राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS ने अपने 100 साल पूरे कर लिए हैं. 27 सितंबर 1925 को दशहरे के दिन बने इस संगठन के बारे में सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तमाम बातें, दावे और कहानियां सुनी और सुनाई जा रही हैं. अपनी पहली शाखा से दुनिया का सबसे बड़ा गैर-राजनीतिक संगठन बनने तक, 100 साल की संघ की यात्रा समकालीन भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा है. इस इतिहास को हमने छोटी-छोटी 100 कहानियों में समेटा है. यहां पढ़िए ऐसी ही कहानियां, जिन्हें लिखा है लेखक, गीतकार, स्तंभकार और पत्रकार विष्णु शर्मा ने.
RSS से प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी ध्यान दिया और 1949 में बाबूराम को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा. तब वहां केवल चार शाखाएं थीं. उस स्थिति में काम करना एक बड़ी चुनौती थी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उड़ीसा और बिहार में संघ के प्रसार की कहानी.
संघ के कुछ प्रचारक थे जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघचालक उनकी उपयोगिता और योग्यता के चलते उन्हें दूर भी नहीं भेजना चाहते थे. आज आप ऐसे चार स्वयंसेवकों/प्रचारकों की दिलचस्प कहानी जानेंगे. सभी सरसंघचालकों से जुड़ी निजी और दिलचस्प कहानियां जो आप अलग अलग किताबों, लेखों में पढ़ते हैं, वो ज्यादातर इन चारों की वजह से सामने आ पाईं. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
अप्पा जी जोशी के एक कहते ही सबने अपने सीने पर दाहिने हाथ को इस तरह से रखा कि केवल अंगूठा सीने पर लगा हो और हथेलियां जमीन की तरफ हों, दो, कहते ही सिर झुक गए और तीन कहते ही हाथ नीचे लाकर सामान्य स्थिति में आ गए. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है संघ के त्योहारों से जुड़ी कहानी.
ठाकुर राम सिंह सुबह 3 बजे उठकर 4 बजे शाखा के लिए निकल जाते थे. उनकी दिनचर्या भी अजीब थी. एक कार्यकर्ता के यहां जलपान तो दूसरे के यहां भोजन, ये उनकी आदत बन गई थी. यूं भी असम आसान प्रदेश नहीं था, राम सिंह की कोशिश रहती थी कि हर शाखा पर बराबर समय अंतराल के साथ प्रवास कर सकें. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है पूर्वोत्तर में संघ के पैर जमाने की कहानी.
म्यांमार में जन्मे भास्कर राव कलंबी वो शख्स थे जिन्हें केरल में संघ की शाखाओं के विस्तार का श्रेय जाता है. शुरूआत में उन्होंने केरल की निर्धन मछुआरों की बस्तियों में रात्रि शाखाएं लगाने से की. उनमें लगातार बढ़ती संख्या को देखकर कम्युनिस्ट परेशान होने लगे और फिर शाखाओं पर हमला होने लगा. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
बंगाल ने संघ को वैचारिक आधार दिया. कोलकाता में बालासाहब देवरस ने सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी से संपर्क साधा, जो 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हुए थे. उन्होंने मुखर्जी को आरएसएस शाखा में आमंत्रित किया और मुखर्जी ने अप्रैल 1940 में वहां का दौरा किया. यहीं से आरएसएस के साथ मुखर्जी के संबंध की शुरुआत हुई. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
देश के विभाजन के पूर्व अमृतसर में हिंसा हो रही थी. दंगाई सिखों को निशाना बना रहे थे. ऐसे नाजुक मौके पर स्वयंसेवकों ने पंजाब में गुरुद्वारों और सिखों की रक्षा की. इसके लिए दंगाइयों से कई जगहों पर उनका टकराव हुआ. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
स्वदेशी जागरण मंच की कामयाबी या नाकामयाबी को लेकर चर्चाएं हो सकती हैं, मत हो सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मंच अपने नाम में लगा शब्द ‘जागरण’ करने में पूरी तरह सफल रहा. स्वदेशी जागरण मंच ने भारत में स्वदेशीकरण की बड़ी मुहिम चला दी है. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
रज्जू भैया के पिताजी ने शास्त्री जी से कहा कि मेरा बड़ा पुत्र राजेंद्र विश्वविद्यालय में साइंस पढ़ाता है, वह आरएसएस का कार्यकर्ता है और नैनी जेल में है. रज्जू भैया ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, “शास्त्रीजी ने छूटते ही कहा, आप उसको समझाइए कुंवर साहब कि वह आरएसएस जैसी खतरनाक संस्था के साथ अपना संबंध न रखे.’ RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
गुरु गोलवलकर मानते थे कि चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है. उन्होंने भारत सरकार को हमेशा याद दिलाया कि चीन से सतर्क रहने की जरूरत है. लेकिन गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे उन्हों 'उन्मादी' कह दिया जाता था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
भारत के कुछ क्षेत्रों में उन दिनों शादी के बाद महिलाओं का नाम बदल दिया जाता था. इसी तरह की कहानी तापी के साथ हुई. उनका नाम तापी से सरस्वती कर दिया गया, वैसे ही जैसे कभी मनु का नाम लक्ष्मीबाई कर दिया गया था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है सरस्वती ताई की कहानी.
