सरकार ने संसद से टैक्सेशन और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित करा लिया है. यह एक ऐसा कानून है, जो टैक्स व्यवस्था, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, विदेशी निवेश और REIT/InvIT जैसे कई चीजों पर छूट देता है. इसके साथ ही यह बिल सरकार को UPI पर MDR लगाने की अनुमति देता है. इसी एमडीआर को लेकर बहस छिड़ी हुई है और इसकी आलोचना हो रही है.
सरकार का कहना है कि आम यूजर्स और छोटे व्यापारियों के UPI उपयोग पर MDR चार्ज नहीं लागू होगा. यह सिर्फ बड़े व्यापारियों पर लागू होगा, जिसे 2000 रुपये के ऊपर के पेंमेंट पर लागू किया जा सकता है. कटा हुआ मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) बैंक और पेंमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच बंट सकता है. सरकार का कहना है कि यह कदम बैंकिंग और फाइनेंशियल सिस्टम को बड़ा सपोर्ट दे सकता है.
इस एमडीआर चार्ज को लेकर दिग्गज इकोनॉमिस्ट ने सरकार की बातों का खंडन किया है. उनका कहना है यह गलत तर्क है कि MDR का उपभोक्ताओं पर कोई असर नहीं होगा. अर्थशास्त्री अजीत रानाडे ने तर्क दिया है कि यूपीआई भुगतान मुफ्त रहना चाहिए.
कैसे उपभोक्ता हो सकते हैं प्रभावित
रानाडे ने कहा कि UPI अब भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा है. जुलाई में, इसने लगभग 30 ट्रिलियन रुपये के 24 अरब लेनदेन किया. रानाडे ने कहा कि नया बिल संशोधन स्वयं कोई एमडीआर लागू नहीं करता है. लेकिन यह उस सुरक्षा को हटा देता है, जिसने यूपीआई और रुपे भुगतान के लिए एमडीआर को शून्य पर बनाए रखा था. इसका मतलब है कि UPI सर्विस यूज पर फ्यूचर में कभी भी चार्ज लग सकता है.
वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि कोई भी MDR केवल व्यापारियों द्वारा ही चुका जाएगा, कंज्यूमर्स द्वारा नहीं. उन्होंने यह भी कहा कि सड़क किनारे विक्रेताओं को किए जाने वाले कम कीमत के भुगतान समेत अधिकांश व्यापारी लेनदेन निःशुल्क रहेंगे.
इसी बात पर रानाडे ने तर्क दिया कि इसका मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ता इससे बचा रहेगा. यह सोचना गलत है कि एमडीआर का भुगतान व्यापारी द्वारा किया जाएगा और इससे उपभोक्ताओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसे या तो व्यापारी स्वयं वहन कर सकते हैं या फिर ऊंची कीमतों के माध्यम से उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं.
इन लोगों पर नहीं लगेगा चार्ज
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्ति और व्यापारी के बीच होने वाले 85% से अधिक लेन-देन छोटी रकम के होते हैं. चाय के लिए 20 रुपये या ऑटो चालक को दिए गए 150 रुपये जैसे भुगतान ज्यादातर किए जाते हैं. ऐसे में इस तरह ट्रांजेक्शन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा.
₹20,000 करोड़ की साालाना लागत
रानाडे ने स्वीकार किया कि UPI में काफी लागत आती है. बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) सर्वर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी का पता लगाने, विवाद समाधान और निपटान पर खर्च करते हैं. उन्होंने कहा कि उद्योग जगत का अनुमान है कि इसकी सालाना लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये है, जबकि सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रतिपूर्ति इसका केवल एक छोटा सा हिस्सा ही कवर करती है. यूपीआई की लागत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, और बैंकों और भुगतान कंपनियों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे अनिश्चित काल तक UPI को सब्सिडी देते रहें. लेकिन इससे यह सवाल हल नहीं होता कि इसका भुगतान कौन करेगा.
रानाडे ने कहा कि लागत और कीमत में अंतर होता है. पब्लिक इंफ्रा महंगी हो सकती है, लेकिन इसके लिए उपयोगकर्ताओं से हर उपयोग पर शुल्क लेना आवश्यक नहीं है, क्योंकि इसके लाभ व्यापक रूप से समाज को मिलते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि UPI में भी ऐसी ही खासियत हैं, और जैसे-जैसे अधिक लोग और व्यापारी इसका उपयोग करते हैं, इसकी वैल्यू बढ़ती जाती है.
आरबीआई ने दिया ये सुझाव
रानाडे ने सुझाव दिया कि सरकार UPI को बनाए रखने की लागत को पूरा करने के लिए अन्य तंत्रों का उपयोग कर सकती है. उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को 2025-26 में दिया जाने वाला डिविडेंड 2.86 ट्रिलियन रुपये था. यूपीआई की सालाना लागत उस राशि का लगभग 7% है. यह राशि व्यापारियों पर कोई चार्ज लगाए बिना बैंकों को मुआवजा दे सकता है.