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सीजेपी, दिपके... Its Done Bro? इस बार प्रोटेस्ट में वाइब क्यों नहीं थी

प्रकाश राज ने 'सिंघम' वाला डायलॉग तो सुनाया, लेकिन CJP को घमंड और कॉन्फिडेंस का फर्क शायद नहीं समझाया. 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर 2.0 के बड़े-बड़े दावों की मानो जमीन पर हवा निकल गई. नेता हिरासत में, समर्थक दिशाहीन और पुलिस मुस्तैद. आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछली बार शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने वाली CJP इस बार अपना दम नहीं दिखा पाई?

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सीजेपी समर्थकों को पुलिस ने किसी भी तरह जंतर-मंतर पर नहीं पहुंचने दिया (फोटो- पीटीआई)
सीजेपी समर्थकों को पुलिस ने किसी भी तरह जंतर-मंतर पर नहीं पहुंचने दिया (फोटो- पीटीआई)

प्रकाश राज ने अभिजीत दिपके के साथ 'चीटिंग' कर दी. एक्टर ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुखिया को अपनी फिल्म ‘सिंघम’ का ‘आली रे आली...’ वाला डायलॉग तो सुना दिया, लेकिन ‘वॉन्टेड’ का वो डायलॉग भूल गए, जो शायद इस वक्त सबसे ज्यादा काम आता.

‘Arrogance... घमंड... I like it! इसको थोड़ा कम कर, बहुत ऊपर जाएगा... वरना सीधा ऊपर जाएगा.’

अब प्रकाश राज ने ये डायलॉग क्यों नहीं सुनाया, ये तो वही बता सकते हैं. लेकिन CJP के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को देखकर लगता है कि शायद दिपके और उनके साथियों ने ओवरकॉन्फिडेंस में दिल्ली पुलिस की तैयारी की कल्पना नहीं थी.

क्योंकि जो दिल्ली पुलिस पिछली बार एयरपोर्ट पर उन्हें जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट की परमिशन देने पहुंची थी, इस बार वो उनको पकड़ने प्लेन में ही घुस गई.

सोशल मीडिया पर जंतर-मंतर प्रोटेस्ट 2.0 को पहले से ज्यादा ग्रैंड बनाने के दावे किए गए. माहौल ऐसा बना कि जैसे इस बार प्रदर्शन पहले वाले से बड़ा और ज्यादा असरदार होने वाला है. लेकिन सोशल मीडिया पर बने माहौल और जमीन पर दिखने वाली ताकत के बीच का फर्क प्रदर्शन के दिन सामने आ गया. इसबार जंतर-मंतर तक सीजेपी समर्थक पहुंच ही नहीं पाए. इसी के साथ मानो पुलिस ने स्कोर 1-1 से बराबर कर लिया.

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प्रदर्शन के दौरान पुलिस बर्बरता के वीडियो भी आए और पुलिस के साथ बर्बरता के भी. करीब तीन हजार लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर भी सामने आई. यानी तस्वीर में टकराव भी था, सख्ती भी और गिरफ्तारी भी. लेकिन इन सबके बीच प्रदर्शन उस पैमाने का नहीं दिखा, जिसकी शायद CJP और पुलिस-प्रशासन, दोनों ने उम्मीद की होगी.

यहीं सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी याद आती है, जिसमें पाबंदियों पर चिंता जताई गई थी. मेट्रो स्टेशन, रेलवे सेवाओं और सड़कों को बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- 'मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.'

खैर, अब बात करते हैं कि आखिर ऐसा हुआ क्यों?

तो सबसे पहली बात. कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के ओवरकॉन्फिडेंस की. धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन और उनके इस्तीफे के बाद CJP नेतृत्व का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था. लेकिन शायद धीरे-धीरे यही बढ़ता चला गया. आशुतोष रांका का वो वीडियो तो याद ही होगा, जिसमें वो पुलिसवाले से बहस करते हुए कहते हैं- देश के शिक्षा मंत्री को हटाकर आए हैं, इसलिए मुझसे पॉलिटिक्स मत खेलना.

ताजा प्रोटेस्ट के बारे में जब भी वे लोग बात करते बस इतना बोलते सरकार 'कॉकरोचों' से डर गई है.

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दिपके, रांका और सौरव दास, तीनों ज्यादातर मौकों पर बस इतना बताते रहे कि 10 तारीख को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रोटेस्ट है और जंतर-मंतर पर जुटना है. लेकिन जुटने के बाद क्या करना है, आगे की रणनीति क्या होगी, पुलिस की सख्ती से कैसे निपटना है, इन सवालों पर कोई ठोस चर्चा नजर नहीं आई. मानो जंतर-मंतर पहुंचना ही आधी नहीं, पूरी लड़ाई जीत लेना हो.

दूसरी तरफ पुलिस के पास तैयारी करने का भरपूर वक्त था. उसने पिछली बार की गलतियों से सबक लिया और इस बार सुरक्षा व्यवस्था में कोई ढील नहीं छोड़ी. दिल्ली में 40,000 से ज्यादा पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के जवान तैनात किए गए. तादाद इतनी कि सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी भी उसके आसपास नहीं थे.

