यह दास्तान 1960 के दशक की है, जब एक साधारण सा दिखने वाला ‘कामेल अमीन थाबेत’ नामक कारोबारी सीरिया की सत्ता के गलियारों में इतना रसूख बना लेता है कि उसे देश का उप-रक्षा मंत्री बनाने पर विचार होने लगता है. वह कोई और नहीं, बल्कि इजरायली जासूस एली कोहेन थे. कोहेन ने सीरियाई सेना की चौकियों की जानकारी देने के लिए वहां नीलगिरी के पेड़ लगवाए थे, ताकि इजरायली वायुसेना को पता रहे कि बम कहां गिराने हैं. कोहेन को अंततः फांसी दे दी गई, लेकिन उन्होंने इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए एक ऐसी विरासत छोड़ी, जिसने साबित किया कि दुश्मन के बेडरूम तक पहुंचना ही असली जीत है.
आज, दशकों बाद ईरान की धरती पर जो हो रहा है, वह एली कोहेन की उसी रणनीति का आधुनिक और घातक विस्तार है. ईरान आज यह समझ ही नहीं पा रहा है कि उसके अपने शासन तंत्र के भीतर कितने 'एली कोहेन' छिपे बैठे हैं. मोसाद ने केवल तकनीक से नहीं, बल्कि ईरान के अंदर मौजूद असंतुष्टों और 'स्लीपर सेल्स' के जरिए एक ऐसा जाल बुना है, जिसने ईरान के सुरक्षा कवच को पूरी तरह तार-तार कर दिया है.
इस्माइल हानियेह की हत्या: वह सबक जो ईरान ने नहीं सीखा
जुलाई 2024 में तेहरान के एक अति-सुरक्षित गेस्ट हाउस में हमास नेता इस्माइल हानियेह की हत्या ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था. यह हमला कोई मिसाइल दागकर नहीं किया गया था, बल्कि उस कमरे में महीनों पहले लगाए गए एक IED के जरिए किया गया था.
यह ईरान के लिए सबसे बड़ी चेतावनी थी. इससे यह साफ हो गया था कि मोसाद केवल बाहर से हमला नहीं कर रहा, बल्कि वह ईरान के उन सुरक्षा घेरों के भीतर पहले से मौजूद है जिन्हें अभेद्य माना जाता था. लेकिन ईरान ने इस घटना से कोई ठोस सबक नहीं लिया. वहां की सुरक्षा एजेंसियां बाहरी खतरों को ढूंढती रहीं, जबकि खतरा उनके 'अंदर' पनप रहा था. मोसाद ने यह साबित कर दिया कि वह जब चाहे, जिसे चाहे और जहां चाहे निशाना बना सकता है, चाहे वह तेहरान का सबसे सुरक्षित कोना ही क्यों न हो.
...और युद्ध के पहले ही घंटे में खो दिया खामेनेई और शीर्ष कमान को
हालिया संघर्ष की शुरुआत में जो कुछ हुआ, वह सैन्य इतिहास में 'खुफिया नाकामी' (intelligence failure) का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरेगा. युद्ध शुरू होने के पहले ही घंटे में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके शीर्ष सैन्य सलाहकारों को निशाना बनाया जाना यह बताता है कि इजरायल के पास न केवल उनकी सटीक लोकेशन थी, बल्कि उनके पल-पल की आवाजाही का डेटा भी था.
मोसाद ने 'सिगइंट' (Signals Intelligence) और 'ह्यूमिंट' (Human Intelligence) का ऐसा कॉम्बिनेशन तैयार किया था कि जैसे ही खामेनेई ने अपने सुरक्षित बंकर की ओर कदम बढ़ाया, उनके पहुंचने से पहले ही मौत वहां पहुंच चुकी थी. यह केवल एक हमला नहीं था, बल्कि ईरान के पूरे 'कमांड एंड कंट्रोल' सिस्टम को पंगु बनाने की एक सोची-समझी चाल थी. जब सिर ही काट दिया जाए, तो शरीर (सेना) का लड़ना असंभव हो जाता है. अब ये दिलासा देने वाली ही बात है कि खामेनेई शहादत देना चाहते थे. क्योंकि, हमले में उनके परिवार की महिलाएं और बच्चे भी मारे गए.
