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मनुस्मृति में ऐसा क्या है... क्यों बार-बार हमलों का शिकार होता है ये प्राचीन ग्रंथ

मनुस्मृति के एक विवादित श्लोक को लेकर संसद में बहस छिड़ गई है. आखिर एक प्राचीन ग्रंथ क्यों आधुनिक भारत में बार-बार विवाद में घिर जाता है?

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मनुस्मृति का रचनाकाल ऐतिहासिक आधार पर लगभग ढाई हजार साल पहले का माना जाता है
मनुस्मृति का रचनाकाल ऐतिहासिक आधार पर लगभग ढाई हजार साल पहले का माना जाता है

संसद में एक बार फिर मनु स्मृति गूंजी! महाराज मनु ने सहस्त्राब्दियों पहले अपने वैदिक ज्ञान को तत्कालीन समाज के ढांचे, मानसिकता और उपयोगिता के उद्देश्य से एक पुस्तक में पिरोया. ऐसे में तत्कालीन समाज के संचालन का ये पहला विधान था. 

हालांकि एक खास श्लोक के नाम पर मनुस्मृति ने सबसे ज्यादा हमले झेले. लेकिन यह श्लोक गौतम धर्मसूत्र में है-

अथ हास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम् ॥ ४ ॥
उद्घारणे जिह्वाच्छेदः ॥ ५ ॥
धारणे शरीरभेदः ॥ ६ ॥

इनके अर्थों को समझिए- 

अथ हास्य- और यदि वह (शूद्र)
वेदमुपशृण्वतः- वेद मंत्रों को जानबूझकर सुनता है
त्रपु-जतुभ्यां - त्रपु (रांगा/टिन) और जतु (लाख) को पिघलाकर

श्रोत्र-प्रतिपूरणम् -  कानों को भर देना चाहिए
उद्घारणे-  यदि वह वेदों का उच्चारण करता है
जिह्वाच्छेदः -  तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए

धारणे-  यदि वह वेदों को याद (कंठस्थ) रखता है
शरीरभेदः - तो उसके शरीर के टुकड़े कर देने चाहिए यानी मृत्युदंड!

मनुस्मृति के आठवें अध्याय का 272वां श्लोक है

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः .
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥२७२॥

धर्मोपदेशं- धर्म का उपदेश या सीखदर्पेण: अहंकारवश या घमंड में आकर
विप्राणामस्य कुर्वतः- ब्राह्मणों को देता है

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तप्तम्-आसेचयेत्-तैलं: - उबलता हुआ गर्म तेल उड़ेल देना चाहिए
वक्त्रे श्रोत्रे च: - मुख (मुंह) और श्रोत्र (कानों) में 

पार्थिवः - राजा द्वारा

लेकिन बड़ा प्रश्न है कि स्मृति ग्रंथ क्या हैं? तो जानिए कि वेदों को कानों से सुनने और मस्तिष्क में गुनने के बाद हृदय में प्रस्फुटित विचार जब ताड़पत्रों पर उतरे तो स्मृति कहलाए. अब तक तकरीबन बीस प्रामाणिक स्मृतियां हैं जिनमें सबसे चर्चित मनु स्मृति है. इसके अलावा याज्ञवल्क्य, नारद और बृहस्पति स्मृति भी हैं.

manu smriti

चारों वर्णों के अधिकार, कर्तव्य और दंड विधान के तहत शूद्रों को लेकर जिस श्लोक का उल्लेख कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में किया उसको लेकर भी आद्य शंकराचार्य सहित कई विद्वानों में मतभेद है. मतभेद इस पर भी है कि वो श्लोक मूल मनुस्मृति में है भी या नहीं! 

क्या असली पांडुलिपि में नहीं है विवादित श्लोक?

सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट और भारतीय संस्कृति, साहित्य और शास्त्रों के विद्वान पीएन मिश्रा ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों और खास कर स्मृतियों पर अगाध शोध कर चुके 18 वीं सदी के ब्रिटिश विद्वान पैट्रिक ओलेवेले को क्वोट करते हुए बताया कि यह श्लोक मनुस्मृति के प्राचीन पांडु लिपि में कहीं भी नहीं था. उन्होंने मनुस्मृति की करीब दर्जनों पांडुलिपियों का अध्ययन किया. 

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यह श्लोक मनुस्मृति की एक प्राचीन टीका यानी व्याख्या का हिस्सा था जिसे लगभग 1887 में जूलियस जॉली ने अपने अंग्रेजी अनुवाद में मूल पाठ के साथ मिला करके छाप दिया. इससे लोग भ्रमवश इसे भी मनुस्मृति का ही श्लोक कहने लगे. आधुनिक युग के संस्कृत धर्मशास्त्रों के अद्वितीय शोधकर्ता और अनुवादक पैट्रिक ओलेवेले ने मनुस्मृति के क्रिटिकल एडिशन में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख किया है. 

