भारत में कई मकान मालिक आज भी फ्लैट, शेयर्ड फ्लैट या PG का किराया कैश में लेना पसंद करते हैं. ऐसे में सैलरीड लोगों के सामने अक्सर सवाल होता है कि क्या कैश में किराया देने पर HRA की टैक्स छूट मिल सकती है. कैश में किराया देने के बावजूद HRA क्लेम किया जा सकता है. हालांकि, इसके लिए किराए से जुड़े दस्तावेज और पेमेंट का रिकॉर्ड मजबूत होना जरूरी है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर आप Old Tax Regime चुनते हैं, तो सिर्फ कैश में किराया देने की वजह से HRA क्लेम अमान्य नहीं हो जाता. हालांकि, टैक्स अथॉरिटी के सवाल उठाने की स्थिति में किराए का भुगतान साबित करना जरूरी हो सकता है. इसलिए कैश पेमेंट करने वाले कर्मचारियों के लिए रेंट एग्रीमेंट, रेंट रिसीट और दूसरे जरूरी दस्तावेज संभालकर रखना अहम है.
अगर जरूरी कागजात उपलब्ध नहीं हैं, तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट क्लेम पर सवाल उठा सकता है या उसे खारिज भी कर सकता है. यानी कैश में किराया देना अपने आप HRA की छूट खत्म नहीं करता, लेकिन ऐसे मामलों में सही रिकॉर्ड रखना बेहद जरूरी हो जाता है.
HRA की छूट कैसे तय होती है?
सैलरीड कर्मचारी किराए के घर से जुड़े खर्च पर HRA के तहत टैक्स छूट ले सकता है. उपलब्ध छूट तीन रकम में से जो सबसे कम होगी, उसके आधार पर तय होती है. इनमें शामिल हैं...
इन तीनों में से सबसे कम रकम पर HRA की टैक्स छूट मिलती है. बाकी HRA टैक्सेबल सैलरी का हिस्सा बन जाता है. वहीं, अगर कर्मचारी वास्तव में किराए के घर में नहीं रहता और फिर भी कंपनी से HRA प्राप्त करता है, तो पूरा HRA टैक्सेबल हो सकता है.
कैश पेमेंट में सबसे बड़ी दिक्कत क्या है?
टैक्स एक्सपर्ट सिद्धार्थ मौर्य के मुताबिक, कैश में किराया देने से HRA क्लेम अपने आप खत्म नहीं होता. लेकिन अगर पेमेंट से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं, तो टैक्स अथॉरिटी के सवालों का जवाब देना मुश्किल हो सकता है. बैंक ट्रांसफर, UPI या चेक से भुगतान करने पर एक डिजिटल या बैंकिंग ट्रेल बन जाता है. कैश पेमेंट में ऐसा रिकॉर्ड अपने आप नहीं बनता. इसलिए हर महीने मकान मालिक से किराए की रसीद लेना महत्वपूर्ण है. अगर मंथली रेंट ₹50,000 से ज्यादा है, तो TDS से जुड़े नियम भी लागू हो सकते हैं. पेमेंट कैश में किया गया है या बैंकिंग चैनल से, इससे TDS की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती.
कैश किराए की लिमिट क्या है?
टैक्स एक्सपर्ट चांदनी आनंदन के मुताबिक, बिजनेस असेसी के मामले में Section 40A(3) के तहत एक दिन में ₹10,000 से ज्यादा का कैश पेमेंट खर्च के तौर पर मान्य नहीं होने की स्थिति बन सकती है. उन्होंने यह भी बताया कि ₹5,000 से ज्यादा के कैश रेंट की रसीद पर रेवेन्यू स्टैंप की जरूरत हो सकती है. हालांकि, यह प्रावधान स्टांप कानून से जुड़ा है, इनकम टैक्स कानून से नहीं. इसके अलावा Section 269ST के तहत मकान मालिक एक व्यक्ति से एक दिन में ₹2 लाख या उससे ज्यादा कैश स्वीकार नहीं कर सकता. इस नियम का उल्लंघन होने पर जुर्माने की जिम्मेदारी मकान मालिक पर होती है, किराएदार पर नहीं.
HRA क्लेम के लिए कौन से दस्तावेज रखें?
कैश में किराया देने वाले कर्मचारियों को हर महीने रेंट रिसीट जरूर लेनी चाहिए. रसीद में कम से कम ये जानकारी होनी चाहिए:
इसके अलावा रेंट एग्रीमेंट भी सुरक्षित रखना चाहिए. हर महीने की साइन की हुई और तारीख वाली रसीद को संभालकर रखना बेहतर है. अगर कैश निकालने के लिए बैंक से पैसे निकाले हैं, तो उसका रिकॉर्ड भी रखा जा सकता है. हालांकि, सिर्फ बैंक से कैश निकालने की पर्ची इस बात का पक्का सबूत नहीं है कि वही रकम मकान मालिक को किराए के तौर पर दी गई थी. अगर सालाना किराया ₹1 लाख से ज्यादा है, तो HRA क्लेम के लिए आम तौर पर मकान मालिक का PAN उपलब्ध कराना होता है.
मकान मालिक ने ITR में किराया नहीं दिखाया तो?
अगर मकान मालिक ने अपनी ITR में किराए से हुई आय की जानकारी नहीं दी है, तो सिर्फ इस वजह से किराएदार का वास्तविक HRA क्लेम अपने आप खारिज नहीं होता. चांदनी आनंदन के मुताबिक, किराये की आय को अपनी ITR में रिपोर्ट करना मकान मालिक की जिम्मेदारी है. अगर टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से कोई नोटिस या कार्रवाई होती है, तो उसका असर मुख्य रूप से मकान मालिक पर होगा. हालांकि, किराएदार द्वारा जमा किए गए रेंट एग्रीमेंट और रसीद जैसे दस्तावेज उस लेनदेन का रिकॉर्ड बन सकते हैं. इसलिए किराएदार के लिए भी सही दस्तावेज रखना जरूरी है.
कैश में किराया देते हैं तो ये गलती न करें
अगर आप सैलरीड कर्मचारी हैं और कैश में किराया देते हैं, तो HRA क्लेम के लिए सिर्फ यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि आपने वास्तव में किराया दिया है. आपको उस भुगतान को दस्तावेजों के जरिए साबित करने की स्थिति में भी रहना चाहिए. रेंट एग्रीमेंट, हर महीने की रेंट रिसीट, मकान मालिक की जानकारी, पेमेंट का रिकॉर्ड और HRA से जुड़े Form 16 जैसे दस्तावेज सुरक्षित रखें. जहां संभव हो, बैंक ट्रांसफर, UPI या चेक जैसे ट्रेस करने योग्य माध्यम से किराया देना ज्यादा सुविधाजनक रहता है. कैश में किराया देने पर HRA क्लेम की गुंजाइश बनी रहती है. लेकिन टैक्स विभाग की जांच की स्थिति में मजबूत दस्तावेज और भुगतान का विश्वसनीय रिकॉर्ड आपके क्लेम को साबित करने में अहम भूमिका निभाएगा.