scorecardresearch
 

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करोड़ों के मेडिकल उपकरण हुए कबाड़? पढ़ें आजतक का रियलिटी चेक

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपये के मेडिकल उपकरण इस्तेमाल नहीं होने का मामला सामने आया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर चिंता जताते हुए अस्पतालों में पर्याप्त मैनपावर और जरूरी एक्सेसरीज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट समेत कई अस्पतालों में महंगे मेडिकल उपकरण लंबे समय से बंद या बेकार पड़े हैं.

Advertisement
X
सरकारी अस्पतालों में करोड़ों के मेडिकल उपकरण इस्तेमाल नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता.(Photo- ITG)
सरकारी अस्पतालों में करोड़ों के मेडिकल उपकरण इस्तेमाल नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता.(Photo- ITG)

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करीब 50 से 60 करोड़ रुपये की कीमत के आयातित मेडिकल उपकरण पड़े हुए हैं और उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. कोर्ट ने इसकी वजह मैनपावर की कमी और जरूरी एक्सेसरीज की उपलब्धता नहीं होना बताया.

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर की सुविधा वाले आईसीयू बेड की उपलब्धता और इमरजेंसी हेल्पलाइनों के संचालन से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान आई. कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मेडिकल उपकरणों को चलाने के लिए पर्याप्त मैनपावर सुनिश्चित की जाए. जो मशीनें इस्तेमाल में नहीं हैं, उन्हें उन अस्पतालों में भेजा जाए जहां उनकी जरूरत है. साथ ही, जहां जरूरी उपकरण या एक्सेसरीज की कमी है, वहां उन्हें तत्काल उपलब्ध कराया जाए.

कोर्ट ने कहा कि यह बेहद हैरान करने वाली स्थिति है. ये सभी मशीनें आयातित उपकरण हैं. दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में रखे ये उपकरण बेहद चौंकाने वाली स्थिति को दर्शाते हैं. ये सभी विदेशी उपकरण हैं. कैंसर इंस्टीट्यूट की स्थिति सबसे खराब है.'

आजतक का ग्राउंड रियलिटी चेक

Advertisement

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आजतक संवाददाता सुशांत मेहरा ने दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट पहुंचकर मेडिकल उपकरणों की ग्राउंड रियलिटी चेक की. ग्राउंड पर सामने आया कि 2016 में खरीदी गई मेडिकल साइक्लोट्रॉन मशीन वर्ष 2022 से बंद पड़ी है. करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गई इस मशीन का इस्तेमाल मरीजों के पीईटी स्कैन के लिए जरूरी एफडीजी यानी फ्लुओरोडिऑक्सीग्लूकोज बनाने के लिए किया जाता है.

मेडिकल साइक्लोट्रॉन में तैयार होने वाला एफडीजी एक तरह का रेडियोफार्मास्यूटिकल है, जिसे पीईटी स्कैन के दौरान मरीजों को दिया जाता है. मशीन के लंबे समय से बंद होने के चलते 2022 से दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में पीईटी स्कैन की सुविधा प्रभावित होने का दावा किया जा रहा है. आजतक संवाददाता ने मेडिकल साइक्लोट्रॉन विभाग के अंदर जाकर भी स्थिति का जायजा लिया.

स्वास्थ्य मंत्री ने क्या कहा?

पूरे मामले पर जब आजतक संवाददाता ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज सिंह से बात की, तो उन्होंने आम आदमी पार्टी सरकार के कार्यकाल में करोड़ों रुपये की लागत से मेडिकल मशीनें खरीदे जाने का आरोप लगाया. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि हम शुरुआत से कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने करोड़ों रुपये की मशीन खरीदी...' उन्होंने कहा कि सरकार पूरे मामले की जांच कर रही है और हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिन उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है, उनका इस्तेमाल किया जा रहा है. मंत्री के मुताबिक, दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करीब 21 फीसदी स्टाफ की कमी थी और मौजूदा सरकार बनने के बाद बड़ी संख्या में स्टाफ की भर्ती की गई है.

Advertisement

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जल्द ही पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल के तहत सीटी स्कैन, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रही है.

2024 के एंटी करप्शन ब्रांच केस का भी जिक्र

स्वास्थ्य मंत्री ने 2024 में दर्ज एंटी करप्शन ब्रांच के एक मामले का भी जिक्र किया. उन्होंने दावा किया कि जांच में कई अनियमितताएं सामने आई थीं और मामले में शामिल करीब 15 कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया है. मंत्री के मुताबिक, मामले की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है और संबंधित कंपनी के एक मालिक के जेल जाने का भी जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ भी उचित कार्रवाई की जाएगी.

