लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इंडिया ब्लॉक के नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ याचिका दायर की है. दिनभर हुए हंगामे के बाद सोमवार शाम दायर हुई इस याचिका में राहुल गांधी मुख्य याचिकाकर्ता हैं और उनके साथ विपक्षी दलों के 10 और बड़े नेताओं के भी नाम हैं. यानी कुल 11 नेताओं ने यह याचिका दायर की है.
सूत्रों के मुताबिक, याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने के चुनाव आयोग के फैसले को अवैध घोषित करने की मांग की गई है. इसके साथ ही याचिका में अदालत से SIR की पूरी प्रक्रिया की कानूनी वैधता की जांच करने का अनुरोध किया गया है. याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग ने SIR की प्रक्रिया के जरिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल उनके निर्धारित उद्देश्य से हटकर किया है. कानूनी भाषा में इसे शक्तियों का छद्म प्रयोग (Colourable Exercise of Power) कहा जाता है.
इसके अलावा याचिका में क्या-क्या मांगें रखी गई हैं, इसे लेकर अहम जानकारियां सामने आई हैं. याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के अधिकारों, वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रोसेस और चुनाव आयोग के डिजिटल डेटाबेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं. याचिका में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच समिति बनाने की मांग भी की गई है.
इस याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग ने SIR लागू करते समय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना फैसले लिए? याचिका में क्या है 10 बड़ी बातें-
1. CEC पर सवाल... क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले फैसले लिए?
याचिका में अहम आरोप सीईसी ज्ञानेश कुमार पर लगाया गया है. कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी और सहमति के बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए. इसमें 23 सितंबर 2026 की इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां जताई थीं. ये आपत्तियां वोटर्स के रजिस्ट्रेशन, नाम डिलीट होने, दोबारा जोड़ने और डेटा तक पहुंच से जुड़ी थीं. हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि फैसले सर्वसम्मति से हुए और विचारों में अंतर नॉर्मल प्रोसेस है.
2. देशभर में SIR किसकी मंजूरी से लागू हुआ?
याचिका में 24 जून 2025 के आदेश पर सवाल उठाया गया है. 28 जुलाई 2025 को दाखिल RTI में देशभर में SIR को मंजूरी देने वाली फाइलें मांगी गई थीं. आरोप है कि आयोग ने केवल 24 जून का आदेश उपलब्ध कराया. बाद में प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने दर्ज किया कि तब तक देशभर में SIR शुरू करने का कोई फैसला नहीं हुआ था. जबकि आदेश में पूरे देश में SIR कराने का उल्लेख था. वहीं, आयोग ने 26 सितंबर 2026 की प्रेस रिलीज में सर्वसम्मति से मंजूरी का दावा किया. याचिका में मूल फाइल मंगाने की मांग है.
3. टीएन शेषन मामले के फैसले का हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट की 1995 की संविधान पीठ के टीएन शेषन बनाम भारत संघ फैसले का उल्लेख है. इसके मुताबिक, सीईसी को अन्य चुनाव आयुक्तों से अधिक निर्णय लेने की शक्ति नहीं है. वर्ष 2023 के कानून की धारा 18 के तहत जहां संभव हो, फैसले सर्वसम्मति से और मतभेद होने पर बहुमत से होने चाहिए. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अकेले सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लंघन हो सकता है.

4. फॉर्म-6 में बदलाव पर सवाल
याचिका में जुलाई 2026 के दौरान ऑनलाइन फॉर्म-6 में किए गए कथित बदलावों को गैरकानूनी बताया गया है. आरोप है कि आवेदकों से यह घोषणा मांगी गई कि उनका या उनके रिश्तेदारों का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में था या नहीं. याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसके लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन नहीं हुआ. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को मौखिक रूप से स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म को मंजूरी नहीं दी थी.
5. ECINET और ERONET का स्वतंत्र ऑडिट
याचिका में चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और ERONET की स्वतंत्र तकनीकी जांच मांगी गई है. सवाल है कि वोटर्स का रिकॉर्ड कौन बदल सकता है और क्या बदलावों का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है? कुछ रिपोर्टों का हवाला देकर आरोप लगाया गया कि सॉफ्टवेयर में पुरानी स्थिति बहाल करने की सुविधा नहीं होने से हटाए गए वोटर्स के नाम दोबारा नहीं जुड़ सके. याचिकाकर्ताओं ने इलेक्शन कमीशन की आंतरिक समीक्षा को अपर्याप्त बताया है.
6. करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम का मामला
याचिका में एक अन्य लंबित मामले का जिक्र है, जिसमें विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की वोटर्स लिस्ट से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आरोप है. हालांकि, चुनाव आयोग के मुताबिक, यह संख्या अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की नहीं, बल्कि ड्राफ्ट चरण में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट चिह्नित मतदाताओं की है. याचिका में पात्र मतदाताओं के संभावित निष्कासन की जांच मांगी गई है.
7. फॉर्म-7 के जरिए सामूहिक आपत्तियों का मुद्दा
याचिका में फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में नाम हटाने की आपत्तियां दाखिल होने पर चिंता जताई गई है. आरोप हैं कि कुछ मामलों में फर्जी नामों और झूठी घोषणाओं का इस्तेमाल हुआ. विशेष समुदायों और महिलाओं को निशाना बनाने तथा पर्याप्त नोटिस या सुनवाई के बिना नाम हटाने के आरोप भी लगाए गए हैं. याचिकाकर्ताओं ने सख्त सुरक्षा उपायों और जवाबदेही की मांग की है.
