अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो आप जानते ही होंगे, लेकिन अगर आपने दिल्ली को तस्वीरों में देखा है तो कनॉट प्लेस की सफेद इमारतें शायद आपकी नजरों से जरूर गुजरी होंगी. इस कनॉट प्लेस के बीच में एक पार्क है, जिसमें अब भारत का झंडा लगा है, जिसे कहते हैं सेंट्रल पार्क. ये सेंट्रल पार्क अब कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके के तिरंगा लहराने के ऐलान के बाद से चर्चा में है. इसके बाद से फिर से दिल्ली में कई रूट बंद कर दिए गए हैं, सुरक्षा बढ़ा दी गई है. अब तिरंगा यात्रा में क्या होगा, वो तो देखना होगा, लेकिन उससे पहले जानते हैं कि आखिर इस सेंट्रल पार्क की कहानी है क्या.
आज जिस जगह हरे-भरे पार्क में तिरंगा लहराता दिखाई देता है, वहां कभी गांव थे, पेड़-पौधों से घिरा जंगल था और आसपास की जमीन पर जयपुर के शासकों का मालिकाना हक था. फिर ऐसा क्या हुआ कि इस इलाके की सूरत बदल गई? जंगल और गांवों की जगह आलीशान बाजार कैसे बना और कनॉट प्लेस के बीचोंबीच यह सेंट्रल पार्क कैसे तैयार हुआ?
सिर्फ जंगल था, मंगलवार को लोग आते थे
सेंट्रल पार्क की कहानी शुरू करने से पहले बात करते हैं उस जमीन की, जहां ये कनॉट प्लेस और सेंट्रल पार्क बना है. 20वीं सदी के शुरुआती सालों में कनॉट प्लेस और इसके आसपास का इलाका जंगल जैसा था. दूर-दूर तक गांव बसे हुए थे और उसमें भी जंगल का हिस्सा ज्यादा था. हर तरफ बबूल, रोंझ, केर, सांगरी, खजूर, ढाक, पलाश, पीपल, बरगद, गूलर के पेड़ लगे थे. बस एक हनुमान मंदिर था और मंगलवार को कुछ यहां आया करते थे. उस वक्त पुरानी दिल्ली के लोग यहां दर्शन करने आते थे, जिसे भी शाहजहांनाबाद कहा जाता था. यहां ऐसे हालात थे कि जंगलों में तीतर और बटेर का शिकार करते थे.

जयपुर के राजा की थी जमीन
फिर साल 1912 में दिल्ली के विस्तार की बात हुई. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, फिर गांवों की जमीनों को अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू हुई. यहां जयसिंहपुरा और राजा का बाजार जैसे गांव थे और इस जमीन के मालिक जयपुर के शासक थे. फिर कागजी कार्रवाई हुई और करीब 10 साल बाद 1925 में जाकर पूरा काम हुआ. जयसिंहपुरा सबसे बड़ा गांव था, जो जयपुर के राजा सवाई जयसिंह की थी और उन्हें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह ने दी थी. इसी जमीन पर जंतर मंतर और हनुमान मंदिर बनाया गया था. फिर यहां रहने वालों को करोल बाग और पहाड़गंज की तरफ बसाया गया.
ये था किताबों का बाजार
फिर 1929 में यहां बाजार बनाने का फैसला किया गया और इसका काम 1929 में शुरू हुआ और 1933 में पूरा हुआ. दो मंजिला जॉर्जियन शैली में बने इस बाजार में दो सर्किल थे. फिर इसे कनॉट प्लेस और कनॉट सर्कस नाम दिया गया. इन नामों के पीछे ब्रिटिश शाही परिवार का संबंध था. ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के तीसरे पुत्र प्रिंस आर्थर (ड्यूक ऑफ कनॉट और स्ट्रैथर्न) के नाम पर रखा गया था. फिर बाद में इस इलाके का नाम बदलकर इंदिरा चौक और राजीव चौक कर दिया गया. हालांकि, नए नामों को केवल मेट्रो ने अपनाया. उस वक्त यहां सबसे ज्यादा किताबों की दुकानें होती थीं और फुटपाथ पर भी किताबों के मार्केट थे. फिर कॉफी हाऊस, वेंगर जैसे कई ब्रांड आए.
अब बात सेंट्रल पार्क की...
कनॉट प्लेस बनने की कहानी तो आपने जान ली. अब जानते हैं आखिर सेंट्रल पार्क कब आया था और इससे नीचे बने पालिका बाजार और मेट्रो की क्या कहानी है. दरअसल, जहां सेंट्रल पार्क है, उसके नीचे राजीव चौक मेट्रो है. वहीं पास में पालिका बाजार है, जिसके ऊपर भी एक छोटा सा पार्क है, वो सेंट्रल पार्क के नजदीक है.
आज जो सेंट्रल पार्क देखने को मिलता है, ये तो साल 2006 में ही बनाया गया था. लेकिन, उससे पहले भी यहां पार्क था. पहले कनॉट प्लेस के बीच में लोगों के बैठने और मिलने-जुलने की जगह थी. वहां फव्वारा और पास में कॉफी हाउस मौजूद था. फिर वहां पालिका बाजार बना. लेकिन, पार्क वहां ही रहा.

इसके बाद साल 2001 में मेट्रो के काम के लिए इसे डीएमआरसी को दे दिया गया. फिर मेट्रो के काम के बाद ऊपर एक पार्क बनाया, उस वक्त ही एक सेंट्रल पार्क बनाया गया. ये 2006 में बनकर तैयार हुआ और लोगों के लिए खोल दिया गया. डीएमआरसी ने मेट्रो स्टेशन के ऊपर 27000 वर्ग मीटर के हरे-भरे क्षेत्र में एक पार्क विकसित किया, जिसमें घास के पौधे और विभिन्न प्रजातियों के सदाबहार पेड़ लगाए गए. उस वक्त इसमें करीब 700 पेड़ और 2,750 झाड़ियां लगाई गईं, उस वक्त पार्क में सफेद चंपा, रॉयल पाम, गुलमोहर, पिंक तबेबुइया, बॉटल ब्रश, इंडियन लॉरेल और अशोक लगाए गए थे.
इस पार्क की सुंदरता में चार जल निकाय, 21 फव्वारे और एक वॉटरफॉल बनाया गया था. इस पार्क की एक अतिरिक्त विशेषता लगभग 500 लोगों की बैठने की क्षमता वाला एक एम्फीथिएटर का निर्माण भी किया गया था. सेंट्रल पार्क में नौ गेट हैं और इनमें से दो गेट सीधे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन की तरफ खुलते हैं.