
दो-तीन दिन से एक ही नाम की चर्चा है- लॉरेंस बिश्नोई. लॉरेंस गुजरात की साबरमती जेल में बंद है... लेकिन जेल की सलाखों के बाहर उसके गैंग का नेटवर्क लगातार वारदातों को अंजाम दे रहा है. हाल ही में, अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हुआ हमला भी उसी में से एक है. लॉरेंस बिश्नोई गैंग का ऑपरेटिंग मॉडल जांच एजेंसियों के सामने एक 'लो कॉस्ट, डिस्पोजेबल शूटर' मॉडल के रूप में उभरा है. यह नेटवर्क कम उम्र और कम अनुभव वाले लड़कों को कुछ हजार रुपये में शूटर बनाता है. इन्हें पैसे, ऐशो-आराम और विदेशों में बसाने का लालच दिया जाता है. यानी बड़े गैंगस्टर अपने नेटवर्क में ऐसे लोगों को शामिल करते हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर आसानी से किनारे किया जा सके. सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड और टाइगर श्रॉफ पर हुई फायरिंग का मामला, इसके कुछ उदाहरण है.
लेकिन सवाल है कि आखिर लॉरेंस बिश्नोई गैंग का यह 'लो-कॉस्ट, डिस्पोजेबल शूटर' मॉडल कैसे काम करता है?
टाइगर श्रॉफ केस की बात करें, तो इस हमले की जिम्मेदारी अमेरिका में बैठे गैंगस्टर अनिल पंडित ने ली. अनिल पंडित हरियाणा का रहने वाला है लेकिन फिलहाल अमेरिका में है. अनिल पंडित ने इस हमले को अंजाम देने के लिए कम उम्र के शूटर्स की तलाश शुरू की होगी. उसकी तलाश इन हरियाणा से रेहान, बेगूसराय के ऋतिक और सोनीपत के फूल सिंह. इन तीन शूटर्स पर जाकर खत्म हुई. सबसे खास बात ये है कि अनिल पंडित ने ऐसे लड़कों को चुना, जो छोटे-मोटे अपराधों में जेल जा चुके थे. इसके बाद उन्हें 35 हजार रुपये देने और अमेरिका-कनाडा में बैठे अपने कुख्यात गैंगस्टर्स का रौला दिखाकर इस काम के लिए तैयार किया.
इन लोगों ने पहले 15 दिनों तक मुंबई में बड़े सुपरस्टार्स की रेकी की. इस लिस्ट में अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, सलमान खान जैसे बड़े चेहरों के नाम भी शामिल हैं. लेकिन जब उन्हें पता चला कि इन सितारों की सुरक्षा काफी टाइट है तो वे किसी दूसरे स्टार की तलाश में जुट गए.
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इसके बाद इन्होंने लोगों से बातचीत करके यह पता करना शुरू किया कि फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा कौन सा स्टार है जिसके साथ आसानी से सेल्फी ली जा सकती है. लोगों से बात करने पर उन्हें पता चला कि टाइगर श्रॉफ इस मामले में काफी सहज हैं और आसानी से सेल्फी दे देते हैं. इसके बाद सेलिब्रिटी पैपराजी वीडियो के जरिए इन लोगों को पता चला कि टाइगर रोज शाम को पुष्पा पार्क में फुटबॉल खेलने जाते हैं. उन्होंने पहले उनके आने-जाने के रूटीन पर नजर रखी. जब उन्हें पता चला कि फुटबॉल खेलकर लौटते समय टाइगर के साथ सिर्फ एक ड्राइवर रहता है तो उन्होंने अपने प्लान को अंजाम दे दिया.

मूसेवाला केस से मिलता-जुलता पैटर्न
इस केस का पैटर्न मूसेवाला हत्याकांड और बाबा सिद्दीकी हत्याकांड से मिलता-जुलता है. सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड में कनाडा में बैठे गोल्डी बराड़ ने छह शूटर्स को भेजा था और उन्हें मूसेवाला को मारने की जिम्मेदारी दी थी. वहीं, बाबा सिद्दीकी हत्याकांड की साजिश लॉरेंस बिश्नोई के भाई अनमोल बिश्नोई ने रची थी. उसने शूटर्स को चुना और उन्हें बाबा सिद्दीकी की हत्या की सुपारी दी. जबकि, टाइगर श्रॉफ पर हुई फायरिंग के मामले में अमेरिका में बैठे गैंगस्टर अनिल पंडित ने शूटर्स को भेजा. यह गैंग हमला किसी एक 'हिटमैन' से नहीं कराता बल्कि एक तय पैटर्न को फॉलो करता है.
