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ड्रोन फेडरेशन फर्जीवाड़ा केस: DGCA के कई और अधिकारी भी आए रडार पर, CVC के पास नई शिकायत दर्ज

ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े फर्जी दस्तावेज मामले में केंद्रीय सतर्कता आयोग के पास नई शिकायत दर्ज हुई है जिसमें DGCA, MoCA और MCA के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी का आरोप है. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जांच में फर्जी एनओसी का खुलासा होने के बावजूद कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई.

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यह ताजा शिकायत ऐसे समय में सामने आई है, जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पहले से ही इस मामले की जांच कर रहा है। (फाइल फोटो: ITG)
यह ताजा शिकायत ऐसे समय में सामने आई है, जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पहले से ही इस मामले की जांच कर रहा है। (फाइल फोटो: ITG)

ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया (DFI) से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेज मामले में विवाद बढ़ता जा रहा है. अब केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के पास एक नई शिकायत दर्ज कराई गई है. इसमें नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA), नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) और कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) के कुछ और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, नियमों की अनदेखी और मिलीभगत का आरोप लगाया गया है.

यह हालिया शिकायत आरटीआई कार्यकर्ता तेजप्रताप सिंह ने दर्ज कराई है. उनका आरोप है कि जांच में यह साफ होने के बावजूद कि ड्रोन फेडरेशन ने नाम बदलने के लिए फर्जी सरकारी कागजातों का इस्तेमाल किया था, जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया.

सीवीसी ने इस शिकायत को आगे की जांच के लिए 3 अगस्त को कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) के पास भेज दिया है.

यह नया मामला ऐसे समय सामने आया है जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पहले से ही इस पूरे मामले की जांच में जुटी है. 2026 की शुरुआत में सीबीआई ने ड्रोन आयात से जुड़े एक अलग रिश्वत मामले में डीजीसीए के उप महानिदेशक मुदावथ देवुला और एस्टेरिया एयरोस्पेस के एक कार्यकारी भारत माथुर को गिरफ्तार किया था. जांच एजेंसी ने छापेमारी के दौरान भारी मात्रा में कैश और सोने-चांदी के सिक्के भी बरामद किए थे.

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क्या है 2023 का फर्जीवाड़ा मामला?

दरअसल, यह पूरा विवाद साल 2023 का है. उस दौरान डीएफआई (DFI) ने अपने संगठन का नाम ड्रोन फेडरेशन इंडिया से बदलकर ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया करने के लिए आवेदन किया था. नियमों के मुताबिक, नाम बदलने के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है.

आरोप है कि जब कॉरपोरेट मामलों के रजिस्ट्रार ने इस पर आपत्ति जताई, तो डीएफआई ने एक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जमा किया. यह एनओसी डीजीसीए के तत्कालीन महानिदेशक अरुण कुमार के हस्ताक्षर से जारी होने का दावा किया गया था.

जांच में फर्जी निकला एनओसी
मंत्रालय की ओर से की गई जांच में यह बात सामने आई कि वह दस्तावेज पूरी तरह फर्जी था. जांच में पता चला कि डीजीसीए ने ऐसा कोई एनओसी जारी ही नहीं किया था. इसके अलावा, दस्तावेज में जो फाइल नंबर लिखा था, वह भी फर्जी था. हैरानी की बात यह है कि जिस तारीख का वह कागज था, उससे पहले ही अरुण कुमार का ट्रांसफर हो चुका था.

शिकायतकर्ता का कहना है कि इतने बड़े खुलासे के बाद भी अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की. अब इस नई शिकायत के बाद देखना होगा कि जांच एजेंसियां इस मामले में क्या और कदम उठाती हैं.

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