अली लारीजानी का अंत: सबके सामने आने की वो भूल...
ईरान के सुरक्षा प्रमुख और कद्दावर नेता अली लारीजानी की कहानी भी कुछ ऐसी ही रही. 13 मार्च को कुद्स दिवस के मौके पर लोगों के बीच सड़क पर चहलकदमी करते देखे गए. लोग उनके साथ सेल्फी ले रहे थे. युद्ध के दौरान अपनी जनता में कॉन्फिडेंस जगाने के लिए लीडरशिप ऐसा करती रही हैं. लेकिन, जब इजरायल से मुकाबला हो, तो इसे भूल ही कहा जाएगा. कहा जा रहा है कि उसी दिन से लारिजानी को ट्रैक किया जाने लगा और मार गिराया गया. मोसाद ने यहां भी अपनी तकनीकी श्रेष्ठता साबित की.
आधुनिक तकनीक के इस दौर में, किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन, उसकी कार के जीपीएस, या यहां तक कि उसके आसपास मौजूद सुरक्षाकर्मियों के कम्युनिकेशन डिवाइस को हैक करना इजरायल के लिए बेहद आसान है. लारीजानी को लगा होगा कि वह भारी सुरक्षा के बीच हैं, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि उनकी अपनी सुरक्षा व्यवस्था ही उनके लिए 'ट्रैकिंग डिवाइस' बन गई थी. यह मोसाद की उस क्षमता को दर्शाता है जहां वे टारगेट की पहचान (Identification), ट्रैकिंग (Tracking) और खात्मे (Neutralization) के बीच के समय को न्यूनतम कर देते हैं.
इजरायल के सामने कितना बेमेल है ईरान का खुफिया तंत्र
ईरान का खुफिया तंत्र कितना मजबूत है, वो एक भारतीय बाइकर के ताजा अनुभवों वाले व्लॉग से समझा जा सकता है. युद्ध शुरू होने से ठीक पहले कश्मीर के रहने वाले उमर ने ईरान में कुवैत से प्रवेश किया. और बाइक चलाते हुए पूरे ईरान को क्रॉस करके अफगानिस्तान आए. यूट्यूब पर अपलोड हुए ज्यादातर वीडियो में उमर बाइक चलाते हुए ही दिख रहे हैं. बीच बीच में उन्होंने इतना ही अपडेट किया, कि कुछ लोगों ने आकर उन्हें वीडियो बनाने से रोक दिया है. ईरान के खुर्रमाबाद शहर का नजारा कैमरे में रिकार्ड करने के लिए जब उमर एक पहाड़ी के टॉप पर चढ़े तो वहां कोई नहीं था. लेकिन, जैसे उन्होंने कैमरा निकाला, दो लोग आ गए. उनसे उनकी आईडी मांगी और फिर वही कहानी. वीडियो बनाने से रोक दिया गया. यानी, उस दौरान हर संदिग्ध के पीछे IRGC की इंटेलिजेंस यूनिट काम कर रही थी. विदेशी होने के नाते उमर को ट्रैक करना आसान था.लेकिन, उन लोगों का क्या जो ईरान के होते हुए ’विदेशी’ हो गए. इजरायली एसेट बन गए.
उमर की रोक-टोक देखकर ये भी लगा कि शायद ईरानी इंटेलिजेंस सिर्फ पुलिसिंग तक ही सीमित रही है. अपने ही लोगों पर अंकुश रखने के लिए. काफी हद तक डिफेंसिव. उसमें दुश्मन की काट ढूंढने और उससे आगे निकलने की सलाहियत दिखाई नहीं दी. उमर के व्लॉग में दिखता है कि ईरानी अधिकारी उसे कैमरा बंद करने के लिए तो कह रहे हैं, लेकिन वे उस 'डिजिटल फुटप्रिंट' को रोकने में सक्षम नहीं हैं, जो कि आधुनिक डिवाइस छोड़ते हैं. उमर ने पब्लिक में वीडियो नहीं बनाए, लेकिन वे अपना कैमरा और ड्रोन लेकर ईरान में फिरते रहे. लेबनान में पेजर धमाकों ने साबित किया था, कि इजरायल के लिए कैमरा, ड्रोन और मोबाइल फोन केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि सटीक 'ट्रैकिंग डिवाइस' हैं. इजरायल दुश्मन के संचार तंत्र में न केवल सेंध लगा सकता है, बल्कि उसे घातक हथियार में भी बदल सकता है.