यह भी पढ़िएः राज्यसभा में मनुस्मृति पर हंगामा... खड़गे और नड्डा के बीच तीखी तकरार

उक्त टीका के कुछ श्लोकों जिनको जॉली ने मुख्य मनुस्मृति में मिला दिया उसको परिशिष्ट में क्षेपक के रूप में यथावत प्रस्तुत किया है. पीएन मिश्रा के मुताबिक जब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने ही इन तथ्यों का जिक्र नहीं किया तो खड़गे के तो कहने की क्या! सुप्रीम कोर्ट में वकील और विधि विज्ञान व इतिहास के जानकार आरके सिंह के मुताबिक स्मृतियां विभिन्न कालखंड में लिखी गईं. 

कब लिखी गई थी मनुस्मृति?

ये हमारे समाज में विकास, चेतना और बदलाव के दस्तावेज हैं. मनुस्मृति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में यानी अब से कोई ढाई हजार साल पहले लिखी गई. इसमें तत्कालीन समाज के संचालन के नियम पहली बार संहिताबद्ध किए गए. मनु स्मृति में समाज व्यवस्था के सम्यक संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था, सामाजिक संस्कार, शिक्षा, विवाह, संतति और संपत्ति, विरासत, चारों वर्णों के अधिकार, कर्तव्य, दंड विधान, राजा के कर्तव्य, कर्तव्य से विमुख होने पर आम जनता से लेकर राजा तक के दंड विधान के नियम लिपिबद्ध हैं.

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सिंह के मुताबिक परीक्षाओं में कदाचार रोकने के लिए मौजूदा सरकार के संसद में पेश इस अति कठोर कानून की तुलना मल्लिकार्जुन खड़गे ने मनुस्मृति के कठोर विधान से करनी चाही होगी, क्योंकि कठोर विधान की मांग पर सरकार ये संशोधन विधेयक लेकर आई. विपक्ष को कुछ तो आलोचना करनी थी. विधेयक की मेरिट पर बोल नहीं सकते थे क्योंकि मांग ही सख्त कानून की थी तो बात मनुस्मृति के बहाने ही कुछ कह दिया.

कई शूद्र ऋषियों का भी है वेदों-पुराणों में जिक्र!

सीनियर एडवोकेट पीएन मिश्र बताते हैं कि 'छांदोग्य उपनिषद्' में अज्ञात कुल गोत्र वाले सत्यकाम जाबालि नामक ऋषि को सत्य बोलने के कारण श्वेतकेतु गौतम ऋषि ने उनका उपनयन कर उन्हें वेद पढ़ाया. ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रंथ ऐतरेय ब्राह्मण में इन सत्यकाम को शूद्र और दासीपुत्र बताया गया है.

पहले विश्वामित्र वशिष्ठ आदि ने इन्हें यज्ञ में आचार्य के रूप में वरण करने से इंकार कर दिया था. परंतु जब इन्होंने सरस्वती नदी के किनारे तपस्या करके ऋग्वेद के नदीसूक्त की ऋचा का निदर्शन कर लिया तब उन ऋषियों ने आदर पूर्वक बुलाकर यज्ञ में आचार्य भी बनाया. 

अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य के अपशूद्राधिकरण में आदि शंकराचार्य ने 'कान में पिघला शीशा डालने' से संबंधित श्लोक को उद्धृत तो किया है लेकिन उसे मनुस्मृति का नहीं बताया है. उस मत से पूर्णतः सहमति न व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा है कि इसके विपरीत पूर्व जन्म के तप के प्रभाव से विदुर धर्मव्याध आदि को ब्रह्मविद्या का ज्ञान प्राप्त हुआ था.

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इस संदर्भ में उन्होंने जानश्रुत पौत्रायण, सत्यकाम जाबालि आदि को शूद्र होने के बावजूद उन्हें ब्रह्मविद्या देने का उल्लेख किया है. ब्रह्माण्ड पुराण में एक श्लोक में व्यास ,शृंगी आदि दशाधिक ऋषियों को नीच योनि में जन्म लेने के बाद ब्रह्मज्ञानी होने का उल्लेख किया है. 

यानी जिन लोगों ने मनुस्मृति का सम्यक अध्ययन किया होगा उन्होंने देश का संविधान लिखते समय भी कई उचित विधान मनुस्मृति से प्रेरणा लेकर बनाए हैं. लेकिन आधुनिक समाज की सोच और व्यवहार को ध्यान में रखते हुए लोककल्याण की भावना के साथ.

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