दिल्ली हाईकोर्ट की जानकारी

मेडिकल उपकरणों पर दिल्ली हाईकोर्ट में पेश हलफनामे से सामने आया कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपये के मेडिकल उपकरण इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं. करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गई मेडिकल मशीनें दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में बेकार पड़ी हैं. इनमें कोविड के दौरान खरीदी गई मशीनें, काम नहीं करने वाले सिस्टम और स्टाफ की कमी के कारण इस्तेमाल नहीं हो रहे उपकरण शामिल हैं. दिल्ली के अस्पतालों में सैकड़ों मशीनें इस्तेमाल नहीं होने की जानकारी सामने आई है. 26 अस्पतालों ने अपनी स्थिति की जानकारी दी थी. दिल्ली सरकार ने इन अस्पतालों की ओर से दी गई जानकारी को हलफनामे के जरिए दिल्ली हाईकोर्ट के सामने रखा.

Advertisement

दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट

दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में तीन महंगे उपकरण ऐसे हैं जो या तो इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं या पूरी तरह काम नहीं कर रहे हैं. 2017 में खरीदी गई मेडिकल साइक्लोट्रॉन यानी पीईटी-ट्रेस 10 की कीमत 2.532 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी. इसके अलावा स्थानीय सामान पर 64 लाख रुपये और टर्नकी लागत पर 2.5 करोड़ रुपये खर्च हुए. यह मशीन मैनपावर की कमी के कारण फिलहाल इस्तेमाल नहीं हो रही है.

2021 में खरीदे गए पीईटी स्कैनर के साथ इंटीग्रेटेड मल्टी-डिटेक्टर/मल्टी-स्लाइस सीटी स्कैनर की कीमत 2.479 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी. इसके अलावा स्थानीय सामान पर 65.38 लाख रुपये खर्च हुए. इसका सीटी हिस्सा इस्तेमाल में है, जबकि पीईटी हिस्सा नेमा टेस्टिंग का इंतजार कर रहा है और मशीन फिलहाल मूल्यांकन के तहत है.

2017 में खरीदे गए ड्यूल हेड गामा कैमरा विद स्पेक्ट यानी मल्टी-स्लाइस सीटी की कीमत 1.3515 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी. इसके अलावा स्थानीय सामान पर 26.68 लाख रुपये खर्च हुए. यह मशीन फिलहाल इस्तेमाल नहीं हो रही है और काम नहीं कर रही है. मशीन का मूल्यांकन चल रहा है.

कैंसर रिसर्च के मॉलिक्यूलर ऑन्कोलॉजी लैब विभाग में 32 उपकरण ऐसे दर्ज किए गए हैं जो इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं. इनमें से 23 उपकरणों की खरीद कीमत दर्ज है, जिसकी कुल कीमत करीब 3.75 करोड़ रुपये है. बाकी उपकरणों की खरीद कीमत का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है या उन्हें मुफ्त में उपलब्ध कराया गया था. इन उपकरणों के इस्तेमाल नहीं होने की वजहों में मशीनों का काम नहीं करना और मरम्मत का इंतजार, उपकरण का बंद हो जाना या उसे खराब घोषित करने की प्रक्रिया, मुख्य उपकरण का उपलब्ध नहीं होना, मैनपावर की कमी और मॉलिक्यूलर लैब में फिलहाल जरूरत नहीं होना शामिल है.

Advertisement

 कई मामलों में मुख्य उपकरण के काम नहीं करने के कारण उससे जुड़े एक्सेसरीज भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं. वहीं कुछ काम करने वाले उपकरण भी लैब में मौजूदा जरूरत नहीं होने के कारण इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं. 30,90,116 रुपये की कीमत का डीएनए/आरएनए एक्सट्रैक्टर भी इस्तेमाल नहीं हो रहा है. अस्पताल के मुताबिक, यह काम नहीं कर रहा है और सक्षम अधिकारी की ओर से मरम्मत के निर्देश का इंतजार है.

दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल

दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में 94.82 लाख रुपये की कीमत का लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन बफर टैंक 2021 में लगाया गया था, लेकिन यह इस्तेमाल नहीं हो रहा है. इसे खरीदा नहीं गया था, बल्कि दान में मिला था. इसका इस्तेमाल अस्पताल में बफर स्टोरेज टैंक के तौर पर होना था. हालांकि, इसे कभी भी अस्पताल के एमजीपीएस से जोड़ा नहीं गया, जिससे यह इस्तेमाल के लायक नहीं रहा.

आंखों के बैंक के दो उपकरण, 20.95 लाख रुपये का स्पेक्युलर माइक्रोस्कोप और 1.20 लाख रुपये की लैमिनार एयर-फ्लो यूनिट भी 2019 से इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं. इन्हें एक सक्रिय आई बैंक शुरू करने के लिए खरीदा गया था, लेकिन कॉर्नियल ट्रांसप्लांटेशन की अनुमति का नवीनीकरण नहीं होने, प्रशिक्षित कॉर्नियल विशेषज्ञों की कमी, कोविड के दौरान अस्पताल के बंद रहने और बाद में अस्पताल के कोविड केयर सुविधा में बदलने के कारण यह सुविधा शुरू नहीं हो सकी. इसके बाद प्रशिक्षित नेत्र रोग विशेषज्ञों की कमी भी रही.

