दूसरी तरफ कैलिप्सो के साथ रहते हुए ओडेसियस को जैसे यह याद ही नहीं कि उसका एक परिवार है. पेनिलोपी का कोई दर्द नहीं. घर लौटने की कोई बेचैनी नहीं. यह कोई साहसी कलात्मक फैसला नहीं है. यह कहानी की निरंतरता की गलती है, जिसे मजेदार टोपी पहना दी गई है. होमर हर भटकाव की वजह बताता है.

देवता क्यों दखल देते हैं. कौन-सा लालच सामने आता है. भूलने की कीमत क्या है. नोलन वजह छोड़ देते हैं और उम्मीद करते हैं कि दृश्य उस गड्ढे को ढक देंगे. मैं नोलन हूं. ओडेसियस को यह याद रखने की जरूरत नहीं कि उसकी पत्नी है. मेरे पास आपको दिखाने के लिए शानदार कैमरा है.

जिन दर्शकों ने कविता नहीं पढ़ी है- और ऐसे दर्शक जिनके बारे में आलोचक भी मानेंगे कि वे थिएटर से निकलकर पार्किंग में खड़े होकर फिल्म की कहानी के टुकड़े जोड़ते हैं. तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद दर्शकों को दिया गया यह अजीब-सा होमवर्क है. वह भी ऐसी फिल्म के लिए जिसकी लागत कथित तौर पर किसी छोटे देश की जीडीपी जितनी है.

और यहीं फिल्म की नाकामी और फॉर्मेट को लेकर नोलन का जुनून एक ही बीमारी लगने लगते हैं. आईमैक्स 70 एमएम. एक ऐसा निर्देशक जो इस बात में इतना डूबा हुआ है कि फ्रेम कैसे शूट हुआ, किस फिल्म स्टॉक पर शूट हुआ, किस आस्पेक्ट रेशियो में है और आवाज कितने डेसिबल पर रिकॉर्ड होगी. उसके पास यह सोचने की जगह कम बचती जाती है कि ओडेसियस ऐसा है क्यों. नोलन फॉर्मेट को ही खुदा मान बैठे. और इसकी कीमत कलाकारों ने अपने सबसे अच्छे अभिनय से चुकाई.

नोलन ने ‘द ओडिसी’ पूरी तरह आईमैक्स फिल्म पर शूट की है. ऐसा करने वाली यह पहली फीचर फिल्म है. करीब 20 लाख फीट फिल्म इस्तेमाल हुई. आईमैक्स कैमरे अपने शोर के लिए बदनाम हैं. इसलिए आईमैक्स ने नोलन के लिए नया कैमरा बनाया- ‘कीगली’. यह पुराने कैमरे से 30 प्रतिशत शांत था. कार्बन फाइबर बॉडी थी और एलसीडी व्यूफाइंडर था. लेकिन बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए इतना काफी नहीं था. इसलिए कैमरे को 400 पाउंड के एक खास अकॉस्टिक ब्लिंप के अंदर बंद किया गया, ताकि साउंड रिकॉर्डिस्ट साफ संवाद पकड़ सके. आईमैक्स के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ. क्योंकि आईमैक्स 70 एमएम कैमरे की रील करीब तीन से चार मिनट ही चलती है, इसलिए शूटिंग टीम एक दूसरा कैमरा लोड करके तैयार रखती है. यानी एक बातचीत शूट करने का भी यह असाधारण रूप से महंगा तरीका है.

बात सिर्फ इतनी है कि नोलन के शॉट्स की जरूरत पूरी करने के लिए पूरा इंडस्ट्रियल हार्डवेयर दोबारा बनाया गया. उन्होंने ‘टेनेट’ के इनवर्टेड सीक्वेंस दो बार शूट किए थे- एक बार आगे से और एक बार पीछे से. कलाकारों को उलटी दिशा में कोरियोग्राफी सीखनी पड़ी. कहीं ग्रीन स्क्रीन नहीं. तकनीकी तौर पर शानदार. इस पर कोई बहस नहीं. लेकिन इतनी महंगी तकनीक कमरे में मौजूद बाकी हर चीज को पीछे धकेल देती है. अभिनेता के चेहरे को भी. और दुर्भाग्य से, कहानी की आत्मा को भी.

जो हमने देखा वह आईमैक्स के नाम पर बड़े पर्दे पर चल रही एक डिजिटल फाइल थी. क्योंकि आईमैक्स 70 एमएम को उन दर्शकों तक पहुंचाना आसान नहीं है, जिनके लिए फिल्म बनाई गई है. आईमैक्स 70 एमएम की रीलों को थिएटर तक फिजिकली भेजना पड़ता है. ये डिजिटल फाइल नहीं, असली फिल्म प्रिंट होते हैं. इन्हें कई भारी केसों में भेजा जाता है. फिर प्रोजेक्शनिस्ट उन्हें हाथ से जोड़ते हैं. इसके बाद अलग-अलग हिस्सों को एक विशाल पांच से छह फीट चौड़ी सपाट प्लेट जैसी मशीन पर चढ़ाया जाता है.

