संसद का मॉनसून सत्र इन दिनों लगातार हंगामे की भेंट चढ़ रहा है. पिछले करीब तीन हफ्तों से संसद में कामकाज पूरी तरह से ठप है. इस बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच हुई हालिया बैठकों ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है.
दरअसल, पिछले तीन हफ्तों से संसद के दोनों सदनों में कामकाज नहीं हो पा रहा है. नीट पेपर लीक मामले को लेकर युवाओं और छात्रों के विरोध प्रदर्शन, दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई और राम मंदिर में चंदा चोरी के आरोपों जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है. इन हंगामों की वजह से प्रश्नकाल से लेकर जरूरी विधयेक तक सब कुछ अटक गया है. ऐसे में सरकार चाहती है कि संसद का गतिरोध खत्म हो और जरूरी कामकाज आगे बढ़े.
सूत्रों के मुताबिक, किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से बातचीत के दौरान मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दों पर चर्चा की. सरकार चाहती है कि संसद में महिला आरक्षण विधेयक, परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन बिल और विदेशी अंशदान अधिनियम यानी FCRA से जुड़े संशोधन पास किए जाएं. सरकार का मानना है कि इन बड़े विषयों पर विपक्ष का सहयोग मिलना बहुत जरूरी है.
दरअसल, संविधान संशोधन से जुड़े बिलों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की सख्त जरूरत होती है. हालांकि एनडीए गठबंधन के साथ कुछ अन्य दलों के आने से आंकड़े थोड़े बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन फिर भी यह बहुमत अपने दम पर हासिल करना मुश्किल है. यही वजह है कि सरकार अब टकराव का रास्ता छोड़कर विपक्ष, खास तौर पर कांग्रेस के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रही है. रिजिजू की इस पहल को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
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विपक्ष ने सरकार के सामने रखीं तीन बड़ी शर्तें
सरकार की इस पहल के बाद भी फिलहाल कोई बड़ा समझौता नहीं हो पाया है. कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का रुख अब भी साफ है. राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब तक सरकार उनकी मुख्य मांगें नहीं मानती, संसद का सुचारू चलना मुश्किल है.
विपक्ष ने दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह सदन में बयान, अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी के आरोपों पर खुली चर्चा की मांग की है. साथ ही परिसीमन के मौजूदा स्वरूप पर भी विपक्ष की कड़ी आपत्तियां हैं
किरेन रिजिजू के साथ फोन और संसद में हुई लंबी चर्चा के बाद राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अकेले कोई फैसला नहीं लेंगे. उन्होंने साफ कहा है कि वे इस पूरे प्रस्ताव पर पहले 'इंडिया' गठबंधन के सभी सहयोगी दलों के साथ विस्तार से बैठक करेंगे. इसके बाद ही सभी की सहमति से सरकार को अपना जवाब दिया जाएगा.
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ हफ्तों के राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों और कुछ राज्यों के उपचुनावों के नतीजों ने सरकार को अपनी रणनीति पर फिर से सोचने पर मजबूर किया है. केंद्र सरकार अब आक्रामक रुख की जगह संवाद और मेलजोल के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रही है.
भले ही अभी तक सदन के अंदर गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और दोनों पक्ष अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं, लेकिन बंद कमरों में बातचीत के चैनल जरूर खुल गए हैं. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह संवाद संसद को पटरी पर लाने में कामयाब हो पाता है या गतिरोध यूं ही बना रहता है.