8. पंजाब में 20.66 लाख नाम कम होने का दावा
पंजाब का उदाहरण देते हुए याचिका में कहा गया है कि 13 अगस्त 2026 की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में जून के लगभग 2.14 करोड़ वोटर्स की तुलना में 20.66 लाख नाम कम थे. इसके अलावा 12.80 लाख मतदाताओं की पुरानी सूचियों से मैपिंग नहीं हो सकी और उनसे दस्तावेज मांगे गए. अंतिम सूची 12 अक्टूबर को प्रकाशित होनी निर्धारित थी. याचिका में पात्र मतदाताओं को पर्याप्त समय और प्रभावी उपाय न मिलने की आशंका जताई गई है.
9. EVM की वर्क प्रोसेस की भी जांच की मांग
याचिका का दायरा SIR तक सीमित नहीं है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) से जुड़ी नीतियों, तकनीकी संरचना, इस्तेमाल और संचालन प्रक्रियाओं की स्वतंत्र समीक्षा मांगी गई है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों और बेहतर प्रक्रियाओं से तुलना करने की मांग भी की गई है.
10. रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में समिति
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करें और इसमें तकनीकी विशेषज्ञ तथा अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों. समिति इलेक्शन डेटाबेस, SIR के लागू होने और EVM से जुड़ी प्रोसेस की जांच करे.
11. विवाद सिर्फ प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक अधिकारों का भी
याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा विवाद केवल उसकी आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है. यह उस संवैधानिक संस्था की शक्तियों के वैध इस्तेमाल से जुड़ा मामला है, जिसे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
12. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा
INDIA गठबंधन ने याचिका में कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं. इसके लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसका संस्थागत कामकाज बेहद जरूरी है. ऐसे में आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल की कानूनी वैधता की जांच महत्वपूर्ण है.
किन 11 नेताओं ने दायर की याचिका?
सामने आया है कि इस याचिका में राहुल गांधी मुख्य याचिकाकर्ता हैं और उनके साथ अलग-अलग विपक्षी दलों के 10 और बड़े नेताओं के भी नाम हैं. यानी कुल 11 नेताओं ने यह याचिका दायर की है.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL में 11 याचिकाकर्ताओं के नाम शामिल हैं. इनमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी प्रसाद यादव, संजय राउत, एम. ए. बेबी और डी. राजा शामिल हैं.
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, - कांग्रेस (प्रमुख याचिकाकर्ता)
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे- कांग्रेस (दूसरे याचिकाकर्ता)
सौगत रॉय - टीएमसी
अखिलेश यादव- समाजवादी पार्टी
तेजस्वी प्रसाद यादव- राष्ट्रीय जनता दल
संजय राउत - शिवसेना (UBT)
एमए. बेबी - कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (Marxist)
डी. राजा - कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया
महुआ माजी - झारखंड मुक्ति मोर्चा
सुप्रिया सुले - एनसीपी (शरद पवार गुट)
ईटी. मोहम्मद बशीर - इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे पहुंचे थे सुप्रीम कोर्ट
इस याचिका के दायर होने के थोड़ी देर बाद मार्च को लीड करते हुए राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. इससे एक बार फिर एससी के सामने हंगामे की स्थिति बन गई. इस वजह से यह भी सवाल उठा कि जब मार्च के दौरान ही लीगल टीम ने याचिका दायर कर ही दी थी तो फिर राहुल गांधी और खड़गे सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचे? बाद में सूत्रों के हवाले से इसका भी जवाब सामने आया कि दोनों नेता याचिका पर हस्ताक्षर के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे.
हस्ताक्षर के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकल गए. इस दौरान उनके साथ अभिषेक मनु सिंघवी भी मौजूद थे. इस तरह राहुल गांधी की ओर से दी गई याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होकर आधिकारिक रूप से रजिस्टर हो गई है. याचिका में SIR कराने के फैसले को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है. साथ ही, याचिका में SIR की प्रक्रिया को ECI की ओर से शक्तियों के गलत इस्तेमाल के तौर पर देखते हुए इसकी कानूनी वैधता पर विचार करने की मांग की गई है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने बताई याचिका से जुड़ी जरूरी बातें
इससे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जा रही याचिका को लेकर अहम जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि इस याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विभिन्न पहलुओं के साथ-साथ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा भी उठाया गया है. सिंघवी के मुताबिक, यह विपक्षी दलों की संयुक्त कानूनी पहल है. विभिन्न विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं.
असल में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सीजेआई से मुलाकात के लिए चिट्ठी लिखी थी. फिर उन्होंने याचिका भी दायर की है. इस पर सवाल उठ रहे हैं कि जब याचिका ही दायर करनी थी तो सीजेआई से मुलाकात के लिए चिट्ठी क्यों लिखी थी? आजतक से बातचीत में वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने इन सवालों पर जवाब दिया है.
'चीफ जस्टिस पर कोई दबाव नहीं बनाया'
अभिषेक मनु सिंघवी ने चीफ जस्टिस (CJI) पर दबाव बनाने के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्षी नेताओं ने केवल मुलाकात का समय मांगने के लिए पत्र लिखा था. इसके बाद मिली सलाह के अनुसार अदालत में याचिका दाखिल करने का फैसला किया गया.
'लोग अपनी मर्जी से प्रदर्शन में शामिल हुए'
सिंघवी ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बचाव करते हुए कहा कि प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों का शामिल होना उनके गुस्से और असंतोष की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति है. उन्होंने प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को पैसे दिए जाने के आरोपों को भी खारिज किया. सिंघवी ने कहा कि लोग अपनी इच्छा से विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे. उन्हें इसके लिए कोई भुगतान नहीं किया गया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई कब होगी और मामले का निपटारा कब तक हो सकता है, इसे लेकर सिंघवी ने कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई.