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बाढ़ से जूझ रहा नेपाल, फिर रेस्क्यू में चीन और US की मदद से क्यों इनकार?

नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 1000 से ज्यादा लोग लापता हैं. नेपाल सरकार ने चीन और अमेरिका सहित कई देशों की रेस्क्यू में मदद लेने से इनकार कर दिया है. दरअसल 2015 के भूकंप से सीख लेकर नेपाल ने विदेशी टीमों को सीधे राहत कार्यों में शामिल होने से मना कर दिया है. हालांकि नेपाल भारत से मदद स्वीकार कर रहा है.

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नेपाल 2015 के अनुभव के बाद रेस्क्यू में किसी की मदद नहीं चाहता. (Photo- AP/PTI)
नेपाल 2015 के अनुभव के बाद रेस्क्यू में किसी की मदद नहीं चाहता. (Photo- AP/PTI)

नेपाल में आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. तीन दिन में दो बार आई आपदा से देश का निजाम तितर-बितर हो गया है. आपदा में अब तक करीब 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं. 

बाढ़ के बाद लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, लेकिन नेपाल सरकार ने चीन और अमेरिका समेत कई देशों से मदद लेने से साफ इनकार कर दिया. नेपाल सरकार का कहना है कि उसकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां राहत और बचाव कार्य चलाने में पूरी तरह सक्षम हैं.

बता दें कि चीन और अमेरिका समेत कई देशों ने नेपाल को हेलीकॉप्टर और प्रशिक्षित खोज-बचाव टीमों की पेशकश की थी. लेकिन नेपाल ने मदद को स्वीकार नहीं किया. इसकी सबसे बड़ी वजह 2015 में आए भूकंप का अनुभव है.

2015 के कड़वे अनुभवों से लिया सबक

नेपाल के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो 2015 में भूकंप के बाद दुनिया भर से आए अंतरराष्ट्रीय दस्तों, सैन्य विमानों और राहत संगठनों की वजह से काठमांडू एयरपोर्ट और प्रशासनिक तंत्र पर बहुत दबाव बढ़ गया था. विदेशी टीमों के बीच आपस में तालमेल की कमी और प्रतिस्पर्धा की वजह से संकट कम होने की बजाय और बढ़ गया था.

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इसलिए, इस बार नेपाल कई स्वतंत्र विदेशी टीमों को संभालने के बजाय अपनी ही सुरक्षा एजेंसियों की कमान के तहत काम करना चाहता है.

भारत से मदद स्वीकार कर रहा नेपाल

हालांकि, नेपाल सरकार ने ये भी कहा है कि वो राहत सामग्री, मेडिकल सप्लाई और वित्तीय योगदान स्वीकार कर रही है. भारतीय विदेश मंत्रालय की मानें को नेपाल ने भारत से रेस्क्यू को लिए मदद मांगी है. ऐसे में भारत एक टनल रेस्क्यू टीम भेजने की तैयारी कर रहा है. जिसके लिए पहले एक टोही टीम भेजी जा रही है ताकि जमीनी हालात और इक्विपमेंट की जरूरत का अंदाजा लगाया जा सके. इसके साथ ही एक मेडिकल टीम भी भेजी जा रही है और नेपाल में एक बेली ब्रिज पहले से ही है और डिप्लॉयमेंट के लिए तैयार है.

भारत सरकार ने 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत वायु सेना के C-130J और C-17 ग्लोबमास्टर विमानों के जरिए 47.5 टन राहत सामग्री भेजी है. इसमें अस्थायी टेंट, कंबल, दवाएं, सोलर लैंप और फूड पैकेट शामिल हैं. भारत ने टूटे हुए पुलों की जगह वैली और प्रीफैब्रिकेटेड पुल देने की भी पेशकश की है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, 'नेपाल की ओर से जिस भी सहायता का अनुरोध किया जा रहा है, भारत उसी के मुताबिक तुरंत कदम उठा रहा है.'

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सहायता के लिए 'वन-डोर सिस्टम' लागू

नेपाल ने राहत सहायता को पारदर्शी और सुव्यवस्थित बनाने के लिए 'एकल द्वार प्रणाली' लागू की है. सभी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से वित्तीय सहायता सिर्फ 'प्रधानमंत्री राहत कोष' के जरिए ही देने की अपील की गई है, ताकि संसाधनों का सही और समान वितरण हो सके.

विदेशी नागरिकों के लिए स्पेशल हेल्पडेस्क

नेपाल के पर्यटन विभाग के मुताबिक, 34 देशों के करीब 700 पर्यटक बाढ़ के बाद से संपर्क से बाहर हैं. इनमें कैलाश मानसरोवर और गोसाईंकुंड की यात्रा पर गए करीब 300 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं. 

यह भी पढ़ें: नेपाल में बाढ़, पलामू में बेचैनी... हाइड्रो पावर प्लांट में काम करने गए महेंद्र की आवाज सुनने को तरस रहा परिवार

विदेशी नागरिकों की जानकारी जुटाने और राहत पहुंचाने के लिए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक विशेष 'इमर्जेंसी रिस्पॉन्स टीम' बनाई है. रसुवा के तिमुरे में एक उप-सचिव स्तर के अधिकारी को तैनात किया गया है जो सीधे सुरक्षा बलों से ग्राउंड रिपोर्ट लेकर काठमांडू स्थित मुख्य समन्वय केंद्र को भेज रहे हैं.

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