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धारा-16 का 'कवच' पुराने केस में नहीं, CEC ज्ञानेश कुमार पर चल सकता है मुकदमा?

केरलम सरकार की CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच की सिफारिश ने कानुनी पहलुओं से जुड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. मुख्य चुनाव आयुक्त को कानून से मिली इम्युनिटी का दायरा कितना है? कानून के मुताबिक CEC पद की इम्यूनिटी सिर्फ आधिकारिक चुनावी कामों तक सीमित है. और इस कानून से 2006 के कथित आरोपों पर ज्ञानेश कुमार को कम से कम जांच से सुरक्षा नहीं मिलती है.

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CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरलम सरकार ने जांच का फैसला किया है. (Photo: ITG)
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरलम सरकार ने जांच का फैसला किया है. (Photo: ITG)

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC का पद देश की चुनावी व्यवस्था में बेहद संवेदनशील है. वो पूरे देश की लोकतांत्रिक और चुनाव व्यवस्था का महत्वपूर्ण अधिकारी होता है. भारत के राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते हैं. इससे पहले एक चयन समिति मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम पर आखिरी मोहर लगाती है. इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री होते हैं. 

क्या भारत के CEC के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है? 

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व सौंपा गया है. इस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए CEC को विशेष कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है. इस अर्थ यह है कि कोई भी अदालत CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ सिविल या आपराधिक केस नहीं चला सकती है. शर्त यह है कि जिस काम को आधार बनाकर CEC या EC (इलेक्शन कमिश्नर) के खिलाफ मुकदमा करने की कोशिश की जा रही है, वह कार्य CEC के आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में या उसके दौरान किया गया हो. 

धारा- 16 क्या कहती है?

इस बारे में 2023 में पारित Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act की धारा 16 में स्पष्ट प्रावधान है.  इसके अनुसार, "कोई भी अदालत CEC या चुनाव आयुक्त (वर्तमान या पूर्व) के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं चला सकती, यदि वह कार्य उनके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में या उसके दौरान किया गया हो."

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मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमे के खिलाफ ये इम्युनिटी आजीवन मिली है. और इसका असर उनके रिटायरमेंट के बाद भी रहता है. 

यानी कि एक CEC या EC को रिटायर हो जाने के बाद भी उसके वैसे किसी कदम के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है जो उसने CEC या EC रहते हुए उठाया है. 
 
इसका उद्देश्य CEC को बाहरी दबावों और मुकदमों से बचाकर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम बनाना है. 

आसान शब्दों में कहें तो अगर CEC अपने आधिकारिक काम (जैसे चुनाव संबंधी फैसला लेना, आदेश देना) करते समय कोई काम करते हैं, तो कोई अदालत उनके खिलाफ सिविल या आपराधिक मुकदमा नहीं चला सकती. 

यह सुरक्षा सिर्फ पद पर रहते हुए नहीं, बल्कि रिटायर होने के बाद भी आजीवन लागू रहती है. 

लेकिन धारा 16 यह नहीं कहती कि मौजूदा या पूर्व चुनाव आयुक्त के हर काम को इम्युनिटी मिली हुई है. इसकी भाषा कानूनी सुरक्षा को उस काम, चीज़ या शब्द से जोड़ती है जो आधिकारिक ड्यूटी या काम को पूरा करते समय या ऐसा करने का दिखावा करते हुए किया या कहा गया हो. 

इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि CEC को 'हर अपराध में पूर्ण इम्युनिटी' हासिल है. धारा 16 में “arrest”, “police investigation” या “police custody” शब्द सीधे नहीं लिखे हैं.  इसमें कहा गया है कि अदालत ऐसे सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही को entertain या continue नहीं करेगी, जो धारा के दायरे में आते हों. इसलिए जांच और गिरफ्तारी पर इस प्रावधान का वास्तविक प्रभाव क्या होगा, यह आरोप और अदालत की व्याख्या पर निर्भर करेगा. 

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CEC बनने से पहले के आरोपों के आधार पर क्या मुकदमा चलाया जा सकता है?

हाल ही में हमने देखा कि केरल की कांग्रेस सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 4 अक्टूबर 2026 को विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो जांच का आदेश दिया है. यह मामला उनके CEC बनने से बहुत पहले 2006 का है, जब वे केरल कैडर के IAS अधिकारी के रूप में राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) सचिव थे. 

क्या था मामला?

केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला के अनुसार मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल लोक निर्माण विभाग (PWD) सचिव रहने के दौरान गड़बड़ी का आरोप है. इस मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा 2006 में मलेशियाई सिविल इंजीनियर लीसी बीन की आत्महत्या का मामला भी जुड़ा है. बीन इंडो-मलेशियन ज्वाइंट वेंचर PATI-BEL से जुड़े हुए थे.

सवाल है कि क्या 2006 के मामले को आधार बनाकर 2026 में ज्ञानेश कुमार की जांच की जा सकती है?

संविधान का अनुच्छेद 324(5) और CEC एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 केवल उन कार्यों से इम्युनिटी देते हैं जो व्यक्ति CEC के रूप में आधिकारिक ड्यूटी निभाते समय करता है. 

 324(5) में CEC के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया का वर्णन है. 

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ये प्रावधान पुराने आरोपों (जैसे जिला कमिश्नर, सचिव या अन्य पद पर) पर लागू नहीं होते. इसलिए राज्य सरकार या सक्षम एजेंसी पूर्व कार्यकाल के भ्रष्टाचार, कदाचार या आपराधिक मामलों की जांच कर सकती है, FIR दर्ज कर सकती है और मुकदमा चला सकती है. 

इसलिए यदि आरोप उस समय के हैं जब व्यक्ति CEC नहीं था और वह किसी राज्य सरकार के अधिकारी के रूप में काम कर रहा था, तो बाद में CEC बनने से पुराने कथित अपराध पर स्वतः कानूनी इम्युनिटी नहीं मिल जाती.

लेकिन इन मुकदमों में समय-सीमा लागू हो सकती है. 

अगर अधिकारी के सर्विस नियमों के तहत सेंक्शन जरूरी हो तो वह लेना होगा. 

अगर जांच दुर्भावनापूर्ण लगे तो इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. 

हालांकि मुकदमा चल सकता है या नहीं, इसका अंतिम फैसला अदालत करेगी. जांच में आरोप साबित होना अलग बात है और किसी व्यक्ति को आरोपी बनाकर उसके खिलाफ अदालत में अभियोजन चलाना अलग. इसलिए कहा जा सकता है कि CEC का पद पुराने, गैर-चुनावी कार्यकाल से जुड़े कथित अपराधों के लिए पूर्ण इम्युनिटी नहीं देता. 

यह भी पढ़ें: क्या है 20 साल पुराना केस? जिससे बढ़ सकती हैं ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें, केरल सरकार के एक्शन से मची हलचल

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केरलम के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच की घोषणा डायरेक्टर जनरल ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन (DGP) की कानूनी राय के बाद की. 

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार DGP ने कहा कि "अपराध कभी खत्म नहीं होता" एक बुनियादी कानूनी सिद्धांत है.  राय में कहा गया है कि भ्रष्टाचार, अधिकार का दुरुपयोग, अनुचित लाभ उठाना और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे गंभीर अपराधों के कानूनी परिणाम केवल समय बीत जाने से अपने आप खत्म नहीं होते, और अदालत अभी भी आरोपी व्यक्ति को जवाबदेह ठहरा सकती है. 

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