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संघ के 100 साल: ओडिशा-बिहार में RSS के खेवनहारों की कहानी

RSS से प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी ध्यान दिया और 1949 में बाबूराम को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा. तब वहां केवल चार शाखाएं थीं. उस स्थिति में काम करना एक बड़ी चुनौती थी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उड़ीसा और बिहार में संघ के प्रसार की कहानी.

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पूर्व में संघ के विस्तार की कहानी. (Photo: AI generated)
पूर्व में संघ के विस्तार की कहानी. (Photo: AI generated)

उड़ीसा में जनता पार्टी के नीलामणि ने कांग्रेस की लम्बी सरकार का क्रम 1977 में तोड़ दिया था. 2 साल 236 दिन की उनकी सरकार के बाद फिर कांग्रेस आ गई. 1990 में बीजू पटनायक जनता दल से 5 साल मुख्यमंत्री रहे लेकिन फिर कांग्रेस आ गई. सन 2000 से उनके बेटे नवीन पटनायक ऐसे गद्दी पर बैठे कि फिर अगले 24 साल कोई उन्हें हिला नहीं पाया. ऐसे में मोहन चरण मांझी अगर मुख्यमंत्री बने तो ये बीजेपी के लिए क्रांति सरीखा था, ऐसे ही बिहार में भले ही बीजेपी सत्ता पक्ष में अरसे से हो लेकिन अपना मुख्यमंत्री बनाने में आज तक कामयाब नहीं है. इससे साफ पता चलता है कि ये दोनों ही राज्य भगवा परिवार के लिए हमेशा ही दुष्कर रहे हैं. 

दत्तोपंत ठेंगड़ी को संघ का रास्ता दिखाने वाले ने उड़ीसा में खड़ा किया संघ

उड़ीसा 1936 में एक अलग प्रांत बना तो आरएसएस इस नवगठित प्रांत में प्रवेश करना चाह रहा था लेकिन पश्चिम, उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत में अपनी गतिविधियों के विस्तार के कारण, उड़ीसा में पूर्ण रूप से कार्य शुरू करने के लिए पर्याप्त प्रचारक नहीं थे. इसलिए, इस स्तर पर यह उड़ीसा को संगठनात्मक दृष्टिकोण से एक अलग प्रांत के रूप में नहीं मान सकता था. हालांकि, 1940 के दशक के दौरान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और बिहार में कार्यरत प्रचारकों ने उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों में संघ का कार्य शुरू किया, जो उनकी राज्य सीमाओं से सटे हुए थे. अनंतलाल श्रीवास्तव ने पश्चिमी उड़ीसा के संबलपुर में और पूर्णानंद स्वामी ने दक्षिणी उड़ीसा के गंजाम में एक शाखा स्थापित की. बी एस मुजे के भतीजे मुकुंद राव मूंजे मध्य प्रदेश के बिलासपुर से कटक में एक शाखा शुरू करने आए. 

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महात्मा गांधी की हत्या और उसके बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगने से इन प्रारंभिक संगठनात्मक गतिविधियों को गहरा झटका लगा. देश भर में आरएसएस कार्यकर्ताओं की बडेक पैमाने पर गिरफ्तारी ने उड़ीसा में उसके समर्थकों के बीच भय और दहशत पैदा कर दी. यहां तक कि कुछ सक्रिय समर्थकों ने भी इस संगठन से अपने संबंध तोड़ लिए. 1949 में प्रतिबंध हटने के तुरंत बाद, आरएसएस ने उड़ीसा को एक अलग प्रांत घोषित कर दिया, जो अब तक उनके सांगठनिक स्तर पर नहीं था और गुरु गोलवलकर ने बाबूराव पलाधिकर को प्रथम प्रांत प्रचारक नियुक्त किया. 

जब पलाधिकर उड़ीसा पहुंचे, तब राज्य में आरएसएस की उपस्थिति न के बराबर थी, केवल चार शाखाएं ही थीं. वे उड़ीसा के राजनीतिक और वाणिज्यिक केंद्र कटक पहुंचे और इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाया. उन्होंने जौनलियापति मारवाड़ी बासा (विश्रामगृह) में एक कमरे का मकान किराए पर लिया. मुकुंद राव मुजे ने उन्हें कुछ गैर-उड़िया व्यापारियों से मिलवाया जो आरएसएस के समर्थक थे. पलाधिकर ने माणिक घोष बाजार के मारवाड़ी क्लब के मैदान में सुबह की शाखा शुरू की.

उनका जन्म 21 जनवरी, 1921 में ग्राम बेढ़ोना (वर्धा, महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिताजी और चाचा जी भी स्वयंसेवक थे, अतः वे बालपन में ही डा. हेडगेवार के सम्पर्क में आ गये. दत्तोपंत ठेंगड़ी आर्वी में उनके सहपाठी थे और ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ही ठेंगड़ी जी को स्वयंसेवक बनाया था. मेधावी छात्र होने के साथ ही उनकी साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में भरपूर रुचि थी.

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1940 में बाबूराव ने तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूरा किया. उसी वर्ष नागपुर से बीए कर वे प्रचारक बने और उन्हें फिरोजपुर (पंजाब) में जिला प्रचारक बनाकर भेजा गया, बाबूराव को मराठी, संस्कृत तथा अंग्रेजी आती थीं; पर एक वर्ष में ही उन्होंने हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी भी सीख ली. 1944 में वे विभाग प्रचारक तथा 1947 में सहप्रांत प्रचारक बने. विभाजन के समय हिन्दुओं की रक्षा तथा उन्हें बचाकर लाने में बाबूराव की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही. इधर 1948 में गांधी हत्या के आरोप में संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अचानक से कांग्रेस के नेताओं ने अपने अपने इलाकों में लोगों को भड़काकर संघ के लोगों पर हमला बोलना शुरू कर दिया. सावरकर के छोटे भाई की तो मॉब लिचिंग में जान ही चली गई थी. इस दौरान बाबूराव के पिताजी को भी गांव में संघ विरोधियों ने खम्भे से बांध कर जलाना चाहा. वे तेल छिड़क चुके थे; पर तभी पुलिस के आने से वे बच गये.

संघ से प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी ध्यान दिया और 1949 में बाबूराम को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा गया. उड़ीसा में तब केवल चार शाखाएं थीं. उस स्थिति में काम करना एक बड़ी चुनौती थी. उड़ीसा में आज भी घोर निर्धनता है. समुद्र तटीय क्षेत्र में तूफान, चक्रवात आदि से प्रायः विनाश होता रहता है. ऐसे में बाबूराव ने वहां काम खड़ा किया और धीरे-धीरे उड़ीसा में 200 शाखा हो गयीं. वे कार्यकर्ताओं को सदा ‘संघमय उड़ीसा’ बनाने का संकल्प दिलाते रहते थे. कटक के पास महानदी की सहायक नदी काठजोड़ी बहती है. निराशा के क्षणों में बाबूराव उसके तट पर जा बैठते थे. अपना घर, परिवार, शहर और करियर सब छोड़कर देश सेवा में लगना आसान तो नहीं होता. कई बार इन प्रचारकों का मन भी विचलित होता होगा. लेकिन बिना थके बिना रुके बहने वाली वो नदी उन का हौसला बढ़ाती थी. शारीरिक विषयों में दंड तथा घोष में शंख के वे लम्बे समय तक शिक्षक रहे. उनके प्रयास से कटक के बैरिस्टर नीलकंठ दास ने एक बार नागपुर के विजयादशमी उत्सव में अध्यक्षता की. इसके बाद वे संघ कार्य में बड़े सहायक हुए. 

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पालधिकर ने एक नए क्षेत्र में आरएसएस के संचालन की सामान्य शैली अपनाई, स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों (विशिष्ट व्यक्ति) के माध्यम से अपने प्रभाव क्षेत्र को स्थापित और विस्तारित करने की. अपनी रणनीति के अनुसार, वे सबसे पहले नीलकंठ दास से मिले, जो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक व्यक्ति थे और दो दशकों से अधिक (1924-45) तक केंद्रीय विधान सभा के सदस्य रहे थे. नीलकंठ शुरू में संशय में थे, लेकिन पालधिकर उन्हें आरएसएस के मिशन के बारे में समझाने में सफल रहे, उनकी दूसरी मुलाकात गोदावरिस मिश्रा से हुई, जो एक प्रख्यात शिक्षाविद और उड़ीसा के पूर्व मंत्री थे. पालधिकर ने पाया कि उनके मन में आरएसएस के प्रति सहानुभूति थी. गोदावरिस ने उन्हें प्रमुख उड़िया शिक्षाविदों और वकीलों की एक सूची प्रदान की. तदनुसार, पालधिकर ने जदुमणि मंगराज, लक्ष्मीनारायण साहू और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों से संपर्क किया और पाया कि वे आरएसएस के प्रति काफी अनुकूल थे. इनमें से किसी भी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को दोषी नहीं ठहराया.