Advertisement

अतिरिक्त विभागों में दिखाई गई जानकारी के मुताबिक, कम से कम 350 उपकरण इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं. इनमें से ज्यादातर उपकरण कोविड महामारी के दौरान खरीदे या मंगाए गए थे और अस्पताल के सामान्य कामकाज में लौटने के बाद उनकी जरूरत नहीं रही. जिन उपकरणों की कीमत का रिकॉर्ड उपलब्ध है, उनकी कीमत करीब 90.30 लाख रुपये है.

इनमें 22 एस्ट्रोल 150 वेंटिलेटर, जिनकी कीमत 12.10 लाख रुपये है, 20 स्वस्थवायु बाइपैप, जिनकी कीमत 17 लाख रुपये है, 10 बाइपैप, जिनकी कीमत 9 लाख रुपये है, सात वेंटिलेटर, जिनकी कीमत 15.12 लाख रुपये है और 13 धामन वेंटिलेटर, जिनकी कीमत 28.08 लाख रुपये है, शामिल हैं.

रिकॉर्ड के मुताबिक, ये मशीनें अब इस्तेमाल नहीं हो रही हैं क्योंकि ये कोविड के दौरान विशेष जरूरत के लिए उपलब्ध कराई गई थीं. कुछ मशीनों को आपातकाल या आपदा की स्थिति के लिए रखा गया था. कोविड के दौरान जिन वार्डों को कोविड सुविधा में बदला गया था, उन्हें बाद में सामान्य कामकाज के लिए वापस कर दिया गया.

लोक नायक अस्पताल

लोक नायक अस्पताल में इस्तेमाल नहीं हो रहे कोविड के समय के उपकरणों में 44 बाइपैप मशीनें शामिल हैं. प्रत्येक मशीन की कीमत 1,45,000 रुपये है और इनकी कुल कीमत 63.80 लाख रुपये है. इसके अलावा 34 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर हैं, जिनकी कीमत 49,700 रुपये प्रति यूनिट है और कुल कीमत 16.90 लाख रुपये है. इस तरह कुल 78 मशीनें, जिनकी कीमत करीब 80.70 लाख रुपये है, इस्तेमाल नहीं हो रही हैं. अस्पताल के मुताबिक, ये मशीनें कोविड के दौरान मिली थीं और जरूरत के अनुसार अलग-अलग वार्डों के लिए मंगाई गई हैं.

Advertisement

दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट का गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग

दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग में तीन उपकरण दर्ज हैं, जिन्हें 2014 में खरीदा गया था. इनमें दो अपर जीआई स्कोप शामिल हैं, जिनकी कीमत 26,84,850 रुपये प्रति यूनिट है. इसके अलावा एक लोअर जीआई स्कोप है, जिसकी कीमत 23,32,050 रुपये है.

दो अपर जीआई स्कोप में से एक इस्तेमाल में है, जबकि दूसरा अपनी तय उपयोग अवधि पूरी होने के कारण इस्तेमाल नहीं हो रहा है. लोअर जीआई स्कोप भी अपनी तय उपयोग अवधि पूरी होने के कारण इस्तेमाल नहीं हो रहा है. तीनों उपकरणों की कुल कीमत 77,01,750 रुपये थी.

राव तुला राम मेमोरियल अस्पताल

राव तुला राम मेमोरियल अस्पताल, जाफरपुर में 2010 में खरीदी गई 24,93,849 रुपये की अल्ट्रासाउंड यूनिट/कलर डॉप्लर पिछले चार साल से इस्तेमाल नहीं हो रही है. अस्पताल ने इसके इस्तेमाल नहीं होने की वजह रेडियोलॉजिस्ट की उपलब्धता नहीं होना बताई है.

बीआर सुर होम्योपैथिक कॉलेज

बीआर सुर होम्योपैथिक कॉलेज में 19,08,000 रुपये की अल्ट्रासाउंड मशीन पूरी तरह काम करने की स्थिति में है. फिलहाल इसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है क्योंकि रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है. अस्पताल रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति की प्रक्रिया में है.

जीएनईएक्स दिल्ली

जीएनईएक्स दिल्ली में सीपीए की ओर से खरीदा गया एनेस्थीसिया वर्क स्टेशन इस्तेमाल नहीं हो रहा है. इसके लिए टेंडर दस्तावेज, एटी, तकनीकी जानकारी और एक्सेसरीज की सूची मिलने का इंतजार है. उपकरण को अभी ओईएम की ओर से स्थापित किया जाना बाकी है.

जीबी पंत संस्थान

जी.बी. पंत इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च यानी जीआईपीएमईआर में हलफनामे के मुताबिक किसी भी विभाग ने इस्तेमाल नहीं हो रहे मेडिकल उपकरण की जानकारी नहीं दी है और सभी मेडिकल उपकरण इस्तेमाल में हैं. हालांकि, आईजीएच वेयरहाउस से 18 मई 2026 को मंगाया गया एक एनेस्थीसिया वर्क स्टेशन अभी भी स्थापित होने का इंतजार कर रहा है. इसे स्थापित करने के लिए सीपीए की ओर से टेंडर दस्तावेज, तकनीकी जानकारी और एक्सेसरीज की जरूरत है, जिसके बाद ओईएम की ओर से उपकरण स्थापित किया जाएगा.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement