ईरान की जंग अब यूरोप तक पहुंचती दिख रही है. ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने ब्रिटेन के महत्वपूर्ण एयर बेस को खुलकर निशाना बनाते हुए धमकी दी है. इस बेस का नाम है RAF फेयरफोर्ड, जो ग्लॉस्टरशायर में स्थित है. ईरान का कहना है कि कोई भी बेस जो ईरानी क्षेत्र पर हमले के लिए इस्तेमाल होता है, वह सही टारगेट है. यह धमकी इसलिए गंभीर मानी जा रही है क्योंकि ब्रिटेन NATO का महत्वपूर्ण सदस्य है. लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि इतनी दूर- लगभग 4506 KM से ईरान हमला कैसे करेगा?
विश्लेषकों का मानना है कि यह धमकी सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक भी है. ईरान पूरे क्षेत्र को युद्ध में घसीटना चाहता है ताकि उसके विरोधी देशों पर दबाव बढ़े. ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के बीच IRGC ने तस्नीम न्यूज एजेंसी के जरिए RAF फेयरफोर्ड को वैध लक्ष्य बताया.
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उनका आरोप है कि अमेरिका ने यहां से B-1 लांसर बमवर्षक उड़ानें फिर शुरू कर दी हैं, जो ईरान पर हमले कर रहे हैं. हालांकि CNN ने इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया, लेकिन Axios ने रिपोर्ट किया कि मंगलवार को B-1 ने IRGC के ठिकानों पर हमला किया था.

RAF फेयरफोर्ड अमेरिकी रणनीतिक बमवर्षकों का फॉरवर्ड बेस बना हुआ है. मार्च से यहां B-1 लांसर तैनात हैं. बाद में B-52 भी आए. यह बेस पूरे युद्ध में अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहा है. ईरान का कहना है कि अगर कोई देश अमेरिकी हमलों में मदद करता है, तो वह भी सुरक्षित नहीं रहेगा. यह धमकी ब्रिटेन को सीधे चेतावनी देती है कि वह अमेरिका का साथ देना बंद करे.
ब्रिटेन की प्रतिक्रिया और तैयारियां
ब्रिटेन ने इस धमकी का सख्त जवाब दिया है. ब्रिटिश अधिकारियों ने कहा कि हमारी सशस्त्र सेनाएं यूनाइटेड किंगडम को किसी भी तरह के हमले से सुरक्षित रखने के लिए तैयार हैं, चाहे वह हमारे क्षेत्र पर हो या बाहर से. यह बयान साफ संदेश देता है कि ब्रिटेन अपनी जमीन की रक्षा करने में सक्षम है.
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ब्रिटेन में RAF फेयरफोर्ड जैसे बेस लंबे समय से अमेरिकी सहयोग का प्रतीक रहे हैं. लेकिन इस युद्ध में इनका इस्तेमाल ईरान के लिए नई चुनौती बन गया है. ब्रिटेन अब यूरोपीय देशों के साथ मिलकर अपनी हवाई सुरक्षा बढ़ा रहा है. विशेषज्ञ कहते हैं कि ब्रिटेन की एयर डिफेंस सिस्टम मजबूत है, लेकिन लंबी दूरी के हमलों से पूरी तरह बचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
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ईरान इतनी दूर हमला कैसे कर सकता है?
ईरान की राजधानी तेहरान से ग्लॉस्टरशायर की दूरी करीब 4506 किलोमीटर है. इतनी दूर तक हमला करना ईरान की मौजूदा मिसाइल और ड्रोन क्षमता से बाहर है. मार्च में ईरान ने डिएगो गार्सिया (अमेरिकी बेस) की ओर दो मिसाइलें दागी थीं, लेकिन वे लक्ष्य तक नहीं पहुंचीं. इसी तरह RAF फेयरफोर्ड पर सीधा हमला करना ईरान के लिए बेहद मुश्किल है.