सबसे पहले ये विदेशों में बैठे गैंग्स्टर्स हमले का प्लान तैयार करते हैं. फिर ये लोकल लेवल पर छोटे-मोटे अपराधियों को हत्या की जिम्मेदारी देते हैं. उसके बाद वह शूटर्स रेकी करते हैं. कुछ दिनों तक उस व्यक्ति को फॉलो करता है, उसका रूटीन देखते हैं, फिर एक तय दिन पर घटना को अंजाम देते हैं.
कम उम्र के शूटर्स को चुनते हैं
मूसेवाला केस में लगभग एक साल की तैयारी की बात सामने आई है. मूसेवाला केस में शूटर अंकित सिरसा को जिम्मेदारी दी गई थी. यह गैंग 'युवा शूटर्स' रणनीति को अपनाता है. टाइगर श्रॉफ केस में भी इस नेटवर्क ने 18-21 साल के लड़कों को चुना. जांच अधिकारियों का भी कहना है कि यह गैंग यूपी, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और बिहार से कम उम्र और कम एक्सपीरियंस वाले लड़कों को भर्ती करता है.

पहले इन लड़कों को छोटी-मोटी जिम्मेदारी दी जाती है. जैसे, मैसेज के जरिए धमकी देना, सोशल मीडिया पर धमकी भरा पोस्ट करना, हथियार या सिम ले जाना आदि. इन्हें पैसे काफी कम दिए जाते हैं. 30-50 हजार रुपये में इन्हें किसी को मारने का काम सौंपा जाता है. जरूरी नहीं है कि बड़े अपराध के लिए रकम भी बड़ी हो. अधिकारियों की मानें तो शूटर्स छोटी-मोटी रकम में भी मान जाते हैं.
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इन लोगों को पैसों से ज्यादा गैंग से जुड़ने, सोशल मीडिया पर बड़ा नाम बनाने, अपराध की दुनिया में अपना रौला जमाने और जेल में बंद गैंगस्टर्स के प्रति अपनी लॉयलटी दिखाने का लालच होता है.
कैसे मिलता है शूटर्स को पैसा
शूटर्स को पैसा सीधे बैंक के जरिए नहीं मिलता. जांच में सामने आया है कि उन्हें हवाला, कैश कूरियर और कई छोटे-छोटे लेन-देन के जरिए पैसे पहुंचाए जाते हैं. कई बार स्थानीय लोगों के संपर्क के जरिए भी उन्हें रकम दी जाती है. मूसेवाला हत्याकांड में भी हवाला के जरिए लेन-देन की बात सामने आई थी.
वहीं, साल 2025 में बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में भी यही पैटर्न देखने को मिला था. साबरमती जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के भाई अनमोल बिश्नोई ने इस हत्या की साजिश रची थी. उसने कम उम्र के शूटर्स को चुना और सिग्नल ऐप के जरिए उनसे संपर्क किया. जांच में सामने आया कि हत्या को अंजाम देने के लिए 17 लाख रुपये की सुपारी दी गई थी.
इस वारदात के लिए उत्तर प्रदेश से कम उम्र और कम एक्सपीरियंस के शूटर्स को चुना गया. उन्हें बड़ी रकम का लालच दिया गया. इसके बाद उन्होंने पहले रेकी की और फिर गोलीबारी को अंजाम दिया. इस मामले में भी बैंक के बजाय हवाला के जरिए पैसे के लेन-देन की बात सामने आई थी
इस गैंग के पैटर्न को देखने से पता चलता है कि ये 'लो कॉस्ट, डिस्पोजेबल शूटर' वाले मॉड्यूल पर चलते हैं. ताकि अगर घटना के बाद शिनाख्त हो तो इनके शूटर्स पकड़े जाएं. कोई इन तक न पहुंच पाए.