Gen अल्फा या Generation Alpha एक पीढ़ी को परिभाषित करती है. यह पीढ़ी Gen Z के बाद आई है. इसके बाद आने वाली पीढ़ी को कई शोध संस्थान अलग-अलग नामों से परिभाषित करते हैं. Gen Alpha शब्द का इस्तेमाल पहली बार ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक शोधकर्ता मार्क मैकक्रिंडल ने किया था.
Gen अल्फा के जन्म के सालों को लेकर अभी तक कोई आम सहमति नहीं बनी है. मैकक्रिंडल रिसर्च 2010-2024 का समय बताती है और कुछ न्यूज आउटलेट भी इसी का हवाला देते हैं, जबकि दूसरे लोग छोटी रेंज का इस्तेमाल करते हैं, जैसे 2011-2021 या 2013-2021. हालांकि, दूसरे स्रोतों ने Gen अल्फा के लिए कोई रेंज तो नहीं बताई है, लेकिन उन्होंने Gen Z के खत्म होने का साल 2012 या 2013 बताया है. इसका मतलब है कि यह जनरेशन 2013 या 2014 में शुरू होगी और मैक्रिंडल की रेंज के बजाय Gen अल्फा के लिए बाद की तारीखों का सुझाव देती है.
उदाहरण के लिए, मनोवैज्ञानिक जीन ट्वेंज जनरेशन अल्फा को उन लोगों को परिभाषित करती हैं जिनका जन्म 2013 से 2029 के बीच हुआ है. एनी ई. केसी फाउंडेशन जनरेशन अल्फा को उन लोगों के तौर पर परिभाषित करता है जिनका जन्म 2013 से 2025 के बीच हुआ है.
कैम्ब्रिज डिक्शनरी, जिसने 2025 में 'जेन अल्फा' को अपने शब्दकोश में शामिल किया, इस समूह को आम तौर पर 2010 और 2020 के दशक में पैदा हुए लोगों के तौर पर परिभाषित करती है.
Gen Alpha के बच्चों का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक आम जीवन का हिस्सा बन चुके थे. इस पीढ़ी के कई बच्चे कम उम्र से ही मोबाइल, टैबलेट, स्मार्ट टीवी और इंटरनेट से परिचित होते हैं. ऑनलाइन वीडियो, गेमिंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल एजुकेशन इनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं.
इस पीढ़ी की स्कूली शिक्षा में भी तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है. ऑनलाइन क्लास, डिजिटल नोट्स, एजुकेशन ऐप और वर्चुअल लर्निंग प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है. वर्ष 2020 में शुरू हुई कोविड-19 महामारी के दौरान कई देशों में बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से हुई. इसका प्रभाव Gen Alpha की शिक्षा के अनुभव पर भी पड़ा.
इस पीढ़ी का बचपन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट डिवाइस और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग के दौर में बीत रहा है. AI आधारित टूल, वॉयस असिस्टेंट और डिजिटल सेवाएं उनके आसपास के तकनीकी माहौल का हिस्सा हैं.
जनसंख्या विशेषज्ञों और सामाजिक शोधकर्ताओं के अनुसार, Gen Alpha की जीवनशैली, शिक्षा और कामकाज पर भविष्य में तकनीकी बदलावों का प्रभाव देखा जा सकता है. इस पीढ़ी के सबसे बड़े सदस्य अभी युवा अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं और आने वाले वर्षों में उनकी सामाजिक और आर्थिक भूमिका अधिक स्पष्ट होगी.
महोबा जिले के रैपुरा कलां गांव के स्कूली बच्चों ने खराब सड़क और जलभराव के कारण झांसी-मिर्जापुर हाईवे पर तीन घंटे तक जाम लगाया. बच्चों का आरोप है कि मिल संचालकों की दबंगई और अधिकारियों की अनदेखी के कारण उनकी समस्याएं बढ़ गई हैं.
स्कूल की घंटी बजनी थी. बच्चे क्लास में बैठने वाले थे. किताबें खुलनी थीं. लेकिन उन्नाव में आज स्कूल के अंदर पढ़ाई नहीं, स्कूल के बाहर प्रदर्शन हो रहा था. जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के सैकड़ों बच्चे अचानक स्कूल कैंपस से बाहर निकले और मोहान-अजगैन के मुख्य चौराहे पर जाकर बैठ गए. हाथों में तख्तियां थीं, नारे लग रहे थे और बच्चे अपनी शिकायतें बता रहे थे.
