महाराष्ट्र की राजनीति से शरद पवार को लेकर कई तरह की खबरें आ रही हैं. एक खबर तो शरद पवार की पार्टी NCP(SP) के कांग्रेस में विलय से जुड़ी है. दूसरी खबर है, ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे के बाद अब शरद पवार की पार्टी का नंबर है - और तीसरी खबर है, मुमकिन है बची हुई राजनीतिक पूंजी की हिफाजत के लिए शरद पवार अपना राजनीतिक स्टैंड बदल लें.
विधानसभा चुनावों के नतीजों का सबसे बुरा असर ममता बनर्जी की राजनीति पर हुआ है. ममता बनर्जी की ही तरह उद्धव ठाकरे भी शिकार हुए हैं. और, एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और शरद पवार की पार्टी पर भी शिकार का संकट मंडराने लगा है - और, ऐन उसी वक्त कांग्रेस हद से ज्यादा फायदे में देखी जा रही है.
कांग्रेस के लिए तो सबसे बड़ा फायदा केरल में सरकार बनाने का मौका मिल जाना है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सत्ता हासिल करने जैसा ही केरल में कांग्रेस की सरकार बन जाना भी है. 2024 के आम चुनाव के बाद केरल की जीत कांग्रेस की सबसे बड़ी उपलब्धि है. कांग्रेस को फायदा यह भी हुआ है कि राहुल गांधी को चुनौती देने वाली ममता बनर्जी कमजोर हो गई हैं - और, कांग्रेस के लिए यह उपलब्धि भी कोई कम नहीं है कि शरद पवार और ममता बनर्जी की पार्टियों के कांग्रेस में विलय की चर्चा हो रही है.
शरद पवार महाराष्ट्र के दिग्गज नेता तो हैं ही, राजनीति का बहुत लंबा अनुभव भी रखते हैं. उनकी पार्टी टूट चुकी है, नया खतरा भी मंडरा रहा है, लेकिन वो बैठे बैठे नजारा देख रहे हैं. अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. जैसे क्रिकेट में बॉलर गुगली फेंकते हैं, शरद पवार भी वैसे ही बगैर ट्रिगर छुए डबल बैरल की बंदूक चला रहे हैं. यह तो साफ है कि शरद पवार को अपनी बची हुई पार्टी बचानी है, ऐसे में वो कोई सुरक्षित रास्ता ही अख्तियार करेंगे - लेकिन, वो सुरक्षित रास्ता कांग्रेस में विलय तो कतई नहीं लगता.
एनसीपी फिर टूटेगी, कांग्रेस के साथ जाएगी या...
संसद के मॉनसून सत्र से पहले एक बात पर जोरदार चर्चा है कि ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे के बाद अगला नंबर किसका है? असल में, केंद्र की बीजेपी सरकार महिला आरक्षण संशोधन विधेयक और परिसीमन बिल फिर से लाने की तैयारी कर रही है. संसद के पिछले सत्र में, सदन की विशेष बैठक में और विधानसभा चुनावों के दौरान, ये बिल सदन में पेश किए गए थे लेकिन दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गए. टीएमसी के 20 सांसदों के अलग हो जाने, और एनडीए के समर्थन की घोषणा के बाद दोनों बिल फिर से पेश किए जाने की संभावना भी बढ़ गई है. अगर कुछ बाकी है तो नंबर का खेल पूरा करना. अगर जरूरी संख्या में सांसद सरकार के सपोर्ट में वोट नहीं करने को तैयार होते, तो सदन से गैरहाजिर होकर भी वही काम कर सकते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले भी कांग्रेस और एनसीपी (एसपी) के विलय की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं. लेकिन फिर चुनाव कैंपेन पर असर न पड़े, यह सोचकर मामला होल्ड पर डाल दिया गया. वैसे विलय की संभावनाएं तो शरद पवार और अजित पवार वाले दोनों गुटों के बीच भी तलाशी गई थीं - और, जैसा कि माना जाता है अगर अजित पवार एयर क्रैश के शिकार नहीं हुए होते तो ऐसा हो भी चुका होता.
अब सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि दिल्ली में शरद पवार वाली NCP के कांग्रेस के साथ विलय पर चर्चा सकारात्मक है, और आगे बढ़ते हुए अंतिम चरण में पहुंच गई है. अव्वल तो विलय को लेकर राहुल गांधी की भी मंजूरी मिल जाने के दावे किए जा रहे हैं.
कई मीडिया रिपोर्ट में विलय के प्रसंग में महाराष्ट्र कांग्रेस के सीनियर नेता विजय वडेट्टीवार का नाम भी लिया जा रहा है. विजय वडेट्टीवार का कहना है कि विलय को लेकर हाईकमान के साथ बातचीत चल रही है. उनका कहना है कि जो लोग कांग्रेस और शरद पवार के धर्मनिरपेक्ष आदर्शों में विश्वास रखते हैं, उनका हमारी पार्टी में हमेशा स्वागत है.
