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'मुसलमानों को भारत से निकालना हिंदुत्व नहीं, सभी रास्ते ईश्वर की तरफ जाते हैं...', न्यूयॉर्क में बोले मोहन भागवत

RSS Mohan Bhagwat US Speech: अमेरिका के न्यूयॉर्क में 'एक दुनिया, एक मानवता' कार्यक्रम को मोहन भागवत को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने बताया कि पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, पर अंतिम सत्य और मानवता ही है. जो सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए वो हिंदू नहीं.

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न्यूयॉर्क में मोहन भागवत ने एक दुनिया, एक मानवता कार्यक्रम को संबोधित किया (YouTube/@centreforresponsibleleader5867)
न्यूयॉर्क में मोहन भागवत ने एक दुनिया, एक मानवता कार्यक्रम को संबोधित किया (YouTube/@centreforresponsibleleader5867)

अमेरिका के न्यूयॉर्क में 'एक दुनिया, एक मानवता' कार्यक्रम को मोहन भागवत को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि मैं ऐसे समाज में काम कर रहा हूं, जो परंपरागत रूप से यह कहता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है. सत्य एक है और मानवता उसी सत्य की उपज है. इसलिए मानवता एक है. सत्य एक है, लेकिन उसे अलग-अलग तरीकों से बताया और समझाया जाता है. क्योंकि हम मनुष्य अपने अनुभवों और अपनी सीमाओं के कैदी हैं.

उन्होंने बताया कि हम इंसान हैं और कम से कम सात रंग देखते हैं. मैं एक वेटरिनरी डॉक्टर हूं, मुझे कुत्तों के बारे में पता है. कुत्ते सिर्फ काले और सफेद रंग देखते हैं. अब आप कुत्ते को दुनिया के बारे में कितना भी समझाएं, वह उसे हमारी तरह कभी नहीं समझ पाएगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कुत्ते का अनुभव असत्य है. उसने जो देखा है, वह उसके लिए वास्तविक है. उसी तरह एक इंसान के रूप में सात रंगों को देखना और उसका अनुभव करना भी हमारे लिए सत्य है. लेकिन हम सभी एक ही चीज का अनुभव कर रहे हैं, जो उस सत्य पर आधारित है.

उन्होंने कहा कि दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं. आज की दुनिया में धर्मों की पहचान काफी हद तक उनके रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों से होती है. किसी धार्मिक अनुशासन में शामिल होने और उस रास्ते पर चलते हुए दिव्यता तक पहुंचने के लिए इन रीति-रिवाजों और अनुशासन का पालन करना भी जरूरी है. लेकिन हर धर्म हमें कहां ले जा रहा है? वह हमें उसी अंतिम सत्य की ओर ले जा रहा है.

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अंतिम सत्य की खोज ही उद्देश्य

मोहन भागवत ने कहा कि अगर मैं आपको किसी चीज की ओर इशारा करके कहूं कि वहां रोशनी है, तो आप पहले मेरी उंगली को देखेंगे और फिर उस रोशनी को. लेकिन अगर आप मेरी उंगली को ही देखते रहेंगे और उसी पर अटके रहेंगे, तो आप उस रोशनी को कभी नहीं देख पाएंगे. तब उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. अंतिम सत्य की खोज करना ही हमारा उद्देश्य है. उस दिव्यता को, जिसे हम अलग-अलग नामों से पुकारते हैं. विज्ञान आजकल उसे ‘कॉन्शियसनेस’ यानी चेतना कहता है.

उन्होंने कहा कि हमें सत्य की उस राह पर चलना है. लेकिन हमें यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि लक्ष्य एक है और रास्ते अनेक हैं. मैं हमारी परंपरा से एक और उदाहरण देना चाहता हूं. हमारी परंपरा में कहा गया है कि धरती पर गिरने वाला हर पानी अंततः समुद्र तक पहुंचता है. रास्ते अलग-अलग हैं. कई रास्ते हैं. कुछ सीधे हैं, कुछ घुमावदार हैं. कुछ रास्ते दूसरों से लंबे हैं, कुछ छोटे हैं. कुछ बहुत अच्छी तरह बनाए गए रास्ते हैं और कुछ सिर्फ जंगल के रास्ते हैं. रास्ते अलग होना स्वाभाविक है और अलग-अलग रास्ते हमारी धारणाओं में अंतर की वजह से होते हैं. लेकिन सभी रास्ते उसी दिव्यता, उसी ईश्वर या उस सत्य तक पहुंचने के लिए हैं.