देश के अलग-अलग कोनों से आ रही ये तस्वीरें बता रही हैं कि कैसे जेन अल्फा ने अपनी जिद के आगे सिस्टम को घुटनों पर ला दिया है. एकाएक ये नया ट्रेंड बनता जा रहा है. आइए जानते हैं बीते दिनों हुए जेन अल्फा के कौन से प्रदर्शन रहे जिनसे पुलिस प्रशासन से लेकर नेताओं और मंत्रियों तक के पसीने छूट गए.
जंतर-मंतर और झारखंड में हुए प्रदर्शन को लेकर विवाद अभी तक थमा नहीं था कि अब लखनऊ में Gen Alfa का विवाद सामने आ गया है. शिक्षकों की कमी से नाराज सैकड़ों स्कूली छात्रों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया. यह पहली बार नहीं है जब छात्र प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरें. तीन दिन पहले भी इस तरह के प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आई थी.
भारत के विभिन्न राज्यों में जेन-अल्फा पीढ़ी के बच्चे शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर सड़कों पर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में छात्र-छात्राएं खराब हॉस्टल भोजन, शिक्षक कमी, स्कूल सुविधाओं की कमी और बस किराया बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दिल्ली से बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे आगामी चुनावों में इस सरकार को सत्ता से बाहर करें.
किराया बढ़ने से परेशान ग्रामीण छात्राओं की आवाज आखिरकार रंग लाई. विदिशा जिले के सिरोंज में हुए आंदोलन के बाद बस संचालकों ने बढ़ा हुआ किराया घटा दिया है, जिससे स्कूल आने-जाने वाली छात्राओं और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिली है. प्रशासन की सख्ती और छात्राओं के दबाव ने इस पूरे मामले को पलट दिया.
जेन अल्फा के प्रदर्शन की खबरें इन दिनों देश भर से आ रही हैं. लेटेस्ट सूचना लखनऊ से आई है. यहां सुबह-सुबह स्कूली पोशाक में सड़क पर बैठे बच्चों के प्रदर्शन से पूरे बुद्धेश्वर चौराहे पर हड़कंप मच गया. देखते ही देखते गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं और यातायात पूरी तरह ध्वस्त हो गया.
सिरोंज में कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल की छात्राओं ने बस किराया बढ़ाए जाने के खिलाफ बस स्टैंड पर करीब आधे घंटे तक जोरदार नारेबाजी की. छात्राओं ने स्थानीय विधायक से किराया कम करने की मांग की और स्कूल आने-जाने में हो रही परेशानी को उजागर किया. यह प्रदर्शन यात्रियों और बस चालकों के लिए भी चौंकाने वाला था.
11 अगस्त को हमीरपुर में बच्चों ने सड़क निर्माण की मांग को लेकर धरना दिया, खटीमा में खराब खाने और गंदगी के खिलाफ छात्रों ने विरोध जताया, जबकि बांसवाड़ा में शिक्षकों की कमी पर तालाबंदी की गई. इन प्रदर्शनों पर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके का रिएक्शन सामने आया है. उन्होंने बच्चों की हिम्मत को सलाम किया है.
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर, उत्तराखंड के खटीमा और राजस्थान के बांसवाड़ा में बच्चों ने अपनी समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद की. कहीं सड़क के लिए तिरंगा यात्रा निकली, कहीं स्कूल की बदहाल व्यवस्था के खिलाफ धरना हुआ और कहीं शिक्षकों की कमी पर तालाबंदी की गई. तीनों जगह बच्चों के विरोध के बाद प्रशासन को मौके पर पहुंचकर समाधान की पहल करनी पड़ी.
हमीरपुर के चंदूपुर गांव में स्कूली बच्चों ने सड़क की मांग को लेकर 5 किमी लंबी तिरंगा यात्रा निकाली. कलेक्ट्रेट पहुंचकर धरना दिया, प्रशासन ने 1.81 करोड़ से सड़क निर्माण शुरू कराने का भरोसा दिया.