एनसीपी+एनडीए, इसका कितना चांस है...
ऐसे भी दावे किए गए हैं कि शरद पवार के उन विधायकों और सांसदों को हरी झंडी दे दी गई है, जो कांग्रेस में शामिल होने के ख्वाहिशमंद हैं. शरद पवार के सामने एक बड़ी उलझन भी बताई जा रही है. एनसीपी-एसपी का एक धड़ा एनडीए में शामिल होने का पक्षधर बताया जा रहा है. ऐसे नेताओं का मानना है कि सत्ता पक्ष के साथ होना ही फायदेमंद हो सकता है - हालांकि, NCP (SP) सांसद सुप्रिया सुले ने ऐसी बातों को पूरी तरह खारिज किया है.
एक टीवी चैनल से बातचीत में सुप्रिया सुले का कहना था, पिछले 25 साल से कांग्रेस हमारा मित्र पक्ष रहा है, लेकिन अभी तक न ही कांग्रेस की तरफ से, और न ही हमारी तरफ से विलय का कोई प्रस्ताव है.
शरद पवार के पास क्या विकल्प हैं
संभव है हर तरफ फीडबैक लेने के मकसद से ही सूत्रों के जरिए ऐसी खबरें लीक कराई जा रही हों. हाल फिलहाल, पहले तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में विलय की खबरें आईं. फिर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस दोनों ही तरफ से ऐसी खबरों का खंडन कर दिया गया था.
उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ने वाले सांसदों ने भी कांग्रेस का ही नाम लिया था. उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 6 सांसदों ने पार्टी के कांग्रेस में विलय की आशंका जताते हुए एकनाथ शिंदे की शिवसेना का दामन थाम लिया. अपने कदम को सही ठहराने के लिए सांसदों का दावा था कि उनको मालूम हुआ है कि उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकते हैं, और वे शिवसेना को बचाने के इरादे से भी फैसला किया है.
अब अगर शरद पवार के सांसद भी उद्धव ठाकरे के सांसदों जैसी सोच रखते हैं, तो वे भी वैसा ही फैसला ले सकते हैं. शरद पवार के सांसदों के सामने पहला विकल्प तो अजित पवार वाली एनसीपी ही है. ध्यान रहे, महाराष्ट्र की डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार ने एनसीपी के दोनों पक्षों के विलय का नामंजूर कर दिया था - लेकिन क्या अब सुनेत्रा पवार भी एकनाथ शिंदे की राह पर चलना पसंद करेंगी?
एक रिपोर्ट में बताया गया है कि सांसदों के पाला बदलने की संभावनाओं को लेकर सुनेत्रा परिवार और उनके सलाहकार फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं. पवार परिवार में रिश्ते पहले से ही खराब हैं, अगर कुछ ऐसा वैसा हुआ तो कड़वाहट और भी बढ़ेगी. माना जा रहा है कि शिवसेना की तरह सांसदों की तोड़फोड़ और दलबदल से वो बचना चाहेंगी.
सूत्रों के हवाले से खबर यह भी आ रही है कि शरद पवार एनसीपी को एक और टूट से बचाने के लिए नई रणनीति भी अपना सकते हैं. ऐसे सूत्रों के हवाले से आई खबरों में दावा किया गया है कि सांसदों की संभावित टूट को रोकने के लिए शरद पवार बीच का रास्ता निकालते हुए तटस्थ पॉलिटिकल लाइन भी अपना सकते हैं. मसलन, मुद्दों पर आधारित समर्थन.
जैसे देश के मुख्य न्यायाधीश को विपक्षी दलों को भेजी गई चिट्ठी में डीएमके और आम आदमी पार्टी ने भी हस्ताक्षर किए हैं. लेकिन, वे इंडिया ब्लॉक से खुद को अलग कर चुके हैं. बीते दौर में नवीन पटनायक और जगनमोहन रेड्डी को बगैर किसी गठबंधन में शामिल हुए राजनीति करते देखा गया है, शरद पवार के पास भी वैसे विकल्प मौजूद हैं.
माना जा रहा है कि शरद पवार मॉनसून सत्र में संसद में लाए जाने वाले महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के पक्ष में वोट करने जैसा फैसला ले सकते हैं. यह शरद पवार के लिए डबल बेनिफिट स्कीम हो सकती है. ऐसा हुआ तो महिला आरक्षण जैसे मुद्दे को समर्थन देने का श्रेय तो मिलेगा ही, सांसदों को पाला बदलने से तात्कालिक तौर पर तो बचा ही लेंगे - और ऐसी राजनीति में शरद पवार को महारत हासिल है.
शरद पवार और ममता बनर्जी एक ही नाव पर सवार तो नहीं कहे जाएंगे, लेकिन आस पास ही हैं - ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि शरद पवार अगर कोई कदम बढ़ाते हैं, तो ममता बनर्जी का क्या स्टैंड होगा?