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भारत ने सभी को दिया आश्रय

मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां सभी संप्रदायों के लोगों के लिए परंपरागत रूप से स्थान रहा है. भारत ने हमेशा हर किसी को आश्रय देने की कोशिश की है. दुनिया में जिन्हें सुरक्षित स्थान नहीं मिला, उन्होंने यहां आकर शरण ली. लेकिन इन सब चीजों के कारण कुछ परेशानियां और अस्थिरताएं भी पैदा हुई हैं.

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हम, आरएसएस के रूप में, क्योंकि हमारे पास यह ज्ञान है कि पूरी मानवता एक है, हमारा कर्तव्य मानते हैं कि हम दुनिया भर में जाएं और हर व्यक्ति को यह बताएं कि हमारी विविधता के बावजूद हम एक हैं.

विविधता प्रकृति का नियम, एकता सत्य

विविधता एक सजावट है. इसे स्वीकार किया जाना चाहिए, इसका सम्मान किया जाना चाहिए और इसकी रक्षा की जानी चाहिए. जिस तरह मैं अपनी विशिष्ट प्रकृति की रक्षा करता हूं, उसी तरह मुझे दूसरे की विशिष्टता की भी रक्षा करनी चाहिए. क्योंकि विविधता प्रकृति का नियम है और एकता प्रकृति के पीछे का सत्य है. इसी सोच के साथ 1925 में यह यात्रा शुरू हुई. पिछले 100 वर्षों के दौरान हमने अपने समाज में अपने लिए एक स्थान और प्रतिष्ठा बनाई है.

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आज जब मैं यह बात कह रहा हूं तो कोई पूछ सकता है कि आप इतने वर्षों से कहां थे? आप आज यह कहानी बता रहे हैं. हम यहीं थे, लेकिन हमें समाज ने स्वीकार नहीं किया या हमारी उपेक्षा की गई. अगर मैं उस समय यहां आता और इसमें भाग लेने की कोशिश करता, तो शायद मुझे बाहर ही रोक दिया जाता.

आज हमारे समाज में हमारी कुछ बात सुनी जाती है. उस पूरे बोझ के बावजूद हम उम्मीद करते हैं कि साथ मिलकर रह सकते हैं.

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मुस्लिम भाइयों से संवाद का उदाहरण

2018 में दिल्ली में एक कार्यक्रम में मुस्लिम भाई भी मौजूद थे. उन्होंने मुझसे सवाल पूछा - आप एक हिंदू संगठन हैं, आप हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो हमारा क्या होगा? क्या आप हमें बाहर निकाल देंगे? मैंने कहा, नहीं. यह हिंदू विचार नहीं है. अगर कोई हिंदू यह मानता है कि कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता. हिंदू होने का अर्थ है यह मानना कि सभी रास्ते उसी सत्य की ओर जाते हैं और हर इंसान की गरिमा है. मनुष्यों में कोई अंतर नहीं है. एक ज्ञानी व्यक्ति कुत्ते और विद्वान ब्राह्मण में भी समानता देखता है, क्योंकि ये सभी अंतर प्रकृति की विविधता का हिस्सा हैं. हमें इस विविधता के साथ आगे बढ़ना है. लेकिन जो वास्तविकता हमेशा मौजूद है, वह एक है. हमारे बीच के अंतर और उनके भ्रम कुछ समय के लिए मौजूद रह सकते हैं, लेकिन अंततः वे समाप्त हो जाएंगे.

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ज्ञान की कमी नहीं, व्यवहार में उतारने की जरूरत

उन्होंने कहा कि मैं आपको यह सिखाने नहीं आया हूं. आप यह जानते हैं और वास्तव में आप ही इसे लोगों को सिखा रहे हैं. समस्या मनुष्य के ज्ञान की नहीं है. पूरी दुनिया की पारंपरिक ज्ञान-परंपराओं में यह बात मौजूद है. हर समाज की अपनी परंपरा में यह ज्ञान है. समस्या यह है कि अब हमें ऐसी स्थिति बनानी है, जहां यह ज्ञान प्रभावी हो और मानव व्यवहार को दिशा दे. हमें एकता का ज्ञान और प्रेम का ज्ञान अपने व्यवहार में उतारना होगा.

राजनीति से पहले समाज में बदलाव जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि आज यहां अलग-अलग सत्रों में जो बातें कही गई हैं, मैं उनमें से हर बात से सहमत हूं. हम नीतियों को बनने से पहले प्रभावित करना चाहते हैं. हम उन्हें समझाना चाहते हैं. हम युद्ध रोकना चाहते हैं. इन सभी चीजों के लिए हमें राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ानी होगी.

