महाकाल की नगरी उज्जैन में आयोजित ‘आजतक धर्म संसद’ के विशेष सत्र ‘The Immortal of Ujjain’ में रिटायर्ड IAS अधिकारी और ‘देवाधिदेव’ के लेखक मनोज कुमार श्रीवास्तव ने भगवान शिव के अलग-अलग स्वरूपों, उज्जैन की कालगणना परंपरा और महाकाल के दार्शनिक अर्थ पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि उज्जैन केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि प्राचीन काल में समय और खगोल गणना का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है.
मनोज कुमार श्रीवास्तव ने उज्जैन को ‘कालबोध की राजधानी’ बताया. उन्होंने कहा कि, प्राचीन भारत में यहां से समय की गणना और खगोलीय अध्ययन की परंपरा जुड़ी रही है. उन्होंने वराहमिहिर और उज्जैन की वेधशाला का उल्लेख करते हुए कहा कि महाकाल की स्थापना भी ऐसे ही स्थान पर हुई, जहां समय और काल को समझने की परंपरा रही. अपनी पुस्तक ‘देवाधिदेव’ के बारे में बताते हुए मनोज कहते हैं कि, किताब में भगवान शिव के तीन स्वरूपों- पशुपति, श्मशानवासी और नटराज पर खासतौर से जिक्र किया है. इन तीन नामों में शिव के व्यापक दर्शन को समझने की कोशिश की गई है.
‘पशुपति’ शब्द को लेकर लेखक मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि इसका अर्थ केवल 'पशुओं के स्वामी' के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि पश्चिमी लेखकों द्वारा इसे ‘Lord of the Beasts’ के रूप में अनुवादित किए जाने से इसका अर्थ विकृत हो सकता है. उनके मुताबिक भारतीय दार्शनिक परंपरा में ‘पशु’, ‘पाश’ और ‘पति’ तीन अलग अवधारणाएं हैं. मनुष्य मोह, लोभ, काम और अहंकार जैसे बंधनों यानी पाश में बंधा है, जबकि इन बंधनों से ऊपर स्थित सत्ता को पशुपति कहा गया है.
उन्होंने महाकाल मंदिर में होने वाली भस्म आरती का उल्लेख करते हुए श्मशानवासी स्वरूप का अर्थ भी समझाया. श्रीवास्तव ने कहा कि शिव पर भस्म चढ़ाने का भाव यह है कि पद, प्रतिष्ठा, धन और ऐश्वर्य जैसी सभी सांसारिक चीजें अंततः नश्वर हैं. उनके अनुसार महाकाल का संदेश जीवन की इन नश्वरताओं से आगे देखने का है. उन्होंने कहा कि मृत्युंजय शिव उन सभी चीजों से परे जाने का प्रतीक हैं, जिन्हें मनुष्य स्थायी मान बैठता है. इसी कारण महाकाल में भस्म का विशेष महत्व माना जाता है.
नटराज स्वरूप पर बात करते हुए श्रीवास्तव ने इसे सृष्टि की गति, स्पंदन और लय से जोड़ा. उन्होंने आधुनिक विज्ञान की ‘वाइब्रेशन’ और ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ का उदाहरण देते हुए कहा कि नटराज का नृत्य ब्रह्मांड में निरंतर चल रही गति और ऊर्जा का प्रतीक माना जा सकता है. उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी शिव के विभिन्न स्वरूपों से उनका जुड़ाव बना रहा और इन्हीं अनुभवों ने उन्हें ‘देवाधिदेव’ लिखने के लिए प्रेरित किया.