2002 का वह दिन था. पश्चिम एशिया के सात देशों के सात राजदूत दिल्ली में संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में केएस सुदर्शन के साथ वार्त्तालाप करने के लिए उपस्थित थे. सभी राजदूत संघ प्रमुख केएस सुदर्शन की बातें सुनने के लिए दो घंटे तक जमीन पर बैठे रहे. इस चर्चा में के एस सुदर्शन ने भारत की हजारों वर्षों की समावेशी परंपरा से मुस्लिम देशों के राजदूतों को अवगत कराया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
रज्जू भैया जो खुद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर का पद छोड़कर संघ के प्रचारक बने थे, ने एक ऐसा लेख लिखा जो इतने तथ्यों व तर्कों के साथ लिखा गया है कि ये एक दस्तावेज बन गया है. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी पत्र की कहानी.
प्रयागराज में एक मीटिंग हुई. इस मीटिंग में बालासाहब देवरस ने अयोध्या का जिक्र करते हुए कहा कि ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे. देवरस का ये बयान इस बात का संकेत था कि वे क्या चाहते हैं. यही वो सवाल था जिसने वीएचपी की ओर राम मंदिर आंदोलन की नींव रख दी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
तिलक सिंह परमार ने 4 वर्षों तक 'पांचजन्य' का संपादन किया. लेकिन उनका फोकस अध्यात्म और विरक्ति की ओर बढ़ने लगा. वे संपादक पद से त्यागपत्र देकर वे संन्यास की ओर प्रस्थान कर गए. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
डॉ हेडगेवार ने 1936 में 12वीं पास वसंतराव ओक को दिल्ली में काम करने के लिए भेजा. दिल्ली में उनके रहने की व्यवस्था हिन्दू महासभा भवन में की गई थी. यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का प्रचार किया. वसंतराव के परिश्रम से इस पूरे क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.
तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण की जांच के लिए न्यायमूर्ति वेणुगोपाल जांच आयोग का गठन किया गया. 1986 में आयोग ने जबरन धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून की सिफारिश की. तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन ने इस पर उस वक्त तो सहमति जताई, लेकिन उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया.
संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के कार्यकाल में भी तमाम बड़ी घटनाएं देश में हुईं, आपातकाल से लेकर राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी विध्वंस तक. और पहली बार संघ ने एक बड़ी भूमिका उनके नेतृत्व में निभाई, केन्द्र की सरकार बनाने में. इस दौरान संघ ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित करने के लिए अहम काम किया.
तमिलनाडु में संघ के विस्तार की जिम्मेदारी नागपुर के एक दुबले-पतले युवा दादाराव परमार्थ को दी गई थी. डॉ. हेडगेवार ने उन्हें खर्चे के लिए 20 रुपये दिए थे. वह समुद्र तट पर सोते थे, मंदिरों में भोजन करते थे, स्थानीय भाषा का ज्ञान न होने के बावजूद उन्होंने कई महीनों तक संघर्ष किया. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
संघ के एक कार्यकर्ता थे अप्पाजी जोशी. लोकमान्य तिलक से इनका खूब लगाव था.1906 में जब उन्हें पता चला कि तिलक जिस ट्रेन से जा रहे हैं, वो वर्धा स्टेशन से गुजरने वाली है, तो शिक्षक के मना करने के बावजूद वो तिलक को देखने स्टेशन चले गए थे,बाद में छड़ी से पिटाई भी खाई. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आज का देश भर में स्कूलों का बड़ा नेटवर्क है. एक समय था जब स्वतंत्रता के तुरंत बाद सरस्वती शिशु मंदिर खोलना संघ के कठिन कार्य था. 1952 में पहला सरस्वती शिशु मंदिर खोलने के लिए भाऊराव देवरस और भारत रत्न नानाजी देशमुख जैसे दिग्गजों को सहायता करनी पड़ी थी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है वही कहानी.