Gen-Z 'भोले' क्या-क्या बातें कर रहे… जंतर-मंतर प्रोटेस्ट पर गुस्सा, नए टाइप की कांवड़ का दुख!
आस्था का सैकड़ों किलोमीटर लंबा सफर... कांवड़ यात्रा जारी है. सड़क से लेकर आपके फोन की Reels तक हर तरफ 'बोल बम' गूंज रहा है. लेकिन इन Reels से थोड़ा बाहर निकलते हैं. देखते हैं कांवड़ यात्रा का Real Scene क्या है. कांवड़ियों के लिए इंतजाम कितने हैं, नई पीढ़ी कांवड़ को कैसे बदल रही है और इन भोले की अपनी-अपनी कहानी क्या है.
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एक 21-22 साल का कांवड़िया बोला- हम जंतर-मंतर वाले नहीं हैं. हमें Gen-Z मत बोलो (फोटो- PTI)
सावन का महीना है और कांवड़ यात्रा अपने पीक पर. शायद आपकी Instagram और Facebook फीड भी कांवड़ियों की Reels से फुल होगी. कोई भोले की भक्ति में मगन, तो कोई ऐसी हटके कांवड़ लाया जिसे देखने वाला बस स्क्रॉल रोक दे.
लेकिन इन वायरल रील्स के पीछे की असली कहानी क्या है? कांवड़ियों के लिए रास्ते में क्या इंतजाम हैं? खाने-पीने से लेकर रहने, मेडिकल और सुरक्षा तक की क्या तैयारी है?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने हम पहुंचे दिल्ली के यमुना विहार. क्षत्रिय कांवड़ सेवा शिविर...
शिविर में वैसे तो हर उम्र के लोग थे, लेकिन युवाओं की संख्या खास तौर पर ज्यादा दिखी. मैंने हंसकर पास खड़े कांवड़ियों से कहा- लगता है इस बार Gen-Z भी खूब कांवड़ लेने पहुंचे हैं.
इतना सुनना था कि पास में भूत वाला नकाब लगाए खड़े एक भोले ने अपना मास्क उतारा और मेरी तरफ देखकर बोला- हम जंतर-मंतर वाले नहीं हैं. हमें Gen-Z मत बोलो.
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो दोबारा बोला- हम Gen-Z को फॉलो नहीं करते. हम 250 किलोमीटर पैदल गंगाजल लाए हैं. हमें उन लोगों से मत जोड़ो जो दो किलोमीटर भी ओला-रैपिडो से जाते हैं.
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बात छोटी, लेकिन दिलचस्प थी. उम्र के हिसाब से देखें तो ये भोला Gen-Z की ही उम्र का था, लेकिन खुद को Gen-Z कहलाना उसे मंजूर नहीं था. यानी उसके लिए Gen-Z कोई पीढ़ी बताने वाला शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा टैग था जिससे वो खुद को जोड़ना ही नहीं चाहता था.
Gen-Z बोलने पर नाराज हुए कांवड़िए
पास ही खड़े एक और भोले ध्रुव ने भी नकाब वाले भोले का सपोर्ट किया. 20 साल के ध्रुव दिल्ली के बुराड़ी जा रहे थे. उन्होंने कहा, 'जब तक वहां छात्रों की बात थी, हम भी सपोर्ट में थे. लेकिन बाद में 'सीता के पति' और हिंदू धर्म के खिलाफ वाली बातें हुईं. वो ठीक नहीं था.'
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी यहीं मिल गया.
हमें नांगलोई के 18 साल के विवेक मिले. विवेक 51 लीटर जल लेकर कांवड़ यात्रा पर निकले थे. बातचीत में पता चला कि वो CJP के समर्थन में जंतर-मंतर भी गए थे.
'आस्था अपनी जगह है, लेकिन छात्रों के साथ खड़ा होना भी जरूरी है', IGL पाइपलाइन फिटिंग का काम करने वाले विवेक बोले.
पारंपरिक कांवड़ कम, कलश कांवड़ ज्यादा
होड़ और भोले के चोर से परेशान कांवड़िए
शिविर में आगे हमारी मुलाकात करीब 40 साल के कार्तिक से हुई. उन्होंने सबसे पहले इसके बदलते डिजाइन की बात की.