नोलन ने फिल्म को आईमैक्स के 1.43:1 एक्सपैंडेड आस्पेक्ट रेशियो में शूट किया है. लगभग चौकोर फ्रेम. लेकिन दुनिया में सिर्फ 41 थिएटर ऐसे हैं जो इसे उसी अनुपात में दिखा सकते हैं. दिल्ली-एनसीआर में एक भी नहीं. हैदराबाद और चेन्नई ने यह फॉर्मेट छोड़ दिया है. मुंबई के वडाला वाले आईमैक्स डोम ने भी लेजर प्रोजेक्शन अपना लिया है. इसलिए मेरी अपनी ‘ओडिसी’ मुझे 3,000 किलोमीटर दूर बैंकॉक के सियाम पैरागॉन स्थित क्रुंगश्री आईमैक्स तक ले गई. स्क्रीन आठ मंजिला इमारत जितनी ऊंची है. देखकर आप सचमुच प्रभावित होते हैं.

फिर फिल्म शुरू होती है और पता चलता है कि वह 1.90:1 में चल रही है. ऊपर और नीचे से कटी हुई. यानी वही चौड़ी स्क्रीन वाला आईमैक्स अनुभव जो मुझे दिल्ली में मिलता है, बस ज्यादा बड़ा और ज्यादा साफ. जिस तरह नोलन ने इसे बनाया था, उस पूरे 1.43:1 अनुभव के लिए मुझे बैंकॉक तक आना पड़ा और यहां भी वह नहीं मिला. अहमदाबाद की साइंस सिटी में एक थिएटर है जो असली आईमैक्स चला सकता है. लेकिन वहां कमर्शियल फिल्में चलती ही नहीं.

फ्री साइंस, नो फिल्म. पूरी तरह साइंस. नेहरूवियन वैज्ञानिक सोच का चरम, नोलन वाली वैज्ञानिक सोच का नहीं. और अगर यह आपको थोड़ा दिलासा दे, तो जिन लोगों ने 1.43:1 फॉर्मेट पर फिल्म देखी, उन्होंने भी कुछ हिस्सों की तस्वीर को धुंधला बताया. यानी उन 41 भाग्यशाली थिएटरों में बैठे लोगों को भी खास उपलब्धि नहीं मिली. बस मेरी तुलना में उनकी निराशा थोड़ी कम है.

नोलन की ‘ओडिसी’ कोई गीक या नर्डी फिल्म भी नहीं है. और अगर किसी को लगता है कि नोलन ने यह तकनीक ईजाद की है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. आईमैक्स 70 एमएम पुराना है. शानदार है. और लगभग खत्म हो चुका है. क्योंकि यह सुविधाजनक नहीं है. और थियेटर के बिजली बिल पर भी भारी पड़ता है. इसीलिए आज बड़े से बड़े आईमैक्स थिएटर भी ज्यादातर दिनों में 4K लेजर प्रोजेक्शन चलाते हैं.

इस तरीके से शूट की गई फिल्मों की संख्या इतनी कम है कि इसके दम पर कोई पूरा बिजनेस मॉडल खड़ा नहीं किया जा सकता. यह शानदार अनुभव है. लेकिन चैरिटी नहीं. सिनेमा मालिकों को भी बिजनेस चलाना है. इसलिए दुनिया के लगभग हर इंसान ने ऐसी फिल्म देखी जो लगभग चौकोर फ्रेम के लिए शूट की गई थी, लेकिन उसे एक आयताकार स्क्रीन में फिट कर दिया गया. नोलन और दुनिया के 41 भाग्यशाली थिएटरों ने वो वर्शन देखा जिसे उन्होंने वास्तव में बनाया था.

और यही नोलन के ओडेसियस की बीमारी भी है, बस उसने इस बार कॉस्ट्यूम बदल लिया है. यह वही पोस्ट-ग्रेटनेस वाला नोलन है. पहले फॉर्मेट तय करता है. दर्शक बाद में. जरा सोचिए उन्होंने किया क्या है. उन्होंने ऐसी फिल्म बनाई है जिसे दुनिया के ज्यादातर लोग उस आकार में देख ही नहीं सकते, जिसमें वह बनाई गई है. और फिर यह समझने दिया जा रहा है कि अगर आपको उस जादू का अनुभव नहीं हुआ तो गलती आपकी है, क्योंकि आप गलत थिएटर में पहुंचे. यह ऐसा है जैसे स्ट्रीमिंग के दौर में कोई पूरा एल्बम सिर्फ विनाइल के लिए बनाए. फिर उसे ऐसी दुनिया में रिलीज करे जहां लोग स्ट्रीमिंग सुनते हैं. और बाद में आह भरकर कहे कि लोग मेरी महानता को वैसे महसूस ही नहीं कर पा रहे, जैसे करनी चाहिए थी.