ईरान के पास मुख्य रूप से मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो 1000-2000 किलोमीटर तक की हैं. यूरोप तक पहुंचने के लिए उन्हें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) की जरूरत होगी, जो फिलहाल ईरान के पास सीमित या अपुष्ट है.
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ड्रोन से हमला करना और भी कठिन है क्योंकि इतनी लंबी यात्रा में उन्हें इंटरसेप्ट किया जा सकता है. फिर भी, ईरान की धमकी का असली मकसद हमला करना नहीं, बल्कि डर पैदा करना और NATO को तोड़ना है.
धमकी का राजनीतिक और रणनीतिक महत्व
यह धमकी सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है. यह पूरे यूरोप को संदेश है कि अगर वे अमेरिका को अपने एयरबेस उपलब्ध कराते हैं, तो वे भी खतरे में पड़ सकते हैं. इससे हर यूरोपीय राजधानी को सोचना पड़ेगा कि अमेरिकी बमवर्षकों को सहायता देने का खर्च क्या है.
NATO सहयोगी होने के कारण ब्रिटेन अब सार्वजनिक रूप से अमेरिकी बेस की रक्षा का बचाव करने को मजबूर है. इससे घरेलू स्तर पर राजनीतिक बहस शुरू हो सकती है. कुछ लोग पूछ रहे हैं कि ब्रिटेन को ईरान से दूर के युद्ध में क्यों शामिल होना चाहिए?
ईरान की रणनीति हॉरीजोंटल एस्केलेशन की है. वह जंग को सिर्फ मध्य पूर्व तक नहीं रखना चाहता, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हर मोर्चे पर दबाव बनाना चाहता है. इससे अमेरिका के संसाधन बंटेंगे और युद्ध लंबा खिंचेगा. इस धमकी से खाड़ी क्षेत्र के अलावा यूरोप भी प्रभावित हो रहा है.
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तेल की कीमतें, सुरक्षा और सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है. अगर ईरान सफलतापूर्वक यूरोपीय बेस पर हमला करता है, तो NATO Article 5 (सामूहिक रक्षा) एक्टिवेट हो सकता है, जिससे बड़ा युद्ध शुरू हो सकता है.
दूसरी ओर, अगर ईरान असफल रहता है, तो उसकी साख को नुकसान पहुंचेगा. लेकिन फिलहाल ईरान साइकोलॉजिकल युद्ध जीतने की कोशिश कर रहा है. RAF फेयरफोर्ड जैसे बेस पूरे युद्ध में अमेरिका की ताकत का प्रतीक बने हुए हैं. B-1 और B-52 बमवर्षक यहां से ईरान पर हमले कर रहे हैं, जो ईरान को परेशान कर रहा है.

भविष्य में और क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि ईरान सीधा हमला करने की बजाय प्रॉक्सी हमलों या साइबर अटैक पर जोर दे सकता है. ब्रिटेन और NATO अपनी एयर डिफेंस को और मजबूत करेंगे. अमेरिका भी अपने यूरोपीय बेस की सुरक्षा बढ़ा रहा है.
यह घटना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध कितना जटिल हो गया है. दूरी अब पहले जितनी बड़ी बाधा नहीं रही, लेकिन फिर भी लॉजिस्टिक चुनौतियां बनी हुई हैं. ईरान की धमकी ब्रिटेन को मजबूर कर रही है कि वह अपनी नीति पर दोबारा विचार करे.
अगर जंग और बढ़ी तो यूरोप के कई देशों को फैसला करना होगा - अमेरिका का साथ दें या तटस्थ रहें? इस फैसले का असर न सिर्फ युद्ध पर, बल्कि वैश्विक सुरक्षा पर भी पड़ेगा. ईरान की यह नई चाल युद्ध को नया आयाम दे रही है. RAF फेयरफोर्ड अब सिर्फ एक बेस नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय तनाव का केंद्र बन गया है.