भारत में पहली बार किसी ग्लेशियल झील पर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है. केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान CBRI रुड़की के वैज्ञानिकों ने यह काम बेहद कठिन परिस्थितियों में पूरा किया.
ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फबारी, तेज हवाएं और प्रतिकूल मौसम के बावजूद उन्होंने इतिहास रच दिया. इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ग्लेशियल झील से अचानक पानी निकलने या बाढ़ आने जैसी आपदा की चेतावनी लगभग दो घंटे पहले मिल सकेगी. इतने समय में निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया जा सकता है. जानमाल का नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है.
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वैज्ञानिकों ने जिस उपकरण की लागत करीब आठ करोड़ रुपये आंकी गई थी उसे महज 61 लाख रुपये में विकसित कर स्थापित कर दिया. यह उपलब्धि सिर्फ चमोली के वसुंधरा झील तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि देश की अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के लिए भी मॉडल बन सकती है.
खतरनाक ग्लेशियल झीलें और आपदा का खतरा
CBRI से जुड़े आर प्रदीप कुमार ने बताया कि देश में 13 ग्लेशियल झीलों को खतरनाक घोषित किया जा चुका है. इन झीलों में अचानक जलस्तर बढ़ने हिमस्खलन भूस्खलन या प्राकृतिक अवरोध टूटने से विनाशकारी बाढ़ आने का खतरा हमेशा बना रहता है. हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं निचले इलाकों में रहने वाले लोगों सड़कों पुलों जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं.
इसी खतरे को कम करने के उद्देश्य से पहली बार स्वदेशी तकनीक पर आधारित GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है. इसका मुख्य मकसद ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरों की समय रहते पहचान करना गुणवत्तापूर्ण डेटा जुटाना और आपदा से पहले चेतावनी देकर जान बचाना है.
सिस्टम में कुल आठ सेंसर लगाए गए हैं जो झील के जलस्तर और आसपास के क्षेत्र में होने वाली भूगर्भीय तथा प्राकृतिक गतिविधियों पर लगातार नजर रखेंगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे संभावित खतरे की करीब दो घंटे पहले चेतावनी मिलने की उम्मीद है.
पंद्रह दिन का अभियान और नौ सदस्यों का साहस
CBRI के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो ने बताया कि यह अभियान पंद्रह दिन का था. इसमें भूविज्ञान भू-तकनीकी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग मैकेनिकल इंजीनियरिंग और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग सहित कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे. टीम के सभी सदस्यों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में काम किया.
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अत्यधिक ऊंचाई और कम तापमान वाले क्षेत्र में उपकरण लगाना आसान नहीं था फिर भी वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने सीमित समय में मिशन पूरा करने का संकल्प लिया. डॉ. कानूनगो ने अभियान में शामिल सदस्यों को CBRI के वॉरियर्स बताया और कहा कि सभी ने मुश्किल घड़ी में अद्भुत साहस और समर्पण दिखाया.
आईटीबीपी ने ऊंचाई वाले क्षेत्र में जाने से पहले टीम को छह दिन तक एक्लेमेटाइजेशन यानी ऊंचाई और कम ऑक्सीजन वाले माहौल के अनुकूल होने की सलाह दी थी लेकिन समय की कमी के कारण वैज्ञानिकों ने सिर्फ तीन दिन में ही यह प्रक्रिया पूरी कर ली. आईटीबीपी ने अभियान से पहले चार दिन तक क्षेत्र की रेकी की और फिर पांच तारीख को टीम को आगे ले गया.
दुर्गम रास्ते और मौसम की चुनौतियां
पांच तारीख की सुबह टीम ने ट्रेकिंग शुरू की. वैज्ञानिकों और अन्य सदस्यों को करीब सात से आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. दुर्गम रास्ते और ऊंचाई के कारण यात्रा काफी मुश्किल रही. वसुंधरा ताल तक पहुंचने में करीब दो घंटे लगे. पूरे अभियान में आईटीबीपी का बड़ा सहयोग रहा.