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लेकिन हम शुरुआत राजनीति से नहीं कर सकते.

उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा मानवता की एकता की बात करती है और हमारे सभी नेताओं ने अलग-अलग समय पर इस पर जोर दिया है. आजादी के बाद बने हमारे संविधान में भी इसी भावना पर जोर दिया गया है. लेकिन यह केवल राजनीति के माध्यम से नहीं हो रहा है. दुर्भाग्य से राजनीति अब कई जगह स्वार्थ का खेल बन गई है.

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समाज से शुरुआत, फिर राजनीति पर प्रभाव

हमारा अनुभव यह है कि शुरुआत समाज से करनी होगी. हमने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है. 2018 के बाद मेरे उस भाषण पर कई लोगों ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने हमें संवाद के लिए बुलाया. इसके बाद हमने मुख्य रूप से मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों के साथ संवाद शुरू किया. संवाद पहला कदम है. दूसरा कदम सेवा है. संवाद के साथ-साथ हमें सेवा भी करनी है और हम यह कर रहे हैं. अपने अस्तित्व के समय से ही हम सेवा करते आए हैं. सेवा करते समय हम यह भेद नहीं देखते कि सामने वाला कौन है. जिसे जरूरत है, उसकी सेवा की जाती है. आज समाज की मदद से हमारे करीब 1 लाख 30 हजार छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चल रहे हैं. ये हर जगह काम करते हैं और सभी की समान रूप से सेवा करते हैं.

सेवा में धर्म और पहचान का भेद नहीं

मोहन भागवत ने कहा कि अपनी बात को मजबूत करने के लिए एक उदाहरण देना चाहता हूं. हरियाणा के ऊपर दो विमान आपस में टकरा गए थे. दोनों विमान अरब देशों के थे और ज्यादातर यात्री मुस्लिम थे. दुर्घटना के बाद हमारे स्वयंसेवक सबसे पहले वहां पहुंचने वालों में थे. उन्होंने घायलों का इलाज किया, जो बेहद गंभीर स्थिति में थे. बाकी लोगों की मृत्यु हो चुकी थी. उन्होंने शवों को निकालने, अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने और मृतकों की पहचान कराने में भी मदद की. उस समय हमने यह नहीं सोचा कि ये मुस्लिम हैं. हम यह कर सके क्योंकि हम किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं रखते. हम बदले में कुछ नहीं चाहते.

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इसीलिए प्रचार के मामले में हम काफी पीछे हैं. हमारे बारे में गलत नैरेटिव के कारण कई धारणाएं बनी हुई हैं. लेकिन जब आप हमें अंदर से आकर देखते हैं तो इनमें से कई धारणाएं खत्म हो जाती हैं.

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समाज में एकता का माहौल बनाना होगा

मोहन भागवत ने कहा कि मैं यह इसलिए बता रहा हूं क्योंकि हमें समाज से शुरुआत करनी होगी और अपनी ताकत का निर्माण करना होगा, ताकि हम राजनीति को प्रभावित कर सकें. आज लोकतंत्र में राजनीति काफी हद तक जनमत पर निर्भर करती है. अगर जनता की राय मजबूत हो, तो कोई भी राजनेता उसके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं करेगा. इसलिए आज की साझा चर्चा के बाद हमें समाज में काम करना होगा और शुरुआत स्थानीय स्तर से करनी होगी. हमारे अपने देश में ऐसे छोटे-छोटे क्षेत्र और समुदाय बनाने होंगे, जहां निस्वार्थ सेवा और एकता का वातावरण हो. और इसके साथ संवाद जारी रखना होगा. इसी संवाद के माध्यम से हमें लोगों को जोड़ना होगा.

सेवा से समाज में बदलाव की शुरुआत

उन्होंने कहा कि जब लोग हमारी सेवा परियोजनाओं में आते हैं, तो उनमें से बहुत से लोग अपनी परेशानियों से राहत पाते हैं. इसके बाद वे खुद हमारे प्रकल्पों में काम करने के लिए वापस आते हैं. वे महसूस करते हैं कि इस परियोजना ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और अब उन्हें भी इसमें कुछ योगदान देना चाहिए. हम उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं सिखाते. यह भावना अपने आप पैदा होती है. यही बदलाव लेकर आती है. हमें अपने-अपने स्थान पर उस दुनिया के मॉडल बनाने चाहिए, जिसे हम देखना चाहते हैं.

