रावण के नाम के साथ जुड़ता है लंका, अहंकार, सीता हरण और राम से युद्ध. रावण के विशाल व्यक्तित्व की छाया में एक ऐसी स्त्री भी थी, जिसका अपना विवेक, अपनी दृष्टि और अपनी पीड़ा थी. वह थी मंदोदरी. लंका के उस पूरे साम्राज्य के भीतर वह उन गिने-चुने लोगों में शामिल थीं जो यह समझ पा रही थी कि रावण जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, उससे विनाश निश्चित है. फिर भी सदियों से रामायण की लोकप्रिय स्मृति में मंदोदरी का किरदार एक ऐसी स्त्री के रूप में दर्ज नहीं हो पाया, जिसकी अपनी दृष्टि, अपनी राजनीतिक समझ और अपनी नैतिक आवाज थी.
मंदोदरी की उपेक्षा को समझने के लिए सबसे पहले रामायण को समझना होगा. रामायण का केंद्र राम, सीता और रावण के संघर्ष के इर्द-गिर्द है. सीता इसलिए केंद्र में है क्योंकि उनका हरण पूरी कथा को आगे बढ़ाता है. राम के वनवास से लेकर लंका विजय तक की घटनाओं का भावनात्मक केंद्र बनता है. रावण इसलिए केंद्रीय है क्योंकि वह राम के सामने सबसे बड़ा प्रतिपक्ष बनकर खड़ा है. इन दोनों के बीच चलने वाले संघर्ष में मंदोदरी की भूमिका कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, वह कथा को आगे बढ़ाने वाली नायिका नहीं बनतीं. वह उस साम्राज्य के भीतर की आवाज बनकर रह जाती हैं, जो संकट को आते हुए देखती है, उसे रोकने की कोशिश करती है, लेकिन सत्ता के निर्णय को बदल नहीं पाती.
यही बात मंदोदरी को दूसरे स्त्री पात्रों से अलग करती है. कैकेयी ने एक निर्णय लिया और उस निर्णय ने राम के वनवास की दिशा तय कर दी. मंथरा ने कैकेयी को प्रभावित किया और कथा की निर्णायक घटना की सूत्रधार बन गई. शूर्पणखा की एक घटना ने राम-रावण संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार कर दी. सीता का हरण स्वयं युद्ध का सबसे बड़ा कारण बना लेकिन मंदोदरी? वह निर्णय लेने वाली नहीं बल्कि निर्णय के परिणाम को पहले से देख लेने वाली स्त्री रही.
वाल्मीकि रामायण में मंदोदरी कई प्रसंगों में रावण को समझाने की कोशिश करती हैं. वह उसे सीता को राम के पास लौटा देने की सलाह देती हैं और यह समझाती हैं कि राम से शत्रुता लंका के लिए विनाशकारी हो सकती है. वह रावण की शक्ति से अनजान नहीं थीं बल्कि शायद इसी कारण उनकी चेतावनी और महत्वपूर्ण हो जाती है. वह अपने पति की सामर्थ्य को पहचानते हुए भी उसके अहंकार के खतरे को पहचानती हैं. मंदोदरी का चरित्र इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वह रावण की पत्नी होकर भी रावण की हर बात से सहमत नहीं हैं. वह उसके प्रेम, उसके वैभव और उसके सामर्थ्य के साथ-साथ उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार भी देखती है.
लेकिन रामायण की लोकप्रिय व्याख्याओं में मंदोदरी को अक्सर सिर्फ रावण की पत्नी के रूप में याद किया गया. जैसे उनकी अपनी कोई पहचान नहीं थी और उनका पूरा चरित्र रावण से होकर ही गुजरता था. यही वह जगह है जहां मंदोदरी का किरदार हमारी सामूहिक स्मृति में छोटा हो जाता है. हम यह भूल जाते हैं कि सत्ता के भीतर मौजूद होना और सत्ता का हिस्सा होना एक ही बात नहीं है. मंदोदरी लंका की महारानी थीं, लेकिन लंका के राजनीतिक निर्णयों पर उनका निर्णायक अधिकार नहीं था.
मंदोदरी की एक और खासियत यह है कि वह रामायण की उन स्त्रियों में हैं जिनकी नैतिक दृष्टि को समझने के लिए उन्हें किसी युद्ध में तलवार उठाने की जरूरत नहीं पड़ती. उनका संघर्ष संवाद का संघर्ष है. वह रावण के सामने खड़ी होकर उसे समझाती हैं कि एक स्त्री के प्रति उसका मोह पूरे राज्य को संकट में डाल सकता है. वह उस पुरुष सत्ता के सामने विवेक की आवाज हैं, जहां राजा का अहंकार पत्नी की सलाह से बड़ा हो जाता है. इस अर्थ में मंदोदरी केवल रावण की पत्नी नहीं, बल्कि उस सत्ता की अंतरात्मा जैसी दिखाई देती हैं जो बार-बार चेतावनी देती है और बार-बार अनसुनी कर दी जाती है.