ईरान का खुफिया नेटवर्क, खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), मुख्य रूप से मानवीय खुफिया जानकारी (Human Intelligence) पर निर्भर है. उनके पास पूरे मध्य पूर्व में फैला हुआ मुखबिरों का एक जाल है. लेकिन यह जाल पुराना और जंग लगा हुआ है. ईरान को लगता है कि उसकी ताकत उसकी मिसाइलें हैं, लेकिन वह यह भूल गया कि मिसाइल चलाने वाला हाथ अगर बिका हुआ हो, तो हथियार बेकार है.
इजरायल के एलीट इंटेलिजेंस स्क्वॉड और सटीक हमले
इजरायल के पास ‘यूनिट 8200’ जैसी संस्थाएं हैं जो दुनिया में साइबर जासूसी में सबसे आगे हैं. वे ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों के कंप्यूटरों से लेकर उनके सैन्य जनरलों के बेडरूम तक की आवाजें सुन सकते हैं. युद्ध के मैदान में एक और बड़ा अंतर 'प्रिसिजन' (सटीकता) का है. इजरायल के पास ऐसी तकनीक है कि वह तेहरान की किसी बिल्डिंग की चौथी मंजिल के दूसरे कमरे में बैठे व्यक्ति को निशाना बना सकता है, बिना पूरी बिल्डिंग को नुकसान पहुंचाए. यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' की पराकाष्ठा है. इसके विपरीत, ईरान की क्षमता केवल 'सैचुरेशन अटैक' तक सीमित है. वह सैकड़ों की संख्या में मिसाइलें और ड्रोन दाग सकता है, लेकिन वे 'रैंडम' होते हैं. उनमें से ज्यादातर को इजरायल का 'आयरन डोम' या 'एरो' सिस्टम हवा में ही नष्ट कर देता है. ईरान के पास 'पिन-पॉइंट एक्यूरेसी' की कमी है. वह शोर तो बहुत मचा सकता है, लेकिन घाव गहरा नहीं दे पाता.
ईरान क्यों खो रहा है अपने नेता?
ईरान के शीर्ष नेताओं के आसानी से मारे जाने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
गद्दारी: ईरान का सुरक्षा तंत्र भ्रष्टाचार और असंतोष से भरा हुआ है. मोसाद ने सफलतापूर्वक उन लोगों को अपने पाले में कर लिया है जो सत्ता के करीब हैं.
तकनीकी पिछड़ापन: जब इजरायल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्वांटम कंप्यूटिंग के जरिए जासूसी कर रहा है, तब ईरान अभी भी पुराने रेडियो और वायरटैपिंग के दौर में फंसा है.
ओवर-कॉन्फिडेंस: ईरान को लगा कि उसका 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (हमास, हिजबुल्लाह, हूतियों का गठबंधन) उसे बचा लेगा, जबकि इजरायल का उद्देश्य है कि सीधे 'सांप के सिर' पर वार करो.
क्या ईरान संभल पाएगा?
आज की स्थिति यह है कि ईरान का पूरा खुफिया ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह चुका है. जब तक ईरान अपने भीतर मौजूद 'अली कोहेन' जैसे चेहरों को नहीं पहचानता और अपनी तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाता, तब तक उसके नेताओं का मारा जाना जारी रहेगा. इजरायल ने यह दिखा दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि दिमाग और डेटा के जरिए लड़े जाते हैं. ईरान के लिए यह समय केवल मिसाइलें बनाने का नहीं, बल्कि यह सोचने का है कि उसके अपने ही लोग उसकी पीठ में छुरा क्यों घोंप रहे हैं?