जवानों ने रास्ते की जानकारी सुरक्षा संबंधी मदद दी और कठिन परिस्थितियों में टीम का मनोबल भी बढ़ाया. अभियान के दौरान मौसम लगातार चुनौती बना रहा. ऊंचाई वाले क्षेत्र में तेज हवाएं चल रही थीं और बर्फबारी के कारण काम और कठिन हो गया था.
खराब मौसम की वजह से वैज्ञानिकों को उपकरण स्थापित करने के लिए बहुत कम समय मिला. इसके बावजूद टीम ने मनोबल बनाए रखा और उपलब्ध सीमित समय का अधिकतम उपयोग किया. छह तारीख को निर्धारित स्थल पर पहुंचने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उपकरणों की स्थापना के लिए गड्ढे खोदने और मजबूत आधार तैयार करने की थी.
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कम तापमान में इंजीनियरिंग की चुनौती
डॉ. कानूनगो के अनुसार अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए करीब पांच से छह मीटर ऊंचा टावर खड़ा करना था. अत्यधिक कम तापमान के कारण सामान्य तरीके से कंक्रीट का ढांचा बनाना संभव नहीं था. इसलिए वैज्ञानिकों ने परिस्थितियों के हिसाब से विशेष फाउंडेशन तैयार किया ताकि टावर और उस पर लगे उपकरण सुरक्षित और स्थिर रह सकें. सिस्टम को बिजली देने के लिए सोलर पैनल भी लगाए गए.
बर्फबारी और स्थल की स्थिति को देखते हुए सोलर पैनल को वर्टिकल यानी खड़ी स्थिति में स्थापित करना पड़ा. यह वैज्ञानिकों के लिए बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी क्योंकि उपकरणों को न सिर्फ अत्यधिक ठंड और तेज हवाओं का सामना करना था बल्कि लगातार डेटा भी उपलब्ध कराना था.
आठ सेंसरों में झील के जलस्तर की निगरानी के लिए सबमर्सिबल वाटर लेवल सेंसर और फ्लोटिंग वाटर सेंसर शामिल हैं. झील के कैचमेंट क्षेत्र में चार एक्सेलेरोमीटर लगाए गए हैं जो असामान्य हलचल भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी गतिविधियों को रिकॉर्ड करेंगे. इन आंकड़ों से संभावित खतरे का आकलन कर समय रहते चेतावनी जारी की जा सकेगी.
ढाई दिन में पूरा हुआ स्थापना कार्य
प्रतिकूल मौसम अत्यधिक ऊंचाई सीमित संसाधनों और कम समय के बावजूद नौ सदस्यीय टीम ने उपकरणों की स्थापना का काम महज ढाई दिन में पूरा कर दिया. इस दौरान टावर का फाउंडेशन तैयार करने पांच से छह मीटर ऊंचा ढांचा खड़ा करने सोलर पैनल लगाने जलस्तर मापने वाले सेंसर स्थापित करने और कैचमेंट क्षेत्र में एक्सेलेरोमीटर लगाने जैसे महत्वपूर्ण काम किए गए.
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डॉ. कानूनगो ने पूरी टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह उपलब्धि विभिन्न वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग क्षेत्रों के विशेषज्ञों के समन्वय मेहनत और साहस का परिणाम है. तेज हवाओं और अत्यधिक ऊंचाई के बावजूद सिस्टम से डेटा मिलना भी शुरू हो गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार इससे ग्लेशियल झील की स्थिति और आसपास होने वाली गतिविधियों की निगरानी की जा सकेगी तथा भविष्य में संभावित आपदा के संकेत मिलने पर संबंधित एजेंसियों को समय रहते सतर्क किया जा सकेगा.
हिमालयी राज्यों के लिए बड़ी उम्मीद
ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ हिमालयी क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती है. CBRI रुड़की की ओर से विकसित यह स्वदेशी अर्ली वार्निंग सिस्टम आपदा प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है. सबसे खास बात यह है कि जिस तकनीक की लागत करीब आठ करोड़ रुपये बताई गई थी उसे सिर्फ 61 लाख रुपये में तैयार कर स्थापित कर दिया गया. इससे भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर भी अपेक्षाकृत कम लागत में निगरानी और चेतावनी प्रणाली विकसित करने की संभावनाएं बढ़ गई हैं.