संवाद को स्थानीय स्तर तक ले जाना होगा

हमें इस संवाद को लगातार जारी रखना चाहिए. इस संवाद को निचले स्तर तक भी ले जाना होगा. अगर हम यहां से शुरुआत करते हैं और अपने लोगों को इसके बारे में बताते हैं, फिर अलग-अलग देशों में संवाद शुरू करते हैं, उन देशों के प्रांतों में, जिला स्तर पर और ब्लॉक स्तर तक जाते हैं, तो धीरे-धीरे वातावरण बदलेगा.

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23 सत्रों से मिली सीख

मोहन भागवत ने कहा कि सबसे पहले मैं आप सभी का धन्यवाद करता हूं. पिछले 23 सत्रों में आपने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया है. मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि आप सभी एक ही दिशा में सोच रहे हैं. हमारे मन में भी यही विचार चल रहे हैं. हम एक ही पेज पर हैं. हमें सिर्फ एक-दूसरे से जुड़ना है और स्थानीय स्तर पर काम शुरू करना है. आपने जो कुछ कहा है, वह पूरी तरह सही है. हमारी सोच भी उसका समर्थन करती है और हमारा व्यावहारिक अनुभव भी यही बताता है. मुझे लगता है कि अगर हम सब मिलकर काम शुरू करें, तो हम स्थिति को बदल सकते हैं. लेकिन इसमें काफी समय लगेगा. लोगों के मन को बदलना आसान नहीं है.

ज्ञान काफी नहीं, आदत बदलनी होगी

हर कोई जानता है कि ईश्वर यहां है. हर कोई जानता है कि क्या होना चाहिए. लेकिन फिर भी लोग अपनी पसंद-नापसंद के कारण गलत रास्ते पर चले जाते हैं. मैं खुद डायबिटिक हूं. मुझे पता है कि चीनी मेरे लिए ठीक नहीं है. मैं वेटरिनरी डॉक्टर हूं, इसलिए मानव डायबिटीज के बारे में भी जानता हूं. लेकिन जब कोई मिठाई सामने आती है तो मैं कहता हूं, कभी-कभार खाने में क्या है? मैं अपने लिए बहाने खोज लेता हूं और खा लेता हूं. ठीक उसी तरह लोगों को सही बात का ज्ञान तो है, लेकिन उसे व्यवहार में उतारना मुश्किल है. इसलिए सिर्फ शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है. हमें अभ्यास विकसित करना होगा.

धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व

उन्होंने कहा कि यहीं धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व सामने आता है. सभी धर्मों के अनुष्ठान उनके विश्वास को व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया सिखाते हैं. हमारी परंपरा में रामकृष्ण परमहंस एक उदाहरण हैं. उन्होंने अलग-अलग धर्मों का अभ्यास किया. उन्होंने भारतीय मूल के धर्मों के साथ-साथ इस्लाम और ईसाई धर्म का भी अभ्यास किया और उनके अंतिम अनुभव तक पहुंचे. इसके बाद उन्होंने कहा था कि जितने मत हैं, उतने ही रास्ते हैं, लेकिन सभी एक ही लक्ष्य तक पहुंचते हैं. यह सिर्फ सिद्धांत नहीं था, बल्कि उनका वास्तविक अनुभव था.

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अलग-अलग परंपराओं में आध्यात्मिक अनुभव की समानता

एक और व्यक्ति थे, जिनका नाम मैं जानता हूं, इसलिए उनका उदाहरण दे रहा हूं. वे प्रिंसटन विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के डीन थे. उन्होंने दुनिया की अलग-अलग परंपराओं में हुए आध्यात्मिक अनुभवों का अध्ययन किया. उन्होंने ग्रीक परंपराओं, इस्लामी परंपराओं, कैथोलिक परंपराओं और दुनिया की दूसरी परंपराओं में दर्ज ऐसे अनुभवों का अध्ययन किया और इस पर कई किताबें लिखीं. उनका निष्कर्ष था कि रास्ता चाहे कोई भी हो, अलग-अलग परंपराओं में आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने वाले लोगों के अनुभवों में आश्चर्यजनक समानता दिखाई देती है. इसलिए इन बातों को हमें समाज तक ले जाना होगा.

