परसाला, केरल के तिरुवनंतपुरम जिले का सबसे दक्षिणी मुख्यभूमि विधानसभा क्षेत्र है. यह तमिलनाडु की सीमा से लगा हुआ है और अरब सागर के करीब स्थित है. क्षेत्र संख्या 136 वाला यह निर्वाचन क्षेत्र ज्यादातर ग्रामीण है, हालांकि कुछ अर्ध-शहरी इलाके भी हैं. यहां की जीवनशैली कृषि, मछली पकड़ने, सीमावर्ती आवाजाही और सामाजिक सुधार आंदोलनों से गहराई से जुड़ी हुई है.
राजधानी तिरुवनंतपुरम के पास होने के बावजूद परसाला अक्सर चर्चा से बाहर रहता है, लेकिन यह इलाका दक्षिणी केरल की विकास संबंधी समस्याओं और पर्यावरणीय चिंताओं को साफ तौर पर दर्शाता है.
परसाला का राजनीतिक इतिहास काफी पुराना और सक्रिय रहा है. यहां सामाजिक सुधार आंदोलनों, ट्रेड यूनियन संघर्षों और किसान आंदोलनों की गहरी जड़ें रही हैं. आमतौर पर यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और वामपंथी एलडीएफ के बीच कड़ा मुकाबला होता रहा है. यहां चुनावों के नतीजे अक्सर राज्यस्तरीय लहरों से ज्यादा स्थानीय समीकरणों और समुदायों के समर्थन पर निर्भर करते हैं. मछुआरा समुदाय और कृषि से जुड़े वर्गों की भूमिका चुनावी नतीजों में बेहद अहम रही है.
केरल के दक्षिणी सिरे पर स्थित परसाला, तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले से सटा हुआ है और समुद्र के भी करीब है. यहां धान के खेत, नारियल के बागान, आर्द्रभूमि और तटीय इलाके हैं.
समुद्र के करीब होने के कारण यह इलाका तटीय कटाव और खारे पानी के जमीन में घुसने जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. सीमा क्षेत्र होने के चलते लोग रोजगार, शिक्षा और व्यापार के लिए केरल और तमिलनाडु के बीच रोजाना आवाजाही करते हैं, जिससे प्रशासन और संसाधन प्रबंधन की चुनौतियां भी बढ़ती हैं.
परसाला राष्ट्रीय राजमार्ग 66, तटीय रेलवे लाइन और राज्य राजमार्गों से जुड़ा हुआ है, जिससे तिरुवनंतपुरम और नागरकोइल तक पहुंचना आसान है. हालांकि मुख्य मार्गों के बावजूद, अंदरूनी इलाकों की सड़कें और सार्वजनिक परिवहन अभी भी अपर्याप्त हैं.
इस विधानसभा क्षेत्र में परसाला कस्बा, पोझियूर, तिरुपुरम, कुलथूर, कुन्नथुकल और आसपास के तटीय व ग्रामीण पंचायत शामिल हैं.
परसाला कस्बा प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र है. पोझियूर जैसे तटीय गांवों में मछली पकड़ना मुख्य आजीविका है, जबकि अंदरूनी इलाकों में खेती, दिहाड़ी मजदूरी और छोटे व्यापार पर लोग निर्भर हैं.
यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और मत्स्य पालन पर आधारित है. नारियल की खेती प्रमुख है, साथ ही धान, केला, टैपिओका और सब्जियां भी उगाई जाती हैं.
तटीय इलाकों में पारंपरिक मछुआरा समुदायों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन हाल के वर्षों में समुद्री कटाव, घरों और मछली पकड़ने के ढांचों को नुकसान और मछलियों की घटती संख्या ने उनकी चिंता बढ़ा दी है.
केंद्र सरकार की ब्लू इकोनॉमी और मत्स्य परियोजनाओं को लेकर भी लोगों में आशंका है कि कहीं इससे छोटे मछुआरों की बजाय बड़े उद्योगों और निजी कंपनियों को ज्यादा फायदा न पहुंचे.
परसाला सामाजिक रूप से विविध क्षेत्र है. तटीय इलाकों में रहने वाला लैटिन कैथोलिक मछुआरा समुदाय परंपरागत रूप से कांग्रेस का समर्थक रहा है. हिंदू नादर समुदाय भी यहां काफी प्रभावशाली है, जिसका समर्थन कांग्रेस, सीपीआई(एम) और भाजपा के बीच बंटा हुआ है, जिससे वे चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा मुस्लिम, अन्य ईसाई समुदाय, दलित और ओबीसी वर्ग भी यहां की सामाजिक बनावट को बहुआयामी बनाते हैं. मलयालम मुख्य भाषा है, लेकिन तमिल भी व्यापक रूप से बोली जाती है.
जलवायु परिवर्तन ने परसाला की समस्याओं को और गंभीर बना दिया है. समुद्र का स्तर बढ़ना, तेज लहरें, अनियमित बारिश और लंबे सूखे ने मछली पालन और खेती दोनों को प्रभावित किया है. धान के खेत और आर्द्रभूमियां अतिक्रमण और भूमि परिवर्तन के दबाव में हैं, जिससे प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है. स्थानीय लोग अब विकास योजनाओं, पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु संकट को आपस में जुड़ी हुई समस्याओं के रूप में देखने लगे हैं.
परसाला में चुनावी मुकाबला हमेशा कड़ा रहता है. समुदायों का बंटा हुआ समर्थन इसे राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी क्षेत्र बनाता है. यहां विकास कार्य, तटीय सुरक्षा, आजीविका की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे विचारधारा से ज्यादा अहम माने जाते हैं.
मतदाता चाहते हैं कि विकास के नाम पर उनकी रोजी-रोटी, पर्यावरण और क्षेत्रीय संतुलन की अनदेखी न हो.
An Sajitha Ressal.r.k
INC
Karamana Jayan
BJP
J.r.jayakumar
BSP
Nota
NOTA
Shaju Paliyodu
IND
Selvaraj.j.r
IND
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