कोट्टायम सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि केरल का ऐसा शहरी इलाका है जहां राजनीति को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया जाता, बल्कि लगातार परखा जाता है. यह जिला मुख्यालय होने के साथ-साथ उच्च साक्षरता, कई शिक्षण-धार्मिक संस्थानों और सक्रिय नागरिक समाज के कारण राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक क्षेत्र है. यहां मतदाता भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि सोच-समझकर फैसला लेते हैं. वे नेताओं के काम का आकलन करते हैं, तुलना करते हैं और फिर वोट देते हैं.
कोट्टायम विधानसभा सीट, कोट्टायम लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और यह मध्य केरल के शहरी व अर्ध-शहरी हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है. पलई की परंपरागत राजनीति, वैकोम के सामाजिक सुधार आंदोलन या एट्टूमनूर की मजदूर राजनीति से अलग, कोट्टायम की राजनीति संस्थानों, पेशेवर वर्ग और शहरी प्रशासन से जुड़ी रोजमर्रा की समस्याओं से तय होती है. यहां चुनाव लहर नहीं होते, बल्कि जनता का स्पष्ट फैसला होते हैं.
भौगोलिक रूप से कोट्टायम छोटा है, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय है. यहां स्कूल-कॉलेज, प्रकाशन संस्थान, मीडिया दफ्तर, अस्पताल और धार्मिक मुख्यालय बड़ी संख्या में हैं. यहां की अर्थव्यवस्था खेती से ज्यादा शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी सेवाओं, व्यापार और पेशेवर कामों पर आधारित है. इसी कारण यहां के लोग राजनीतिक रूप से जागरूक और सवाल पूछने वाले हैं.
कोट्टायम में राजनीति पर चर्चा सिर्फ पार्टी दफ्तरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कक्षाओं, लाइब्रेरी, अस्पतालों, न्यूजरूम और चर्च परिसरों में भी होती है. ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, पानी की आपूर्ति और नगर पालिका की कार्यक्षमता जैसे मुद्दे यहां राजनीति के केंद्र में रहते हैं. शासन यहां कोई दूर की चीज नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव है.
यहां ईसाई समुदाय सामाजिक रूप से प्रभावशाली है, खासकर शिक्षा, प्रकाशन और स्वास्थ्य संस्थानों में. लेकिन उनका वोट एकतरफा नहीं होता. वे उम्मीदवार और परिस्थितियों के हिसाब से फैसला करते हैं. नायर समुदाय भी पेशेवरों, व्यापारियों और सरकारी कर्मचारियों के बीच मजबूत है और उनका वोट प्रशासनिक प्रदर्शन व नेतृत्व की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है.
एझावा समुदाय भी बड़ी संख्या में है, खासकर सेवा और व्यापार क्षेत्र में. अब उनके वोट पर संगठन से ज्यादा शहरी सुविधाएं और सरकारी योजनाओं का असर पड़ता है. मुस्लिम समुदाय संख्या में कम है, लेकिन व्यापार और सेवाओं में उनकी मौजूदगी साफ दिखती है. उनका झुकाव पहले यूडीएफ की ओर रहा है, लेकिन अब उम्मीदवार की छवि ज्यादा मायने रखती है. अनुसूचित जाति और अन्य वंचित समुदायों के लिए सरकारी सेवाओं तक पहुंच और सम्मानपूर्ण प्रशासन बेहद अहम है.
कोट्टायम केरल की सबसे कड़ी टक्कर वाली सीटों में से एक है. न तो यूडीएफ और न ही एलडीएफ को यहां स्थायी बढ़त हासिल है. भाजपा का वोट शेयर सीमित है, लेकिन शहरी मध्यम वर्ग में उसकी मौजूदगी चुनाव को और प्रतिस्पर्धी बनाती है. यहां सत्ता कभी स्थायी नहीं होती. काम दिखा तो इनाम, नहीं तो सजा तय है.
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तिरुवंचूर राधाकृष्णन ने 65,401 वोट पाकर सीपीआई(एम) के के. अनिलकुमार को हराया, जिन्हें 46,658 वोट मिले. भाजपा तीसरे स्थान पर रही. जीत का अंतर 18,743 वोट था. यह न तो किसी लहर का नतीजा था और न ही विपक्ष की हार, बल्कि लोगों ने भरोसे, पहुंच और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर फैसला किया.
यहां अलग-अलग इलाकों की अलग समस्याएं हैं. शहरी वार्डों में पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग की आवाज ज्यादा प्रभावी है. कॉलेजों, अस्पतालों और मीडिया संस्थानों के आसपास विचार बनते हैं. रिहायशी इलाकों में ट्रैफिक और सुविधाओं की चिंता रहती है, जबकि बाहरी इलाकों में आबादी का बदलाव और रोजगार की समस्याएं दिखती हैं.
कोट्टायम में जीत उसी को मिलती है जो भरोसेमंद हो, जनता तक पहुंचे और प्रशासनिक रूप से सक्षम हो. केवल भाषण या विचारधारा से काम नहीं चलता. यहां लोग समाधान चाहते हैं, प्रदर्शन नहीं.
कुल मिलाकर, कोट्टायम ऐसा क्षेत्र है जहां लोकतंत्र बहुत सतर्क और सक्रिय है. यहां नेता को हमेशा साबित करना पड़ता है कि वह काम कर रहा है. यही वजह है कि कोट्टायम केरल की राजनीति में एक मिसाल की तरह देखा जाता है- जहां राजनीति भावना से नहीं, बल्कि काम और जिम्मेदारी से चलती है.
(K. A. Shaji)
Adv.k.anilkumar
CPI(M)
Minerva Mohan
BJP
Nota
NOTA
Sreekumar Chakkala
BSP
M.k.shahazad
SUCI
Arun Mangattu
ABHM
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