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देशभक्ति भी, पर्यावरण भी, सहारनपुर में गोबर से बन रहे ₹10 के तिरंगा बैज और तुलसी वाली राखियां

सहारनपुर की मां शाकंभरी कान्हा गौशाला में गोबर से तिरंगा चेस्ट बैज और राखियां तैयार की जा रही हैं. 15 अगस्त और रक्षाबंधन के लिए इस बार 5 हजार बैज और राखियां बनाने का लक्ष्य है. 10 रुपये के ये उत्पाद ऑनलाइन और ऑफलाइन बेचे जा रहे हैं. राखियों में तुलसी के बीज डाले गए हैं, जबकि बैज इस्तेमाल के बाद खाद बन सकते हैं.

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गोबर के इस्तेमाल से स्वदेशी और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा. (Photo: ITG)
गोबर के इस्तेमाल से स्वदेशी और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा. (Photo: ITG)

सहारनपुर नगर निगम द्वारा संचालित मां शाकंभरी कान्हा गौशाला में गोवंश संरक्षण के साथ गोबर के उपयोग को लेकर कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में गौशाला में गाय के शुद्ध गोबर से 15 अगस्त के लिए तिरंगा चेस्ट बैज और रक्षाबंधन के लिए राखियां तैयार की जा रही हैं. इन उत्पादों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेचा जा रहा है और बाजार में इनकी अच्छी मांग देखने को मिल रही है.

नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. संदीप कुमार मिश्रा के मुताबिक, मां शाकंभरी कान्हा गौशाला में इस समय 547 गोवंश संरक्षित हैं. गौशाला में गोबर से बनाए जा रहे उत्पादों के नवाचार को कई सम्मान और रिकॉर्ड भी मिले हैं. इसी क्रम में इस बार 15 अगस्त और रक्षाबंधन को देखते हुए 5 हजार तिरंगा चेस्ट बैज और राखियां तैयार की जा रही हैं.

10 रुपये का तिरंगा चेस्ट बैज

गौशाला में तैयार किए जा रहे तिरंगा चेस्ट बैज की कीमत सिर्फ 10 रुपये रखी गई है. अधिकारियों के मुताबिक, इसे पूरी तरह गाय के शुद्ध गोबर से तैयार किया जा रहा है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह बायोडिग्रेडेबल है. डॉ. संदीप कुमार मिश्रा ने बताया कि वर्ष 2024 में इसका पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था. उस समय 1 हजार तिरंगा चेस्ट बैज तैयार किए गए थे. लोगों से अच्छा रिस्पांस मिलने के बाद पिछले साल 3 हजार बैज बनाए गए. इस बार इनकी संख्या बढ़ाकर 5 हजार की जा रही है.

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अधिकारी के मुताबिक, प्लास्टिक से बने चेस्ट बैज इस्तेमाल के बाद अक्सर इधर-उधर फेंक दिए जाते हैं. इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा तिरंगे से जुड़े बैज के गलत तरीके से फेंके जाने पर राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं.

इसके मुकाबले गोबर से बनाए गए चेस्ट बैज बायोडिग्रेडेबल हैं. इस्तेमाल के बाद इन्हें घर के गमले में डाला जा सकता है. वहां यह खाद का काम करेंगे. इस तरह एक ही उत्पाद के जरिए देशभक्ति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने की कोशिश की जा रही है.

तिरंगे के रंग में तैयार हो रही राखियां

इस बार गौशाला में रक्षाबंधन के लिए भी एक खास प्रयोग किया गया है. यहां तैयार की जा रही राखियों को तिरंगे का स्वरूप दिया गया है. अलग-अलग डिजाइन के साथ बच्चों के लिए कार्टून वाली राखियां भी तैयार की जा रही हैं. इन राखियों की कीमत भी 10 रुपये रखी गई है. इन्हें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से खरीदा जा सकता है. राखियों की खास बात यह है कि इनके अंदर तुलसी का बीज डाला गया है.

राखी का इस्तेमाल करने के बाद इसे गमले या मिट्टी में लगाया जा सकता है. इसके बाद इसमें तुलसी का पौधा उगाया जा सकता है. इस तरह राखी सिर्फ रक्षाबंधन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इस्तेमाल के बाद पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देगी.

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गोबर से उत्पाद बनाने को मिले सम्मान

नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. संदीप कुमार मिश्रा ने बताया कि मां शाकंभरी कान्हा गौशाला को गोबर से उत्पाद बनाने और नवाचार के लिए कई सम्मान और प्रमाण पत्र मिल चुके हैं. उनके मुताबिक, गौशाला को वर्ल्ड रिकॉर्ड सम्मान मिला है. इसे भारत की पहली ऐसी गौशाला बताया गया है जिसे GMT प्रमाण पत्र मिला है.

इसके अलावा गौशाला को ISO सर्टिफिकेशन और इंडिया बुक का रिकॉर्ड IVR अचीवर अवार्ड भी मिला है. अधिकारी के मुताबिक, ये सम्मान गौशाला में किए जा रहे नवाचार और गोबर से बनाए जा रहे उत्पादों के लिए मिले हैं.

गोबर के इस्तेमाल से पर्यावरण संरक्षण का संदेश

गौशाला में किए जा रहे इन प्रयोगों का उद्देश्य गोबर का उपयोग कर ऐसे उत्पाद तैयार करना है जो पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प बन सकें. तिरंगा चेस्ट बैज के मामले में प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर गोबर से बने बैज तैयार किए जा रहे हैं. वहीं राखियों में तुलसी के बीज डालकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है. राखी इस्तेमाल होने के बाद मिट्टी में पहुंचकर तुलसी के पौधे का रूप ले सकती है.

डॉ. संदीप कुमार मिश्रा के अनुसार, तुलसी के पौधे का विशेष महत्व माना जाता है. इसलिए राखी में तुलसी का बीज डालने का प्रयोग पर्यावरण के लिहाज से भी उपयोगी पहल है. गौशाला में फिलहाल 15 अगस्त और रक्षाबंधन को ध्यान में रखते हुए 5 हजार तिरंगा चेस्ट बैज और राखियां तैयार की जा रही हैं. इनकी कीमत 10 रुपये रखी गई है और इन्हें ऑनलाइन तथा ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेचा जा रहा है.

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देशभक्ति के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

इस पहल में देशभक्ति, गोवंश से जुड़े संसाधनों के उपयोग और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है. तिरंगा बैज के जरिए 15 अगस्त का संदेश दिया जा रहा है, जबकि तिरंगे के स्वरूप वाली राखियों में तुलसी के बीज डालकर रक्षाबंधन के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी जोड़ा गया है.
 

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