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कार्तिक बोले- हमारे टाइम में जो कांवड़ होती थी, वो अब पुराना डिजाइन हो गया. नई पीढ़ी ने इसे अपने हिसाब से अपडेट कर लिया है.
अब ट्रेंड में है- कलश कांवड़. बड़े-बड़े कलश, ज्यादा जल और उसके साथ अपनी कांवड़ को सबसे अलग दिखाने की होड़.
लेकिन कार्तिक को इसी ट्रेंड को लेकर एक चिंता भी है.
वो कहते हैं- लोग होड़ में ज्यादा से ज्यादा लीटर जल भरकर ले आते हैं. लेकिन जब हिम्मत जवाब दे देती है, तो कांवड़ रास्ते में ही छोड़कर भाग जाते हैं.
युवाओं को सबसे ज्यादा कलश कांवड़ पसंद
वो आगे बोले- कई कांवड़ झाड़ियों के बीच और सड़क किनारे पड़ी देखीं. मुजफ्फरनगर के आसपास एक चायवाले की दुकान पर तो करीब 6 कांवड़ टंगी मिलीं. चायवाले ने बताया कि तीन दिन से इन्हें कोई लेने नहीं आया.
कार्तिक ने कहा कि कई कांवड़िए 'भोले के चोर' बन जाते हैं. इसका मतलब, पैदल चलने की जगह रास्ते में बाइक या ई-रिक्शा वालों से लिफ्ट लेते हैं और सफर का बड़ा हिस्सा ऐसे ही पूरा कर लेते हैं.
बातचीत चल ही रही थी कि पीछे बैठे कुछ कांवड़िए आपस में बात करते सुनाई दिए.
एक आवाज आई- न भाई, इस बार मुश्किल है यूपी चुनाव जीतना. बहुत बुरा हाल है.
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कान वहीं अटक गए. मैंने भी कुर्सी कांवड़ियो की तरफ घुमा ली और बातचीत में शामिल हो गया.
सामने बैठे 28 साल के अजय बोले- भाई, 12 साल का था तब से कांवड़ ला रहा हूं. लेकिन इस बार यूपी में इंतजाम बेहद कम थे. भोले खूब नाराज हैं.
नजफगढ़ के अजय का दावा था कि इस बार कांवड़ियों के लिए न तो पर्याप्त शिविर दिखे और न ही मेडिकल की ठीक व्यवस्था. उन्होंने चढ़ावे की चोरी का मुद्दा भी उठाया और कहा कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो चुनाव में बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकती है.
अजय आगे बोले- भाई, पट्टी भी अपनी जेब से खरीदी है.
उन्होंने पैर में लगी पट्टी का एक छोटा सा टुकड़ा दिखाया. बोले- ये देखो, स्टोर वाले ने इतनी सी कतरन के भी 200 रुपये ले लिए. खाने की थाली भी 250-250 की.
गुस्से में लाल अजय की आवाज अब थोड़ी तेज हो गई थी. डीजे की आवाज के बीच भी उनकी बात दूसरे कांवड़ियों तक पहुंचने लगी.
तभी 'हाथ रगड़ता' हुआ एक भोला पास आकर बैठ गया. उसने अजय पर सीधे सवाल दाग दिया- भाई, आपने हरिद्वार से कांवड़ कब उठाई?
अजय बोले- 24 जुलाई.
भोले ने तुरंत कहा- बस, यही दिक्कत है. आप जल्दी निकल गए थे.
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फिर उसने अपनी बात समझाई- 31 जुलाई के आसपास निकलते तो आपको पूरे इंतजाम मिलते. कोई भोला नाराज नहीं है. यूपी में हर बार की तरह इस बार भी पूरे इंतजाम थे. हमें तो सब मिला. दिल्ली में भी अच्छी व्यवस्था है.
इंतजाम से खुश इस भोले का नाम विक्की था. उम्र 23 साल और पिछले 8 साल से लगातार कांवड़ लेने जा रहे हैं.
