यूपी के आगरा में 65 साल की शीला देवी की जिंदगी और मौत से जुड़ी कहानी ने हर किसी को हैरान कर दिया था. जिस बुजुर्ग महिला को मृत मानकर परिवार अंतिम संस्कार की तैयारी कर चुका था, परिवार के मुताबिक करीब 17 घंटे बाद उनके शरीर में हलचल महसूस हुई और उन्हें जीवित पाया गया. लेकिन जिंदगी और मौत से करीब नौ दिन तक जंग लड़ने के बाद रविवार को शीला देवी की मौत हो गई.
शीला देवी आगरा के ट्रांस यमुना कॉलोनी के श्रीनगर क्षेत्र में अपने बेटे सुनील माहौर के साथ रहती थीं. वह सांस की बीमारी से पीड़ित थीं और उनका इलाज बरेली के एक निजी मेडिकल कॉलेज में चल रहा था. 30 जुलाई को इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इसके बाद परिवार शीला देवी के शव को आगरा ले आया और अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू कर दी गईं.
परिवार के मुताबिक, अंतिम संस्कार के लिए कपड़े और फूल-मालाएं तक मंगवा ली गई थीं. इसी दौरान शीला देवी के दामाद ने उनके पैर छुए. परिवार का दावा है कि पैर छूते ही उन्हें शरीर में हलचल महसूस हुई. इसके बाद शीला देवी ने कथित तौर पर बातचीत भी की और पूछा कि सभी लोग क्यों रो रहे हैं और उन्हें कहां ले जा रहे हैं.
बुजुर्ग महिला को जीवित पाकर परिवार में हड़कंप मच गया. आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया. इसके बाद शीला देवी का इलाज आगरा के घटिया आजम खां स्थित पार्क हॉस्पिटल में चल रहा था. परिवार को उम्मीद थी कि वह जिंदगी की जंग जीतकर वापस घर लौटेंगी, लेकिन रविवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.
शीला देवी के दूसरे बेटे संजीव बदायूं के एक निजी अस्पताल में कार्यरत बताए जाते हैं. अब मां की मौत के बाद संजीव ने पार्क हॉस्पिटल के इलाज और व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
संजीव का आरोप है कि अस्पताल में मरीजों को अस्पताल की खुद की कंपनी और लोकल ब्रांड की दवाइयां दी जाती हैं. उनका आरोप है कि नर्सिंग स्टाफ मरीजों की ठीक से देखभाल नहीं करता था. परिवार का यह भी दावा है कि इलाज के दौरान अस्पताल की ओर से करीब पांच लाख रुपये का बिल थमाया गया.
मां की मौत के बाद अब बेटे ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है. संजीव का कहना है कि वह पूरे मामले की शिकायत जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री से करेंगे और इलाज से जुड़े दस्तावेजों की जांच की मांग करेंगे.
हालांकि, अस्पताल पर लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और पार्क हॉस्पिटल प्रशासन का पक्ष सामने आना बाकी है. ऐसे में अब जांच के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि शीला देवी के इलाज में किसी तरह की लापरवाही हुई थी या नहीं.
जिस परिवार ने नौ दिन पहले शीला देवी को मृत मानकर अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी थी, उसी परिवार को उनके जीवित होने से नई उम्मीद मिली थी. लेकिन नौ दिन बाद वही उम्मीद फिर मातम में बदल गई. अब शीला देवी की मौत के बाद बेटे के आरोपों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली और इलाज के खर्च को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.