यह भूल जाइए कि टर्नटेबल बनना बंद हो चुके हैं. रिकॉर्ड की दुकानें सालों पहले बंद हो गईं. और जिस एक दुकान में वह रिकॉर्ड अब भी मिलता है, वह 3,000 किलोमीटर दूर बैंकॉक के एक मॉल में है. अपने लिए कुछ करने की आजादी महान कलाकार को मिलनी ही चाहिए. कई बार महानता वहीं से निकलती है. लेकिन खुद को खुश करने और उस खुशी का बिल दर्शक से वसूलने के बीच एक महीन रेखा होती है. नोलन चुपचाप वह रेखा पार कर चुके हैं.

आप मैट डेमन को समुद्र पार उड़ा सकते हैं. उसे भूखा रख सकते हैं. उसे पानी में भिगो सकते हैं. उसे समुद्र में बीमारी तक झेलने दे सकते हैं. लेकिन जिस 4,000 साल पुरानी कविता को आप फिल्म में बदल रहे हैं, उसकी आत्मा के बारे में एक ईमानदार विचार करने का समय नहीं निकाल सकते? कुछ लोग इसे क्राफ्ट के प्रति समर्पण कहेंगे. सच कहूं तो इसका अनुवाद है- मैं नोलन हूं. मुझे कुछ समझाने की जरूरत नहीं. और यह 18,000 ल्यूमेन की रोशनी में उस स्क्रीन पर प्रोजेक्ट हो रहा है, जिसके अंदर हममें से ज्यादातर लोगों को घुसने का मौका ही नहीं मिला.

हर कोई इस बात से हैरान है कि नोलन ने कम से कम सीजीआई इस्तेमाल किया और ज्यादातर चीजें असल में बनाकर शूट कीं. यह सचमुच शानदार इंजीनियरिंग है. लेकिन आप तभी ज्यादा वाह-वाह करते हैं जब किसी ने फिल्म देखने से पहले आपको यह ट्रिविया बता दिया हो. आज किसी को परफेक्ट वीएफएक्स से कोई परेशानी नहीं है. हम नोलन की फिल्म देखने इसलिए नहीं जाते कि उन्होंने कोई चीज कैसे बनाई. हम इसलिए जाते हैं कि पर्दे पर वह चीज कितनी परफेक्ट लगती है. और यहां यही बात छूट गई है.

गलत मत समझिए. ‘द ओडिसी’ अधूरी नहीं है. लेकिन परफेक्ट भी नहीं है. बुरी नहीं. महान भी नहीं. यह ऑस्कर में खूब पुरस्कार जीतेगी, क्योंकि फिल्म उसी के लिए बनाई गई लगती है. हर फ्रेम जैसे गोल्डन स्टैच्यू के लिए इंजीनियर किया गया है. फिल्म पहले ही एक अरब डॉलर से ज्यादा कमा चुकी है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के दर्शकों को पसंद आई है. लेकिन दिल जीतने के लिए फिल्म सिर्फ तकनीक नहीं, आत्मा भी मांगती है. और यहां दिल गलत जगह रखा गया है. स्टाइल ने सब्सटेंस को हरा दिया. फॉर्मेट ने भावना को. मेरा यह बिल्कुल निजी अनुमान है कि नोलन को लगा होगा कि वह सबसे महान महाकाव्य पर सबसे महान फिल्म बना रहे हैं. और शायद यही भरोसा कहानी को सपाट कर देता है. कुछ भी चौंकाता नहीं. कुछ भी  शॉक नहीं देता. सिर्फ दिखावा बहुत साफ दिखाई देता है.

लोग इस कहानी को पहले भी फिल्म में ला चुके हैं. ‘ट्रॉय’, ‘द रिटर्न’. और मैं उम्मीद करके गया था कि शायद अब हमें वह निर्णायक ‘ओडिसी’ देखने को मिलेगी, जिसके बाद इस कहानी को फिर से बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन माफ कीजिए. अभी भी पर्दे पर बनी सबसे अच्छी ‘ओडिसी’ है- ‘ओ ब्रदर, व्हेयर आर्ट थाउ?’. सिर्फ इसलिए कि कोएन भाइयों ने उसे पूरी तरह अपने तरीके से दोबारा गढ़ दिया था. नोलन भी उसे दोबारा गढ़ने की कोशिश करते हैं. फ्रेम में भी. अभिनेता में भी. लेकिन इथाका पहुंचने से एक मील पहले ही रुक जाते हैं.

मेरी अपनी ‘ओडिसी’ घर से बहुत दूर एक थिएटर तक पहुंचने की निराशाजनक यात्रा थी. नोलन की भी कुछ ऐसी ही रही. हम दोनों एक ही नाव में थे. मैं एक असली आईमैक्स अनुभव देखने निकला था- एक ऐसी फिल्म का, जो एक महान महागाथा पर बनी सचमुच महान फिल्म हो.

मिला क्या?
एपिक फेल.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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