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आंखों की रोशनी चली गई है तो मदद करेगा आर्टिफिशियल कॉर्निया, दिल्ली AIIMS में मरीजों में किया जा रहा ट्रांसप्लांट

भारत में कॉर्निया ब्लाइंडनेस से पीड़ित लाखों लोगों के लिए कॉर्निया ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपचार है, लेकिन डोनर की कमी के कारण मरीजों को इलाज में देरी होती है. एम्स दिल्ली के आरपी सेंटर में आर्टिफिशियल कॉर्निया पर काम चल रहा है, जो सीमित मरीजों में सफल रहा है और भविष्य में यह विकल्प बढ़ सकता है.

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आंखों की सर्जरी
आंखों की सर्जरी

कई लोगों में आंखों का कॉर्निया खराब होने से दिखाई देना बंद हो जाता है. मेडिकल की भाषा में इसे कॉर्नियल ब्लाइंडनेस कहा जाता है. कॉर्निया का ट्रांसप्लांट करके ऐसे लोगों की आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकती है, लेकिन भारत में यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, क्योंकि जरूरत के मुकाबले कॉर्निया डोनेट करने वालों की संख्या काफी कम है. ऐसे में जरूरतमंद मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है. 

इसी समस्या से निपटने के लिए एम्स  दिल्ली के आरपी सेंटर में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के साथ-साथ आर्टिफिशियल कॉर्निया पर भी काम किया जा रहा है. एम्स के प्रोफेसर डॉ. राजेश सिन्हा ने बताया कि पिछले करीब एक साल में कुछ मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया लगाने की शुरुआत की गई है, अभी इसका इस्तेमाल सीमित मरीजों में किया जा रहा है, लेकिन भविष्य में कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों के आर्टिफिशियल  विकल्प तैयार करना से इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है.

देश में लाखों लोग कॉर्निया की बीमारी से जूझ रहे

डॉ. राजेश सिन्हा ने बताया कि देश में करीब 8.2 फीसदी लोग कॉर्निया ब्लाइंडनेस का शिकार हैं.  वहीं, 0 से 49 साल की उम्र के लोगों में इसका हिस्सा करीब 38 फीसदी तक है. आमतौर असर किसी मरीज का कॉर्निया खराब हो जाता है तो उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है. इसको वापस लाने का  प्रमुख तरीका कॉर्निया ट्रांसप्लांट होता है. इसके लिए किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसकी आंखों से स्वस्थ कॉर्निया लेकर जरूरतमंद मरीज में ट्रांसप्लांट किया जाता है.

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 कॉर्निया की जरूरत ज्यादा, लेकिन डोनर कम

डॉ. सिन्हा  बताते हैं कि देश में हर साल करीब एक लाख कॉर्निया डोनेशन की जरूरत है,  लेकिन इसकी तुलना में डोनर कम है.  उन्होंने बताया कि जरूरत के मुकाबले करीब 3 फीसदी कॉर्निया ही उपलब्ध हो पाते हैं. यही वजह है कि कई मरीजों को कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में ऑर्गन और कॉर्निया डोनेशन को लेकर जागरूकता बढ़ी है और इससे ट्रांसप्लांट की संख्या में भी सुधार हुआ है.

आर्टिफिशियल कॉर्निया क्या है?

आसान भाषा में समझें तो यह एक आर्टिफिशियल कॉर्निया है, जिस खराब कॉर्निया की जगह इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है. इसका मकसद उन मरीजों को इलाज का विकल्प देना है, जिन्हें सामान्य कॉर्निया ट्रांसप्लांट से पर्याप्त फायदा नहीं मिल सकता या जिनके लिए डोनर कॉर्निया उपलब्ध नहीं है. हालांकि, अभी इसे हर तरह की कॉर्निया ब्लाइंडनेस में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, डॉ. सिन्हा के मुताबिक, एम्स में फिलहाल इसका इस्तेमाल खास तरह के मामलों में किया जा रहा है. अब तक करीब 20 मरीजों में आर्टिफिशियल कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जा चुका है.

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कॉर्निया डोनेशन बढ़ाना भी जरूरी

डॉ. सिन्हा कहते हैं कि  कॉर्निया ब्लाइंडनेस की समस्या का समाधान केवल आर्टिफिशियल कॉर्निया बल्कि कॉर्निया डोनेशन बढ़ाने में भी है, एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका स्वस्थ कॉर्निया किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में दोबारा रोशनी ला सकता है. ऐसे में लोगों से अपील है कि कॉर्निया डोनेशन के लिए आगे आएं, ताकि जरूरतमंद मरीजों के जीवन में रोशनी आ सके.
 

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