अम्बालापुझा में राजनीति को नाटक या दिखावे की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि उसे रोजमर्रा की जिंदगी की कसौटी पर परखा जाता है. यह इलाका केरल के कुट्टनाड क्षेत्र में आता है, जहां खेत समुद्र तल से नीचे हैं और जीवन पूरी तरह पानी, नहरों, बांधों और धान की खेती पर निर्भर है. यहां लोगों के लिए राजनीति कोई दूर की चीज नहीं, बल्कि खेतों को बचाने, बाढ़ से लड़ने, पानी के बहाव को संभालने और रोजगार को सुरक्षित रखने से जुड़ी एक जरूरत है.
अम्बालापुझा अलप्पुझा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और केरल के “धान के कटोरे” के बीच स्थित हैॉ. यहां खेती अकेले किसान का काम नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा मेहनत से चलती है. बांधों की मरम्मत, पानी निकालने की मशीनें, खारे पानी को रोकने के उपाय- ये सब तभी सफल होते हैं जब सरकार, किसान और मजदूर मिलकर काम करें. इसलिए यहां के लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो बड़े भाषण देने के बजाय जमीनी समस्याओं का हल करें.
इस क्षेत्र की सामाजिक बनावट भी मिली-जुली और संतुलित है. ईझवा, दलित, पिछड़ा वर्ग, ईसाई और मुस्लिम समुदाय साथ रहते हैं. कोई एक समुदाय पूरी राजनीति पर हावी नहीं है. अंबालापुझा का प्रसिद्ध श्रीकृष्ण मंदिर धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र है, लेकिन इसके साथ-साथ यहां सुधारवादी और वामपंथी सोच की भी गहरी जड़ें हैं. धर्म और प्रगतिशील राजनीति यहां टकराते नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते हैं. इसी कारण यहां चुनाव जाति या धर्म के बजाय रोजगार, खेती, बाढ़ और कल्याण योजनाओं जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं.
अम्बलापुझा लंबे समय से वामपंथ का गढ़ रहा है. यह भरोसा नारों से नहीं, बल्कि वर्षों की संगठनात्मक मेहनत से बना है। किसान संघ, मजदूर यूनियन, सहकारी बैंक और स्थानीय निकायों का मजबूत जाल यहां की राजनीति की रीढ़ है. वरिष्ठ नेता जी. सुधाकरन ने लंबे समय तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और जमीनी जुड़ाव, सख़्त फैसलों और किसानों के हितों के लिए संघर्ष के कारण लोगों में भरोसा बनाया. आज भी लोग अपने नेताओं से वही अपेक्षा रखते हैं-संकट के समय मौजूद रहना और काम करके दिखाना.
2021 के विधानसभा चुनाव में भी यही सोच दिखाई दी. वामपंथी उम्मीदवार एच. सलाम ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस दूसरे और भाजपा काफी पीछे रही. यह जीत किसी भावनात्मक लहर से नहीं, बल्कि सोच-समझकर किए गए चुनाव का नतीजा थी. लोगों ने उस सरकार को चुना, जिसे वे बाढ़, खेती के नुकसान, मुआवजे और सामाजिक सुरक्षा के मामले में ज्यादा भरोसेमंद मानते थे.
हालांकि, यहां की समस्याएं भी बढ़ रही हैं. जलवायु परिवर्तन, खारे पानी का फैलाव, खेती की लागत और मजदूरों की कमी जैसी चुनौतियां लगातार दबाव बना रही हैं. इसलिए स्थिरता के बावजूद लोग सरकार से और बेहतर काम की उम्मीद रखते हैं.
कुल मिलाकर, अम्बलापुझा में जीत वही पाता है जो जमीन से जुड़ा हो, किसानों और मजदूरों की बात समझता हो और बाढ़, बांध, फसल और कल्याण योजनाओं जैसे मुद्दों पर ठोस काम करता हो. यहां राजनीति भाषणों से नहीं, बल्कि काम से तौली जाती है. जिस इलाके में खेत समुद्र तल से नीचे हैं, वहां राजनीति भी जमीन से जुड़ी और व्यावहारिक ही रहनी पड़ती है.
(K. A. Shaji)
Adv.m.liju
INC
Anoop Antony
BJP
M.m.thahir
SDPI
Nota
NOTA
Subhadramma Thottappally
WPOI
Subaida
SUCI
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