नीलकंठ ने नवजात संगठन को कुछ ठोस सहायता प्रदान की. उन्होंने आरएसएस को कटक के बांका बाज़ार स्थित अपने नवभारत प्रेस परिसर में शाखाएं आयोजित करने की अनुमति दी. इस सहयोग के फलस्वरूप, आरएसएस ने नीलकंठ को अक्टूबर 1950 में नागपुर में आयोजित अपने प्रतिष्ठित विजया दशमी उत्सव की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया. यह आरएसएस के लिए दो कारणों से महत्वपूर्ण था: पहला, प्रतिबंध हटने के तुरंत बाद, एक प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता की उसके प्रमुख वार्षिक समारोह में भागीदारी से गांधीजी की हत्या में कथित संलिप्तता का कलंक कुछ हद तक मिट जाएगा; और दूसरा, एक प्रमुख उड़िया नेता के साथ घनिष्ठ संबंध से आरएसएस को राज्य में उनके सामाजिक-राजनीतिक संपर्कों का लाभ उठाने में मदद मिलेगी, जहाँ वह अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रहा था। नीलकंठ ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया, और स्वयं गोलवलकर ने नागपुर रेलवे स्टेशन पर अपने अतिथि का स्वागत किया.

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1943 में, नीलकंठ उत्कल प्रांतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने उड़ीसा में संपूर्ण स्वराज पार्टी को हिंदू महासभा में शामिल करने का असफल प्रयास किया. 1944 में, जहाँ कांग्रेस ने राजगोपालाचारी के हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रस्ताव का समर्थन किया, वहीं उड़ीसा में उल्लेखनीय अपवादों में नीलकंठ दास और लक्ष्मीनारायण साहू शामिल थे.

एक अन्य प्रतिष्ठित उड़िया विद्वान प्राण कृष्ण परिजा, जो एक प्रख्यात वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे, ने भी नागपुर में विजया दशमी समारोह की अध्यक्षता की. परिजा और गुरु गोलवलकर दोनों बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र थे. परिजा ने उड़िया बौद्धिक हलकों में आरएसएस का परिचय कराया. गुरू गोलवलकर की उड़ीसा यात्रा के दौरान, उन्होंने अपने आवास पर एक बैठक का आयोजन किया, जिसमें प्रमुख उड़िया बुद्धिजीवियों ने आरएसएस प्रमुख से बातचीत की. इस समारोह की अध्यक्षता करने वाले तीसरे उड़िया नेता दीनबंधु साहू थे, जो एक प्रमुख कांग्रेसी नेता थे.

ओडिया के प्रतिष्ठित व्यक्तियों और मारवाड़ी व्यापारियों के साथ अपने संपर्कों के अलावा, पलाधिकर ने व्यापक भ्रमण किया और नई शाखाएं स्थापित कीं. कटक मुख्यालय में कमान संभालते हुए, उन्होंने रणनीतिक रूप से कुशल गैर-ओडिया, मुख्य रूप से महाराष्ट्रीयन प्रचारकों की एक सेना तैनात की: बालासोर में सदानंद पंतवाने, पुरी में वसंत राव बापट, कटक में वसंत राव अगरकर, बरहमपुर में प्रचारक शास्त्री, बोलंगीर में श्रीधर आचार्य, राउरकेला में नारायण मंडल, संबलपुर में चिंतामणि कवठेकर और सुंदरगढ़ में बाबूराव देशपांडे। इन समर्पित प्रचारकों ने स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ संवाद किया, शाखाएँ स्थापित कीं और अपनी नवीन पद्धतियों से युवा लड़कों की भर्ती की.

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1980 में उन्हें पूर्वी क्षेत्र का प्रचारक बनाया गया. इससे उनका कार्य़ क्षेत्र उड़ीसा के साथ ही बंगाल, असम, सिक्किम तथा अंडमान तक बढ़ गया. बढ़ती उम्र के साथ साथ उनके रोग भी बढ़ते गए जिनके कारण 1992 में उन्हें दायित्व से विश्राम दे दिया गया और वे कटक कार्यालय पर ही रहने लगे. 2003 में उनका देहांत हो गया. 

