महाकाल की नगरी उज्जैन में शुक्रवार को आजतक का विशेष कार्यक्रम 'आजतक धर्म संसद' आयोजित किया जा रहा है. कार्यक्रमों की इस कड़ी में विशेष सत्र 'The ‘Immortal’ of Ujjain' में जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी सतीशाचार्य महाराज, रिटायर्ड IAS और देवाधिदेव के लेखक मनोज कुमार श्रीवास्तव और कथावाचक पंडित श्यान मानावत ने शिरकत की. तीनों ही वक्ताओं ने इस दौरान सनातन संस्कृति आधार, धर्म के असली अर्थ को समझने और संस्कृति को जानने की अपील की.
'युवाओं का शास्त्रों और परंपरा को समझना जरूरी'
कार्यक्रम में जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने सनातन धर्म, उज्जैन की आध्यात्मिक विरासत और धर्म के वास्तविक अर्थ पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि सनातन केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को जीवन जीने की दिशा देने वाली व्यवस्था है. उन्होंने युवाओं से अपनी परंपराओं और शास्त्रों को समझने की अपील की. स्वामी सतीशाचार्य महाराज ने कहा कि उज्जैन की पहचान केवल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और तप की परंपरा से भी जुड़ी हुई है.
'कर्मकांड ही नहीं सनातन के दर्शन से भी जोड़ें'
उन्होंने उज्जैन के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि यह नगरी सदियों से संतों, ऋषियों और विद्वानों की कर्मभूमि रही है. महाकाल की नगरी मनुष्य को समय और जीवन के सत्य को समझने का संदेश देती है. धर्म और आधुनिक जीवन से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ने के लिए केवल कर्मकांड बताना काफी नहीं है. इसके पीछे के भाव, उद्देश्य और दर्शन को भी समझाना होगा. उन्होंने कहा कि शास्त्रों का अध्ययन केवल धार्मिक व्यक्ति बनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सही फैसला लेने की क्षमता विकसित करने के लिए भी जरूरी है.

भस्म आरती का क्या है महत्व?
चर्चा के दौरान जब प्रश्न आया कि भस्म आरती का क्या महत्व है और इसे किन लोगों को देखना चाहिए. स्त्री-पुरुष का के देखने को लेकर क्या मान्यता है? तो इसके उत्तर में सतीशाचार्य महाराज ने कहा कि, 'भस्म आरती का बहुत प्रभाव है. भगवान शिव कहते हैं कि जहां अंत है वहां अनंत आरंभ होता है. यही परमात्मा का स्वरूप है. वेदों ने भस्म को परम तत्व कहा है.
क्या भस्म आरती देखना महिलाओं के लिए है बैन?
भस्म इसलिए चढ़ाई जाती है, क्योंकि यह परमतत्व का प्रतीक है. सारे नियम जहां समाप्त हो जाएं वही भस्म आरती है और इसे देखने में किसी को मनाही नहीं है. महिला और पुरुष केवल वस्त्रों के नाम हैं. अंदर सबके आत्मा ही है. शास्त्रों में इसका कोई भेद नहीं बताया गया है. कालांतर में व्यवस्था के आधार पर अंतर किया गया है, लेकिन व्यवस्थाएं भी बदलती रहती हैं. शिव परिवर्तनीय हैं और जो परिवर्तनशील है, वही भस्म है.'
चर्चा के दौरान सनातन पर उठने वाले सवालों, धार्मिक शिक्षा और समाज में संतों की भूमिका पर भी बात हुई. सतीशाचार्य महाराज ने कहा कि धर्म का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि जोड़ना है. धार्मिक आचरण तभी सार्थक है, जब उसमें करुणा, सेवा और दूसरों के प्रति सम्मान शामिल हो. उन्होंने कहा कि आज के समय में युवाओं को अपनी संस्कृति से परिचित कराने की बड़ी जरूरत है. इसके लिए परिवार और शिक्षण संस्थानों दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना केवल संतों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है.