अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से तनाव चल रहा है. ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रभाव और अमेरिकी सहयोगियों (इजरायल, सऊदी अरब) पर हमलों को लेकर दोनों देश आमने-सामने रहते हैं. 2025-2026 में तनाव चरम पर पहुंच गया, जब अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले किए.
इस बीच सोशल मीडिया और कुछ खबरों में दावे चले कि अमेरिका ने इन ऑपरेशनों के लिए पाकिस्तान के एयर बेस या एयरस्पेस का इस्तेमाल किया. लेकिन क्या यह सच है? आज अमेरिका ईरान के खिलाफ कौन से बेस इस्तेमाल करता है? आइए समझते हैं.
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कोल्ड वॉर दौर (1950-1990): मुख्य रूप से सोवियत संघ के खिलाफ
अमेरिका और पाकिस्तान के सैन्य रिश्ते पुराने हैं. कोल्ड वॉर में पाकिस्तान अमेरिका का करीबी सहयोगी था.
पेशावर (बदाबेर बेस)
1950-60 के दशक में अमेरिका ने पेशावर के पास बदाबेर बेस पर जासूसी सुविधाएं बनाईं. यहां से U-2 जासूस विमान उड़ाए जाते थे, जो सोवियत संघ पर नजर रखते थे. 1 मई 1960 को एक U-2 विमान पेशावर से उड़ा और सोवियत संघ ने इसे मार गिराया. पायलट गैरी पावर्स पकड़े गए. यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय कांड बना.

यह ऑपरेशन पूरी तरह सोवियत संघ के खिलाफ था. ईरान का कोई सीधा कनेक्शन नहीं. हालांकि पाक-ईरान सीमा पास होने से कुछ INCIDENTAL निगरानी संभव थी, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं. 1970 तक अमेरिका ने बदाबेर बेस खाली कर दिया.
अन्य कोल्ड वॉर सुविधाएं: अमेरिका को पाकिस्तान से कुछ लॉजिस्टिक सपोर्ट मिला, लेकिन मुख्य फोकस सोवियत संघ और बाद में अफगानिस्तान (1979 सोवियत इनवेजन) था. ईरान पर टारगेटेड जासूसी का कोई रिकॉर्ड नहीं.
9/11 के बाद (2001-2011): अफगानिस्तान युद्ध और ड्रोन ऑपरेशन
2001 में अल-कायदा के हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया. पाकिस्तान ने अमेरिका को सपोर्ट दिया और कई बेस इस्तेमाल की अनुमति दी.
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शमसी एयरफील्ड (बलूचिस्तान)
यह सबसे चर्चित बेस रहा है. 2001 से 2011 तक CIA ने यहां से ड्रोन हमले किए. पाकिस्तान के ट्राइबल एरिया और अफगानिस्तान में तालिबान-अलकायदा पर. बलूचिस्तान ईरान से सटा होने से कुछ पुरानी अफवाहें थीं कि यहां से ईरान पर भी सर्विलांस होता था. लेकिन आधिकारिक दस्तावेज और जांच बताते हैं कि इसका इस्तेमाल सिर्फ अफगानिस्तान ऑपरेशन के लिए था. ईरान पर कोई पक्का सबूत नहीं.
2011 में नाटो हमले में पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिका को शमसी बेस खाली करने को कहा. दिसंबर 2011 तक अमेरिका ने बेस छोड़ दिया.

2011 के बाद अमेरिका के पास पाकिस्तान में कोई स्थाई बेस नहीं. रिश्ते खराब हुए और ड्रोन ऑपरेशन भी कम हो गए.
सोशल मीडिया पर दावे, सरकार ने खारिज किए
2025 में अमेरिका ने ईरान पर हमले किए. 2026 में तनाव बढ़ने पर अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बड़ी तैनाती की. इसी दौरान सोशल मीडिया पर दावे चले...
अमेरिकी विमान पाकिस्तान के शमसी, नूर खान (चकलाला, रावलपिंडी), दल्बंदिन, पसनी बेस पर उतरे. पाकिस्तान ने एयरस्पेस या बेस दिए ताकि अमेरिका ईरान पर हमला कर सके.
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पाकिस्तान सरकार ने इन सभी दावों को सख्ती से खारिज किया...
जनवरी 2026 में सूचना मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तानी क्षेत्र या शमसी बेस का ईरान के खिलाफ कभी इस्तेमाल नहीं हुआ. कोई अमेरिकी फोर्स यहां नहीं है.
विदेश मंत्रालय ने बयान दिया कि पाकिस्तान अपना क्षेत्र, एयरस्पेस या जल क्षेत्र ईरान के खिलाफ किसी हमले के लिए नहीं देगा. पाकिस्तान ने अमेरिकी हमलों की सार्वजनिक निंदा भी की.
फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स (डॉन, ट्रिब्यून आदि) ने कहा कि ये दावे बेबुनियाद हैं. कोई ठोस सबूत नहीं.
कुछ विश्लेषक कहते हैं कि पाकिस्तान सार्वजनिक रूप से निंदा करता है लेकिन चुपके से मदद कर सकता है, लेकिन इसका भी कोई पक्का प्रमाण नहीं है. आधिकारिक स्टैंड स्पष्ट इनकार है.
आज अमेरिका ईरान के खिलाफ कौन-कौन से बेस इस्तेमाल करता है?
2026 में ईरान से तनाव के कारण अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बड़ी सैन्य तैनाती की है. मुख्य बेस खाड़ी देशों में हैं (CENTCOM के तहत)...
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इनके अलावा अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD, पैट्रियट) तैनात किए गए हैं. पाकिस्तान का कोई बेस या एयरस्पेस इसमें शामिल नहीं.
हकीकत क्या है?
इतिहास में अमेरिका ने पाकिस्तानी बेस मुख्य रूप से सोवियत संघ और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल किए. ईरान पर सीधे टारगेटेड जासूसी या ऑपरेशन का कोई पक्का सबूत नहीं. शमसी जैसे बेस की निकटता से अफवाहें उड़ीं, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड कुछ और कहते हैं. 2025-2026 अफवाहें पाकिस्तान ने सख्ती से खारिज कीं. आज अमेरिका खाड़ी देशों और हिंद महासागर के बेस से ईरान पर नजर रखता और ऑपरेशन चलाता है.