बिहार के बबुआ थे जन्मजात संघचालक

बबुआ जी से डॉ. हेडगेवार का परिचय हिन्दू महासभा के भागलपुर अधिवेशन में हुआ था. वहां डॉ हेडगेवार ने उन्हें पुणे और नागपुर के संघ शिक्षा वर्गों को देखने के लिये आमंत्रित किया. बबुआ जी मुम्बई होते हुए डॉ. हेडगेवार जी के साथ नागपुर आये. रेलवे स्टेशन पर डॉ. हेडगेवार का स्वागत करने के लिये नागपुर वर्ग के सर्वाधिकारी गुरु गोलवलकर माला लेकर उपस्थित थे. डॉ. हेडगेवार ने हंसते हुए कहा कि माला मुझे नहीं इन्हें पहनाइये. इस पर गुरु गोलवलकर ने बबुआ जी का माला पहनाकर अभिनन्दन किया. ऐसे विरले ही लोग होंगे जो 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन के दौरान भी जेल गए हों और 50 साल बाद जब राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू हुआ, तब भी जेल गए. बबुआ जी ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने संघ के पाँच सरसंघचालकों के साथ काम किया.  

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बबुआ जी का सम्पर्क सामाजिक क्षेत्र की सैकड़ों महान हस्तियों से था. पटना स्थित उनके घर पर अनेक ऐसे लोग पधारे थे. उन्होंने आँगन में एक शिलापट पर ऐसे महान् लोगों के नाम लिखे थे, जिनके आने से वह घर पवित्र हुआ. संघ की स्थापना के बाद डॉ. हेडगेवार जब बिहार गये, तो वहाँ उनका सम्पर्क बबुआ जी से हुआ. डॉ. हेडगेवार की पीठ में बहुत दर्द रहता था. इसीलिये वे राजगीर (राजगृह) गये थे. वहाँ के गर्म झरने में बैठने से इस रोग में आराम मिलता है. उस समय डॉ. जी की सब प्रकार की चिन्ता और व्यवस्था बबुआ जी ने ही की थी. डॉ. जी की दृष्टि बहुत पारखी थी. वे समझ गये कि बबुआ जी संघ कार्य के लिये बहुत उपयोगी होंगे. डॉ. जी ने उन्हें सर्वप्रथम गया नगर का संघचालक नियुक्त किया. इस प्रकार 24 वर्ष की युवावस्था में वे संघ से जुड़े और फिर जीवन भर काम करते रहे.

बबुआ जी का असली नाम कृष्णवल्लभ प्रसाद नारायण सिंह बहुत कम लोगों को पता था, सब उन्हें बबुआ जी ही कहते आए थे. उनका जन्म 16 सितम्बर, 1914 को नालन्दा जिले के रामी बिगहा ग्राम में रायबहादुर ऐदल सिंह जी के घर में हुआ था. बाल्यकाल में परिवार के सभी सदस्यों के नालंदा से गया आ जाने के कारण उनका अधिकांश समय गया में ही बीता. 

अत्यधिक सम्पन्न परिवार के होने के बाद भी बबुआ जी सदा स्वयं को सामान्य स्वयंसेवक ही समझते थे. जब भी कोई संकट का समय आया, उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपने सीने पर झेला. वीर सावरकर के कहने पर वे वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय भागलपुर जेल में बन्द रहे. सन् 1948 और 1977 में संघ पर प्रतिबन्ध के समय तथा सन् 1992 में श्री रामजन्मभूमि आन्दोलन के समय भी वे जेल गये. जीवन की चौथी अवस्था में भी उन्होंने जेल का भोजन किया और सबके साथ जमीन पर ही सोये. 

इस दौरान वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत को भी बिहार में कई सालों तक काम करने का मौका मिला था. वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत 1994 से 99 तक बिहार के क्षेत्र प्रचारक रहते झारखंड एवं बिहार के सुदूर इलाकों का सरकारी बसों के साथ-साथ स्वयंसेवकों की मोटरसाइकिल पर बैठकर प्रवास करते थे.
 
बबुआ जी को आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार जी ने संघचालक नियुक्त किया था. इस वजह से उन्हें ‘जन्मजात संघचालक’ कहा जाता है.. नगर संघचालक से लेकर क्षेत्र संघचालक और अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य तक के दायित्व उन्होंने निभाये. जब शरीर थकने लगा, तो उन्होंने संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से निवेदन किया कि अब उन्हें दायित्व से मुक्त किया जाये, वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह भी कुछ समय रहना चाहते हैं. उनकी इच्छा का सम्मान किया गया. 18 दिसम्बर, 2007 को 93 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ. 

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