सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) के कर्मियों के बिना किसी पहचान पत्र और वर्दी के घर में घुसने के आरोपों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. शीष अदालत ने याचिकाकर्ता को इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया.
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता वाइज खान के वकील को ये निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता संविधान के आर्टिकल 32 का सहारा लेकर सीधे शीर्ष अदालत पहुंचे हैं, जबकि उन्हें पहले हाईकोर्ट जाना चाहिए था.
बता दें कि आर्टिकल 32 नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है.
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी, 'अगर मैं आर्टिकल 32 के तहत आ रहा हूं, तो सुप्रीम कोर्ट इससे पीछे नहीं हट सकता.' इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने बताया कि संविधान के आर्टिकल 32 और आर्टिकल 226 मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में एक ही तरह का क्षेत्राधिकार देते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे आरोपों की जांच के मौके सबसे पहले अदालत को ही दिया जाना चाहिए.
जस्टिस बागची ने कहा, 'हम हमेशा यही पसंद करेंगे कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का संज्ञान पहले निचली या संबंधित अदालत (उच्च न्यायालय) ले.'
डीके बासु फैसले का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता के वकील ने पुलिस हिरासत और अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षा उपायों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'डी के बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' का भी हवाला दिया. इसके बावजूद, जस्टिस बागची ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय के सामने मौजूद कानूनी विकल्पों का ध्यान दिलाया.
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वकील ने सवाल उठाया कि एटीएस कर्मी बिना बैज या पहचान पत्र दिखाए उनके मुवक्किल के घर में कैसे दाखिल हो सकते हैं. इस पर सीजेआई ने पूछा कि याचिकाकर्ता इन आरोपों को लेकर पहले उच्च न्यायालय क्यों नहीं गए? जब वकील ने सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी पर जोर दिया, तो बेंच ने याचिका खारिज कर दी.
बेंच ने अपने आदेश में कहा, 'याचिका पर विचार करने का कोई मामला नहीं बनता है. इसे खारिज किया जाता है. याचिकाकर्ता, अगर चाहें तो, उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं.'