प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेकर जाते सुरक्षा अधिकारी (फोटो- पीटीआई)

दूसरी बात. दिपके के प्लान B यानी अजिंक्य शिंदे थोड़ा लेट एक्टिव हुए. दिपके के पकड़े जाने के बाद प्रोटेस्टर्स लगभग दिशाहीन थे.
दिपके सुबह हिरासत में जाने के बाद उनको प्रोटेस्ट की कमान सौंप गए थे. लेकिन उन्होंने दोपहर बाद जाकर ये ऐलान किया कि अगर सीजेपी समर्थक जंतर-मंतर नहीं पहुंच पा रहे तो Flash Protests करें. मतलब उनको जहां पुलिस रोक रही है, वहीं जंतर-मंतर मानकर प्रदर्शन शुरू कर दें. लेकिन तबतक ज्यादातर लोग पकड़े जा चुके थे, बचे-खुचे निराश थे.

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फील्ड पर मौजूद हमारे रिपोर्टर इसरार अहमद बताते हैं, 'पुलिस की मुस्तैदी की वजह से जो सड़क पर निकला पकड़ा गया. कई नेताओं को पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया. साथ ही दूसरी तरफ लोगों ने ज्यादा रुचि भी नहीं दिखाई. कई ऐसे थे जिनको लगा जंतर-मंतर तक पहुंच नहीं पाएंगे तो बाहर निकलकर करना ही क्या.'

तीसरी बात. जमीन पर CJP का कोई बड़ा नेता दिखाई ही नहीं दिया. टॉप चेहरे (दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास) प्लेन से ही हिरासत में ले लिए गए. कुछ नेता पहले ही हाउस अरेस्ट हो चुके थे. यहां तक कि प्रदर्शन के पोस्टर बॉय बनाए गए यूट्यूबर ध्रुव राठी भी एक रात पहले तक दिल्ली के इंडिया गेट पर थे, लेकिन प्रोटेस्ट की सुबह गुरुग्राम स्थित अपने घर से हिरासत में लिए गए. यानी CJP के किसी बड़े चेहरे को जमीन पर उतरकर प्रदर्शन में शामिल होने का मौका नहीं मिला.

दिपके भले ही सोशल मीडिया पर आगे की रणनीति नहीं बता रहे थे, लेकिन दिल्ली आने का समय, मुंबई एयरपोर्ट से निकलने और दिल्ली पहुंचने तक की जानकारी देते रहे. ऐसे में पुलिस को किसी ‘सोर्स’ से इनपुट जुटाने की जरूरत ही कहां थी.

उल्टा विपक्ष के नेता ज्यादा एक्टिव दिखे. जैसे अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, ममता बनर्जी, वृंदा करात, छात्र नेता नेहा बोरा को प्रदर्शन करते वक्त 'ग्राउंड' से उठाया गया. वहीं, सीजेपी को सपोर्ट करने वाले राकेश टिकैत (किसान नेता) साथ तो थे लेकिन किसान आंदोलन जितने एक्टिव नहीं दिखे. दिल्ली प्रोटेस्ट के दौरान वे खुद महाराष्ट्र में थे.

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चौथी बात. मुद्दा. पेपर लीक से जेन-जी, बेरोजगार युवा कनेक्ट कर गया था. लेकिन 'वोट चोरी' से शायद लोग उतना जुड़ नहीं पाए. इसपर हमारे रिपोर्टर अरविंद ओझा ने बताया, 'भीड़ इसबार बहुत कम थी. ऐसा लगा वहां समर्थकों से ज्यादा कंटेंट क्रिएटर्स थे.'

उनके मुताबिक, जंतर-मंतर प्रोटेस्ट (पहला पार्ट) में स्टूडेंट से जुड़ा मुद्दा था. ओल्ड राजेंद्र नगर, मुखर्जी नगर, हॉस्टल में रहने वाले सब उससे कनेक्ट कर गए. लेकिन इसपर ऐसा नहीं हुआ. साथ ही सीजेपी के पास अपना कोई 'कैडर' है नहीं. बस पिछले मुद्दे पर सपोर्ट ज्यादा मिला, इसबार उतना नहीं मिला.

समर्थकों से ज्यादा प्रोटेस्ट कवर करने आए सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स थे (फोटो- पीटीआई)

आखिरी बात. ट्रेन बंद. मेट्रो पर पाबंदी. सड़कों पर पुलिस ही पुसिस. इससे ज्यादा परेशानी आम लोगों को हुई. दूसरे राज्यों से छोटे-मोटे प्रोटेस्ट की खबरें तो जरूर आईं. लेकिन ऐसी खबरें बेहद कम आईं कि प्रदर्शनकारी दिल्ली जाना चाह रहे थे लेकिन उनको 'सफलतापूर्वक' रोक लिया गया है.

अब इसे सुप्रीम कोर्ट की सख्ती कहें या 10 अक्टूबर के प्रोटेस्ट का ठंडा रिस्पॉन्स. 11 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन के चलते रूट तो डायवर्ट रहेंगे, लेकिन रेल और मेट्रो चलती रहेंगी. शराब के ठेके भी खुले रहेंगे. यानी प्रदर्शन का असर ट्रैफिक के रास्तों पर तो दिखेगा, लेकिन जिंदगी की रफ्तार और जाम छलकाने के इंतजाम पर नहीं.

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