युद्ध के बाद मंदोदरी का विलाप उनके चरित्र को और गहराई देता है. रावण के मारे जाने के बाद वह केवल एक पराजित राजा की पत्नी के रूप में शोक नहीं करतीं. उनके सामने वह पूरा संसार उजड़ चुका है जिसे रावण के अहंकार ने खड़ा किया था. उस क्षण मंदोदरी की स्थिति बेहद मानवीय हो जाती है. जिस पति के गलत निर्णयों का उन्होंने विरोध किया, उसी पति की मृत्यु पर उन्हें शोक भी करना है. यही विरोधाभास उनके चरित्र को असाधारण बनाता है. वह रावण के अपराधों को सही नहीं ठहरातीं, लेकिन उससे प्रेम करने वाली पत्नी भी हैं. उनके भीतर पत्नी का दुख और विवेक की चेतना एक साथ मौजूद हैं.
मंदोदरी का सबसे बड़ा दुख शायद यही था कि वह अपने पति को कमजोर नहीं समझती थीं, बल्कि उसकी शक्ति को बहुत अच्छी तरह जानती थीं. उन्हें मालूम था कि रावण ने देवताओं और अनेक शक्तिशाली योद्धाओं को पराजित किया है लेकिन वह यह भी समझ रही थीं कि सीता को लेकर उसका मोह उसे विनाश की ओर ले जा रहा है. यही कारण है कि युद्ध के अंतिम चरणों में उनकी चिंता केवल अपने पति के लिए नहीं, बल्कि पूरे लंका के भविष्य के लिए दिखाई देती है. यही वजह है कि मंदोदरी को केवल रावण की पत्नी कहना उनके चरित्र के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को अनदेखा करना है. वह उस राजसत्ता के भीतर विवेक की आवाज थीं, जिसे रावण का अहंकार लगातार दबा रहा था.
मंदोदरी की त्रासदी यही है कि वह गलत व्यक्ति की पत्नी थीं, पर उस व्यक्ति के हर गलत निर्णय की जिम्मेदार नहीं थीं. यहीं से मंदोदरी का चरित्र बेहद मानवीय हो जाता है. वह न तो रावण के अपराधों को सही ठहराने वाली पत्नी हैं और न ही ऐसी स्त्री जो पति को छोड़कर अलग रास्ता चुन लेती है. वह उसके साथ रहती हैं, उसे समझाती हैं, उसके निर्णयों से असहमत होती हैं और अंत में उसके पतन का शोक भी मनाती हैं. यह विरोधाभास ही उनकी कहानी की सबसे बड़ी ताकत है.
रामायण की कथा राम की विजय के साथ आगे बढ़ जाती है. अयोध्या में दीप जलते हैं, राम लौटते हैं और धर्म की विजय का उत्सव मनाया जाता है लेकिन लंका में उस विजय के बाद क्या बचता है? एक उजड़ा हुआ राजपरिवार, मारे गए पुत्र, मृत पति और एक ऐसी महारानी, जिसकी सारी दुनिया उसी साम्राज्य के साथ ढह गई थी जिसे उसके पति ने अपने बाहुबल और अहंकार से खड़ा किया था.
रामायण ने रावण को उसके अहंकार के लिए याद रखा, राम को उनके धर्म के लिए और सीता को उनके संघर्ष के लिए. मंदोदरी को शायद इसलिए याद किया जाना चाहिए कि उन्होंने अधर्म के बीच रहकर भी विवेक की आवाज को जिंदा रखा. उनकी कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी गलत व्यक्ति के साथ जीवन बिताने वाला हर व्यक्ति उसके गलत कर्मों का भागीदार नहीं होता.
इतिहास और महाकाव्य अक्सर उन लोगों को याद रखते हैं जो निर्णय लेते हैं, उन लोगों को कम याद रखते हैं जो गलत निर्णय के सामने खड़े होकर उसे रोकने की कोशिश करते हैं. मंदोदरी ने कभी युद्ध नहीं छेड़ा, लेकिन युद्ध की आहट पहचान ली थी. उन्होंने सत्ता के पतन को देख लिया था और रावण के अहंकार की हार बहुत पहले समझ ली थी.