बौद्धिक समझ से आगे बढ़कर व्यवहार जरूरी

उन्होंने कहा कि लेकिन मैं समझता हूं कि किसी बात को बौद्धिक रूप से समझ लेना पर्याप्त नहीं है. मुझे अपनी आदत बदलनी होगी. और इसमें समय लगता है. आदत इतनी गहराई से बदलनी चाहिए और नई आदत इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वह हमें भौतिक सुख के आकर्षण, प्रभावशाली व्यक्ति या प्रभावशाली समूह बनने की इच्छा और श्रेष्ठता की भावना जैसी चीजों से बचा सके. यही चीजें समाज में परेशानियां पैदा करती हैं. हमें ऐसे समाज बनाने हैं जो इन आकर्षणों और दबावों के सामने भी अपने मूल्यों पर कायम रह सकें.

यह लंबी लड़ाई है, निराश नहीं होना है

इसमें लंबा समय लगेगा. इसलिए हमें निराश नहीं होना चाहिए. मैंने रीडर्स डाइजेस्ट में एक कहानी पढ़ी थी. उसका शीर्षक था - ‘सफलता और हार के बीच अंतर’. कहानी एक ऐसे व्यक्ति की थी जिसने अपना सब कुछ खो दिया था. उसकी नौकरी चली गई, उसकी पत्नी घर, कार और बाकी चीजें लेकर चली गई. उसके पास केवल करीब 150 डॉलर बचे थे. कोई उसे नौकरी देने को तैयार नहीं था, क्योंकि उसके बारे में खराब प्रचार हो चुका था.

उसने तय किया कि वह आत्महत्या कर लेगा. लेकिन मरने से पहले उसने सोचा कि इन 150 डॉलर को खर्च कर लेता हूं. वह लॉस वेगास गया. वहां उसे एक खनन क्षेत्र के बारे में पता चला. करीब एक मील लंबी और आधा मील चौड़ी जमीन को 150 फीट तक खोदा गया था. उम्मीद थी कि वहां कोई खनिज मिलेगा. कंपनियां वहां खुदाई कर चुकी थीं लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला. वे निराश हो गईं और जमीन की नीलामी का नोटिस दे दिया. इस व्यक्ति ने शाम का अखबार पढ़ा और उसे उस नीलामी के बारे में पता चला. उसने सोचा, मैं बिना जमीन के नहीं मरूंगा. मैं यह जमीन खरीदूंगा और फिर मर जाऊंगा. वह नीलामी में गया. वह जमीन खरीदने वाला अकेला व्यक्ति था, इसलिए उसे वह जमीन मिल गई.

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आखिरी कोशिश ने सब बदल दिया

नीलामी खत्म होने के बाद वहां काम करने वाले मजदूरों ने उससे पूछा कि अब आप मालिक हैं. क्या हम खुदाई जारी रखें या काम बंद कर दें? उसने कहा कि आपने शाम 5 बजे तक के लिए पैसे लिए हैं, इसलिए तीन फीट और खोद लो. उन्होंने तीन फीट और खुदाई की और वहां उन्हें सोना मिल गया. मुझे नहीं पता कि यह कहानी वास्तविक है या काल्पनिक. लेकिन इससे एक बात समझ में आती है - हमें सिर्फ तीन फीट और आगे काम करते रहना पड़ सकता है. काम कभी खत्म नहीं होता. उसे लगातार जारी रखना पड़ता है.

धार्मिक नेताओं की भूमिका लगातार बनी रहनी चाहिए

धार्मिक नेताओं को समय-समय पर यह ज्ञान समाज तक पहुंचाना होगा. 2018 से हम लगातार यह काम कर रहे हैं. कभी-कभी लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि हम सात बार बैठ चुके हैं, लेकिन कुछ नहीं हुआ. मैं उनसे कहता हूं - लगातार करते रहिए. अगर आपका उद्देश्य सही है, तो कुछ न कुछ जरूर होगा. हो सकता है कि पहले हमें खुद को भी सुधारना पड़े. लेकिन अगर हमारा उद्देश्य सही है, तो हमें आगे बढ़ते रहना होगा.

मानवता को विनाश की ओर जाने से रोकना है

आज हमें इस साझा संकल्प में एक और बात जोड़नी चाहिए. हम इस लक्ष्य को तब तक बिना थके आगे बढ़ाते रहेंगे, जितना समय लगेगा. हम इस काम को लगातार करते रहेंगे, ताकि मानव समाज फिर कभी बुराई के गड्ढे में न गिरे. ऐसा न हो कि लोग आपस में लड़ते रहें और अंततः अपने साथ इस धरती को भी नष्ट कर दें. हमारे पास इसके लिए एक रास्ता है. मैं बहुत खुश और आश्वस्त हूं कि ऐसा नहीं होगा.

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