हरियाणा जा रहे विक्की से मैंने पूछा- भाई, करते क्या हो?
विक्की बोले- टेंट का काम है. दो हफ्ते की छुट्टी ली है.
मैंने थोड़ा हैरान होकर पूछा- ऐसे छुट्टी मिल जाती है?
विक्की हंसते हुए बोले- भाई, सरकारी नौकरी भी होती ना, तो चाहे छोड़नी पड़ती... लेकिन कांवड़ लेने तो जरूर जाता.
हालांकि, विक्की ने भी माना कि सरकार और शिविर लगाने वालों को भी टाइमिंग पर थोड़ा और सोचने की जरूरत है. आमतौर पर यूपी में जल चढ़ाने के करीब 12 दिन पहले और दिल्ली में 7-8 दिन पहले शिविर लगने शुरू होते हैं.
लेकिन उनके मुताबिक शिविर करीब 20 दिन पहले से लगने चाहिए. वजह भी है. हरियाणा से आने वाले या गोमुख से कांवड़ लेकर निकलने वाले भोले काफी पहले सफर शुरू कर देते हैं. ऐसे में जब वो यूपी या दिल्ली पहुंचते हैं, तब तक रास्ते में इंतजाम शुरू ही नहीं हुए होते.
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और फिर विक्की ने इस पूरी बात को एक अलग एंगल दे दिया.
मुस्कुराते हुए बोले- भाई, कांवड़िए भी तो इकोनॉमी में कंट्रीब्यूटर हैं. 4-5 करोड़ कांवड़िए जल लाते हैं. हर भोला कम से कम 6-7 हजार रुपये खर्च कर देता है. उनके मुताबिक, सीधा हिसाब लगाएं तो कांवड़ यात्रा का कारोबार हजारों करोड़ रुपये तक बैठता है.
कांवड़ियों की बातें सुनने के बाद हम मिले शिविर के अध्यक्ष ओमपाल सिंह चौहान से.
मुलाकात के वक्त 70 साल के ओमपाल सिंह खुद कांवड़ियों को खाना खिला रहे थे. उन्होंने बताया कि शिविर एक-दो साल पुराना नहीं, बल्कि पिछले 28 साल से चल रहा.
इतना बड़ा शिविर चलाने में सरकार की तरफ से भी कोई मदद मिलती है क्या?
ओमपाल सिंह ने कहा- हां, शिविर के साइज के हिसाब से राज्य सरकार फंड देती है. इस बार दिल्ली सरकार ने उन्हें ₹4 लाख दिए हैं.
लेकिन यहां एक दिलचस्प हिसाब है. ओमपाल कहते हैं कि सिर्फ टेंट वाला ही इतना ले जाएगा. बाकी पैसा समाज के लोग मिलकर जुटाते हैं.
अब जरा इस शिविर का स्केल समझिए. करीब 7 दिन तक चलने वाले इस शिविर में अलग-अलग वक्त पर करीब 6 हजार कांवड़िए रुकते हैं. कोई खाना खाकर आगे बढ़ रहा है, कोई थोड़ी देर आराम कर रहा है, तो कोई रात गुजारकर अगली सुबह अपनी मंजिल की तरफ निकल पड़ता है.
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मतलब ये सिर्फ एक टेंट नहीं, बल्कि 7 दिनों के लिए कांवड़ियों का छोटा सा पड़ाव है, जहां हर दिन नए चेहरे आते हैं और कुछ घंटे बाद अगली मंजिल के लिए निकल जाते हैं.
अब एक सवाल थोड़ा टेढ़ा था- क्या इतनी भीड़ में कोई बैड एलिमेंट भी घुस आता है?
ओमपाल सिंह ने कहा कि वैसे तो ऐसी कोई बड़ी दिक्कत नहीं आती, लेकिन सबसे बड़ा डर कांवड़ चोरी होने या उसके खंडित होने का रहता है. इसके लिए अब टोकन सिस्टम है. मतलब 'भाई, मेरी कांवड़ है' कहने भर से काम नहीं चलेगा. पहले टोकन दिखाइए, फिर कांवड़ उठाइए और आगे अपनी यात्रा पर निकल जाइए.